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वैदिक संपत्ति : संप्रदायप्रवर्तन

गीता और उपनिषदों में मिश्रण गतांक से आगे… गीता भी तर्क से घबराती है।वह कहती है कि, ‘संशयात्मा विनश्यति’ अर्थात संशयात्मा नष्ट हो जाती है। परंतु हम देखते हैं कि तर्कशास्त्र में संशय एक जरूरी विषय है जो सत्यासत्य के निर्णय में काम आता है। बिना संशय के तो किसी बात का निर्णय ही नहीं […]

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वैदिक संपत्ति: संप्रदायप्रवर्तन : गीता और उपनिषदों में मिश्रण

गतांक से आगे.. उपनिषदों की नवीनता का दूसरा प्रमाण तो बहुत ही स्पष्ट है। छान्दोग्य 3/17/ 6 में लिखा है कि ‘तद्वैतद् धोरआंगिरसः कृष्णाय देवकीपुत्राय’अर्थात् घोर आंगिरस के शिष्य देवकीपुत्र कृष्ण के लिए। इनमें देवकीपुत्र कृष्ण का नाम आया है।यह वाक्य कृष्ण के बाद ही लिखा गया है। हम प्रथम खण्ड में कृष्णकालीन महाभारतयुद्ध को […]

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वैदिक संपत्ति अध्याय – संप्रदाय प्रवर्तन ..गीता और उपनिषदों में मिश्रण

  गतांक से आगे… गीता के प्रमाणों से ज्ञात हुआ कि, उपनिषदों का सत् – असत् का झगड़ा परमात्मासंबंधी नहीं है, प्रत्युत वह झगड़ा भौतिक है। क्योंकि उपनिषदों में परमात्मा के लिए तो पृथक ही कह दिया गया है कि एक के मत से आदि में केवल आत्मा ही था। इस अकेले आत्मा से सृष्टि […]

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असद न असत् था, न सत् था और न रज था, प्रत्तयुत तम ही तम था

गतांक से आगे… अत: आगे एक अदितीय सत् ही था , उसी से अग्नि और जल की उत्पत्ति हुई है ।इस विवाद से पाया जाता है कि उस जमाने में आत्मा, सत् और असत् पर विश्वास करने वाले तीन संप्रदाय थे।एक ब्रहृ से, दूसरा सत् से और तीसरा असत् से संसार की उत्पत्ति मानता था। […]

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गीता और उपनिषदों में मिश्रण

गतांक से आगे… मुण्डक उपनिषद् का तृतीय मुण्डक पूर्व वैदिक है। इसमें नवम खण्ड का एक श्लोक ऋचा के नाम से लिखा गया है।सभी जानते हैं कि वेद मंत्र ही ऋचा कहलाते हैं । पर जो इस श्लोक ऋचा के नाम से लिखा गया है,उसका चारों वेदों में कहीं पता नहीं है।इससे स्पष्ट ज्ञात होता […]

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वैदिक संपत्ति : प्रस्थानत्रयी की पड़ताल

  गतांक से आगे…   जिस समय वर्तमान प्रस्थानत्रयी का सम्पादन हुआ, उस समय ने तो यह रूप इन उपनिषदों का था और ने गीता का तथा व्याससूत्रों का ही।हमारा विश्वास है कि सनातन से सहिताओं के मंत्रों को ही श्रुति कहा जाता था।क्योंकि सब लोग उन्हीं को आज तक सुनते-सुनते आ रहे हैं।उपनिषद् तो […]

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वैदिक संपत्ति : संप्रदाय प्रवर्त्तन

  गतांक से आगे … प्रस्थानत्रयी नाम बौद्वों के त्रिपिटक नाम की नकल है।जिस प्रकार बौद्धों के तीन प्रकार के साहित्य को त्रिपिटक कहते हैं, उसी प्रकार वेदान्त से सम्बन्ध रखने वाले तीनों प्रकार के साहित्य को प्रस्थानत्रयी कहते हैं और जिस प्रकार आसुर धर्म हटाने के लिए त्रिपिटक की योजना हुई थी, उसी तरह […]

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आर्यों का सम्प्रदाय परिवर्तन

  आर्यों का संप्रदाय परिवर्तन ऊपर हम यह दिखला आए हैं कि आस्ट्रेलिया निवासी अनार्य लोग, मौका पाकर द्रविड़ होकर ब्राह्मण बन गए और अपने देश तथा जाति के असभ्य और अनार्य आचार – विचारों को आर्यों में वेद, धर्म और यज्ञ आदि के नाम से प्रचलित किया।वही सब आचार – विचार पहले पड़ोसी देशों […]

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वैदिक संपत्ति : गतांक से आगे

गतांक से आगे… कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय ब्राह्यण में लिखा है कि ‘वाचे पुरुषमालभते’ इस पर सायणाचार्य भाष्य करते हुए लिखते हैं कि, ‘वाग्देवतायै पुरुषं पूरकं स्थूलशरीरमित्यर्थ: अर्थात् वाणी के देवता के लिए पुरुष का वध करें। उसी में फिर लिखा है कि ‘ ब्राह्मणे ब्राह्मणमालभते’ इस पर सायणाचार्य कहते हैं कि ‘ब्राह्मणजात्याभिमानी देवसत्यस्मै कञ्चित् […]

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वैदिक संपत्ति में द्रविड़ और आर्य के बारे में

वैदिक संपत्ति   गतांक से आगे… (1) इस तैत्तिरीय कृष्ण यजुर्वेद के विषय में नए और पुराने सभी विद्वानों ने कहा है कि यह मलिन बुद्धि से रचा गया है,इसलिए यह द्रविड़ो का ही रचा हुआ है।वेदभाष्यकार महीधर कहते हैं कि ‘तानि यजूषि बुद्धिमालिन्यात्कृष्णानि’ अर्थात बुद्धिमालिन्य से कृष्ण यजुर्वेद की उत्पत्ति हुई है।इसी तरह स्वामी […]

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