महर्षि दयानंद ने कहा था- ”यदि अब भी यज्ञों का प्रचार-प्रसार हो जाए तो राष्ट्र और विश्व पुन: समृद्घिशाली व ऐश्वर्यों से पूरित हो जाएगा।” इस बात से लगता है कि भारत सरकार से पहले इसे विश्व ने समझ लिया है। देखिये-फ्रांसीसी वैज्ञानिक प्रो. टिलवट ने कहा है- ”जलती हुई खाण्ड के धुएं में पर्यावरण […]
Month: June 2017
पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-62
स्वार्थभाव मिटे हमारा प्रेमपथ विस्तार हो गतांक से आगे…. आज बुद्घ ने अप्रत्याशित बात कह दी, जो बुद्घ सबको गले लगाकर चलते थे। वह आज बोले-”नहीं, उसके लिए द्वार नहीं खोलने हैं क्योंकि वह अस्पृश्य है।” सिद्घांतप्रियता व्यक्ति को प्रेम साधना की ऊंचाई तक ले जाती है। उसे पता होता है कि सिद्घांतों की रक्षा […]
आनंद लोक को ले चले, बिरला मिलता नेक
बिखरे मोती-भाग 189 गतांक से आगे…. ”जीना है तो दिव्यता में जीओ।” ”आत्मा की आवाज सुनो और आगे बढ़ो।” आत्मा की आवाज परमात्मा की आवाज होती है। आत्मा की बात को मानना भगवान की बात को मानना है। इस संदर्भ में भगवान राम ‘रामचरितमानस’ के उत्तरकाण्ड पृष्ठ 843 पर कहते हैं- सोइ सेवक प्रियतम मम […]
शब्द प्रकृति दो शब्दों से बनता है-प्र+कृति। ‘प्र’ का अर्थ है-उत्तमता से, पूर्ण विवेक से और ‘कृति’ का अर्थ है-रचना। इस प्रकार प्रकृति का अर्थ है एक ऐसी रचना जिसे उत्तमता से, नियमों के अंतर्गत रहते हुए और विवेकपूर्वक बनाया गया है, रचा गया है। प्रकृति अपने नियमों से बंधी है, और वह उनके बाहर […]
ईश्वर के प्रति कृतज्ञता अपनायें अब विचार करें कि उसे हम क्या दे रहे हैं? कदाचित ‘कुछ भी नहीं’ उसके प्रति कोई कृतज्ञता नहंी, कोई धन्यवाद नहीं। यही तो है नास्तिकता। यदि हम ईश्वर के प्रति भी कृतज्ञ होकर धन्यवाद करना और कहना सीख लें तो हमारे और शेष संसार के संबंध मानवीय ही नहीं, […]
बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को राजग ने अपना राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के इस निर्णय ने हर बार की भांति इस बार भी सबको आश्चर्यचकित कर दिया है। जिन दर्जनों लोगों के नाम राजग की ओर से राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में उछाले जा […]
‘तुम दिन को अगर रात कहो तो हम भी रात कहेंगे’ भारत की सरकारों की सोच पश्चिम के विषय में यही है। पश्चिमी देश जो कहते हैं और करते हैं-उसे भारत सरकार आंख मूंदकर ग्रहण कर लेती है। भारत की पर्यावरण नीति भी ऐसी ही है, जैसी कि पश्चिमी देशों की है। कोई नया आदर्श […]
औरंगजेब छत्रसाल को नियंत्रण में लेकर उसका अंत करने में निरंतर असफल होता जा रहा था। यह स्थिति उसके लिए चिंताजनक और अपमानजनक थी। अब तक के जितने योद्घा और सेनानायक उसने छत्रसाल को नियंत्रण में लेने के लिए भेजे थे, उन सबने छत्रसाल की वीरभूमि बुंदेलखण्ड से लौटकर आकर उसे निराश ही किया। बुंदेलखण्ड […]
पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-61
स्वार्थभाव मिटे हमारा प्रेमपथ विस्तार हो गतांक से आगे…. प्रेम में सृजन है, और प्रेम में परमार्थभाव भी है। कैसे? अब यह प्रश्न है। इसके लिए महात्मा बुद्घ के जीवन के इन दो प्रसंगों पर तनिक विचार कीजिए। महात्मा बुद्घ एक घर में ठहरे हुए थे। एक व्यक्ति जो उनसे घृणा करता था, उनके पास […]
यदि यही प्रगति है तो पतन क्या होगा
बिखरे मोती-भाग 188 गतांक से आगे…. हिंसा मन का स्वभाव है जबकि अहिंसा आत्मा का स्वभाव है। लोभवश कोई अपराध करने पर कहता है-”मन बिगड़ गया था” अर्थात आत्मा रूपी सवार को मन रूपी घोड़ा उड़ा ले गया और उसे पतन के गड्ढे में गिरा दिया। इससे स्पष्ट होता है कि लोभ मन का स्वभाव […]