यजुर्वेद में यज्ञ की अनेकों स्थानों पर बड़ी अच्छी व्याख्या की गई है।यजु० अ० १८ मन्त्र ६२ में ‘यज्ञम्’- ‘अध्ययनाध्यापनाख्यम्’ – अध्ययनाध्यापन कर्म का नाम यज्ञ है। यजु० अ० २२ मन्त्र ३३ में ‘यज्ञ’ शब्द बहुत बार आया है। यदि इस मंत्र को यजुर्वेद का सार तत्व कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी । […]