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वैदिक संपत्ति

वैदिक संपत्ति इंद्र और वृत्र का अलंकार

गतांक से आगे…. इन्द्रो मधैर्मधवा वृत्रहा भुवत्।(ऋ०१०/२3/२) वृत्रहणं पुरन्दरम्। (ऋ० ६/१६/१४) यो दस्योर्हन्ता स जनास इन्द्र:।(ऋ० २/१२/१०) अर्थात् इंद्र ही मधवा और वृत्र के मारनेवाला हुआ। वृत्र को मारने वाला ही पुरन्दर है और जो दस्यु को मारने वाला है, वही इन्द्र है । यह वृत्र और दस्यु शब्द एक ही पदार्थ के वाचक हैं। […]

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वैदिक संपत्ति : भारतीय सांस्कृतिक धरोहर

वैदिक संपत्ति गतांक से आगे… द्वितीय खंड में हम लिख आए हैं कि आर्यों की उत्पत्ति हिमालय के ‘ मानस ‘ स्थान पर हुई।बहुत दिन तक आर्य लोग हिमालय पर ही रहे। संततिविस्तार के कारण उन्होंने हिमालय से नीचे उतर कर भूमि तलाश की। जिस रास्ते से वे आये उस रास्ते का नाम उन्होंने हरद्वार […]

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वैदिक संपत्ति : दक्षिण एशिया के विषय में

दक्षिणी एशिया पर कुछ लिखने के पूर्व दक्षिण भारत में आबाद द्रविड़ जाति की उत्पत्ति का विवरण विस्तारपूर्वक हो जाना चाहिए। क्योंकि पाश्चात्यों और उनके द्वारा शिक्षा पाए हुए कतिपय एतद्देशीय विद्वानों का मत है कि भारतवर्ष के मूल निवासी कोल और द्रविड़ ही है। आर्य लोग तो यहां कहीं बाहर से आकर आबाद हुए […]

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वैदिक संपत्ति : एक अमूल्य ग्रंथ

गतांक से आगे… इस शब्दसाम्य के अतिरिक्त, चाल्डिया की डैल्यूज टेबलेट अर्थात् मनु के तूफान की कथा भी ज्यों की त्यों यहां के अनुसार ही लिखी हुई मिलती है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि वे आर्य ही है। हम अभी फिनिशियावालों के वर्णन के साथ लिख आए हैं कि बेबीलोनिया में पणियों और चोलों […]

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तोप,बंदूक,बारूद

उनके अस्त्रशस्त्रों में अनेक प्रकार के यंत्र शामिल थे।तोप और बन्दूक यंत्र बनाने की विस्तारपूर्वक विधि शुक्र नीति अध्याय 4 में लिखी है।वहां बन्दूक और तोप दोनो का वर्णन है। बारूद बनाने और बारूद के द्वारा उनके चलाने का भी वर्णन है। बोलने वाली पुतलियां पुराने जमाने में ऐसा भी यंत्र पाया जाता था जो […]

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विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-37

गतांक से आगे……… यहां हम थोड़ा सा उसका इतिहास देकर उसके विषय प्रतिपादन की ओर आना चाहते हैं। तिलक महोदय ने ‘ओरायन मृगशीर्ष’ ग्रंथ लिखने के पांच वर्ष बाद सन 1898 में उत्तरधु्रव निवास लिखा और उसका सारांश एक पत्र द्वारा मैक्समूलर के पास भेजा। पत्र के उत्तर में मैक्समूलर ने लिखा कि कितने ही […]

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विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-36

गतांक से आगे…. हमको, आपको, तिलक महाराज को और अन्य किसी को भी क्या अधिकार है किवह इन समयों को पहिली ही आवृत्ति का समझे? अर्थात वह यह क्यों समझ  ले कि यह अवस्था केवल अभी हाल ही की आवृत्ति की है? हम ऊपर लिख चुके हैं, कि किसी जमाने में वसंतसंपात फाल्गुनी पूर्णिमा के […]

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विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-35

गतांक से आगे……ऋग्वेद में है कि-संवत्सरं शशयाना ब्राह्मण व्रतचारिण:।वाचं पर्जन्यजिन्वितां प्र मण्डूका अवादिषु:।।ब्राह्मणासो अतिरात्रे न सोमे सरो न पूर्णमभितो वदन्त:।संवतत्सरस्य तदह: परिष्ठ यन्मण्डूका: प्रावृषीण्र बभूव।।(ऋ 7/103/7)यहां स्पष्ट कहा गया है कि संवत्सर भर सोये हुए मण्डूक पर्जन्य पड़ते ही बोलने लगे, क्योंकि संवत्सरस्य तदह: अर्थात संवत्सर का वही दिन है। कहने का मतलब यह है […]

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विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-34

गतांक से आगे…. इन्हीं दोनों को ऋग्वेद 10 /14/11 में यौ ते श्वानौ यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिरक्षी कहा गया है। ये श्वान सदैव द्विवचन में कहे गये हैं, जिससे ज्ञात होता है कि वे दो हैं। पर तिलक महोदय श्वान के विषय के जो चार प्रमाण देते हैं, उनमें सर्वत्र एक ही वचनवाला श्वान कहा […]

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विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-33

गतांक से आगे….. ये मिनट बढक़र दो हजार वर्ष में एक मास के बराबर हो जाते हैं। परिणाम यह होता है कि हर दो हजार वर्ष में वसंत सम्पात नाक्षत्र वर्ष से एक महीना पीछे हो जाता है। इसी कारण से कृत्तिकाकाल मृगशीर्षकाल और पुनर्वसुकाल से संबंध रखने वाले तीनों पंचांगों का वर्णन किया गया […]

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