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धर्म-अध्यात्म

कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करो

योगेश्वर कृष्ण जी का कहना है कि हमें अपना मन ‘परब्रह्म’ से युक्त कर देना चाहिए, उसके साथ उसका योग स्थापित कर देना चाहिए। उससे मन का ऐसा तारतम्य स्थापित कर देना चाहिए कि उसे ब्रह्म से अलग करना ही कठिन हो जाए। भाव है कि जिन लोगों को अपनी समाधि में ऐसी उच्चावस्था प्राप्त हो जाती है वे ही वास्तव में स्थितप्रज्ञ कहे जाते हैं और उन्हें ही वास्तव में शान्ति व सुख की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इन्द्रियों के विषयों के पीछे दौड़ता है-वह संसार की जंग को हार जाता है। क्योंकि विषयों के घोड़े उसे पटक-पटक कर मारते हैं-और उसे अन्त में नष्ट करके ही दम लेते हैं। विषयों के पीछे दौड़ते रहने से व्यक्ति की मति भंग हो जाती है और वह विषयों के प्रवाह में वैसे ही भटक जाता है जैसे तेज हवा से नदी में नाव अपने मार्ग से भटक जाती है।

विषय व्यसनी की होत है दुनिया में मति भंग।
भटक जाता गंतव्य से छूटे रब से संग।।
‘मति भंग’ हो जाने की बात भारत के लोगों में आज भी एक दूसरे के लिए प्रयोग की जाती है। यह शब्द वहीं प्रयोग होता है-जहां व्यक्ति की बातों में असन्तुलन होता है और वह भटकी भटकी सी और बहकी-बहकी सी बातें करता हुआ दिखायी देता है। तब दूसरा व्यक्ति उससे कहता है कि तेरी तो बुद्घि (मति) नष्ट (भंग) हो गयी है। इसका अभिप्राय है कि तेरा विनाश अब निश्चित है। इस प्रकार के मुहावरों का प्रयोग करने का अभिप्राय है कि गीता हम भारतवासियों के व्यवहार में समायी हुई है। उसकी शिक्षाएं चाहे श्लोकों के रूप में हमारा मार्गदर्शन न कर रही हों-पर साधारण भाषा में तो उसका उपदेश परम्परा से आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रहा है।
‘मति भंग’ की इस अवस्था से मुक्ति पाने के लिए कृष्णजी अर्जुन को सचेत करते हुए कहते हैं कि तुझे ‘ब्राहमी’ स्थिति अर्थात संसार में रहकर भी ब्रह्म में स्थित होने की अवस्था को अपनाना चाहिए। इस अवस्था को प्राप्त व्यक्ति ही वास्तविक निष्काम कर्म योगी होता है। इसे प्राप्त करने वालों को कोई मोह नहीं रहता। जिस किसी व्यक्ति को संसार में रहते-रहते यह स्थिति प्राप्त हो जाती है वह ‘मोक्ष’ को प्राप्त कर लेता है। वह ‘ब्रह्मलीन’ कहा जाता है। हमारे यहां साधु और संन्यासियों को मृत्योपरान्त इसी नाम से पुकारा जाता है। यह बड़ी उच्च और पवित्र स्थिति है। कृष्णजी की गीता का उपदेश संसार के लोगों को इसी अवस्था से परिचित कराना चाहता है। इसे अपनाकर सारा संसार ही ‘ब्रह्मलीन’ हो जाए यह गीता का सार है। ‘ब्रह्मलीन’ का अभिप्राय अपने कार्यों को ईश्वर को सौंप देना है, अथवा ईश्वर के ‘सेंसर बोर्ड’ को दिखा-दिखाकर अपने कार्यों का निष्पादन करते जाना है।
इस संबंध में यजुर्वेद का यह प्रसिद्ध मंत्र हमारा बहुत अधिक मार्गदर्शन कर सकता है :

‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:।
एवं त्वयि नान्यथेतोअस्ति न कर्मं लिप्यते नरे।।’
(यजुर्वेद 40/2)
‘इस संसार में धर्मयुक्त निष्काम कर्मों को करते हुए सौ वर्ष तक जीवन जीने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार जौ धर्मयुक्त कर्मों में लगा रहता है, वह अधर्मयुक्त कर्मों में अपने को नहीं लगाता।’
दीर्घतमा ऋषि का बताया गया यह मंत्र कुछ यों कहता है:-
‘मनुष्य को चाहिए कि वह कर्म करता हुआ ही जीना चाहे। यदि वह कर्म नहीं करता है तो उसे जीवित रहने का अधिकार नहीं है। यह जीवन कर्म करने के लिए ही दिया गया है।..सर्वथा ‘मम’ ‘अहं’ को छोड़कर (तूं) कर्म करेगा तो तेरे ऐसे कर्म कभी बन्धनकारक नहीं होंगे। ऐसे निष्काम कर्मों का कभी तुझ नर में लेप नहीं होगा।’
उपरोक्त श्लोक का शाब्दिक अर्थ यों है:-
‘मनुष्य इस संसार में कर्मों को करता हुआ ही सौ वर्ष तक जीता रहना चाहे। इस तरह तुझ नर में कर्मलिप्त नहीं होगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नही है।’
(आचार्य अभयदेव)

संसार के बहुत से लोग ऐसे हैं जो कर्म तो प्रारम्भ कर देते हैं, परन्तु जैसे ही कोई बाधा बीच में आती है तो वे अपने कर्म को वहीं छोड़ देते हैं। ऐसे लोग अपने आलस्य और प्रमाद को छिपाने के लिए या अपनी दुर्बलता को लोगों की नजरों में न आने देने के उद्देश्य से अपने द्वारा प्रारम्भ किये गये कार्य को बीच में छोड़ते समय तर्क देते हैं कि कर्म के बन्धन से बचने के लिए वे अपना कर्म छोड़ रहे हैं। वास्तव में इस प्रकार कर्म को बीच में छोडऩा अपनी पराजय को स्वीकार करना है और अपनी प्रतिभा व क्षमताओं पर अपने आप ही सन्देह करने के समान है। इससे व्यक्ति हताशा में फंसता है और अपने जीवन को अपने लिए स्वयं ही बोझ मानने लगता है। गीता ऐसे व्यक्ति को कोई अच्छा व्यक्ति नहीं मानती है। उसकी ऐसी प्रवृत्तियों को गीता जीवन से पलायनवाद मानती है, और पलायनवाद गीता को या गीता के भी मूल स्रोत वेद को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं है। युद्घ छोड़ देना या चुनौती से मुंह फेर लेना या थोड़ी सी असफलता आते ही घबरा जाना-वीरों का कार्य नहीं है। ऐसे में युद्घ से पलायन कर रहे अर्जुन को भला कृष्ण कैसे पसन्द कर सकते थे?
कृष्णजी कहते हैं कि अर्जुन! मैंने पूर्व में तुझे यह स्पष्ट किया है कि इस लोक में जीवन की दो निष्ठाएं-ज्ञानयोग व कर्मयोग हैं, सांख्य दृष्टि से विचार करने पर ‘ज्ञान योग’ तथा योग दृष्टि से विचार करने के लिए ‘कर्मयोग’ के नाम से इन दोनों निष्ठाओं को जाना जाता है। ये दोनों मार्ग यद्यपि अलग-अलग जाते हुए दिखायी देते हैं-पर वास्तव में ये दोनों मार्ग एक ही स्थान पर पहुंचते हैं। इन दोनों में से किसी एक को पकड़ लेने से सब एक ही स्थान पर पहुंच जाते हैं।
संसार के विभिन्न मत-मतान्तरों और सम्प्रदायों के लिए भी यही कहा जाता है कि ये भी ईश्वर तक पहुंचने के विभिन्न रास्ते हैं। इनमें से किसी को भी पकड़ लो और आप एक दिन ईश्वर को पा लोगे। वास्तव में संसार के विभिन्न मत-मतांतरों और योगीराज श्रीकृष्ण जी के उपरोक्त दो मार्गों में भारी अन्तर है। गीता जीवन की दो निष्ठाओं अर्थात ज्ञानयोग और कर्मयोग की बात कर रही है और कह रही है कि अन्त में इन दोनों में से किसी एक के प्रति भी संकल्पबद्घ व्यक्ति ईश्वर की शरण में जा पहुंचता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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