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महत्वपूर्ण लेख विश्वगुरू के रूप में भारत

भारत को पुनः विश्वगुरु के रूप में स्थापित करने हेतु सांस्कृतिक संगठनों को भी विशेष भूमिका निभानी होगी

प्रहलाद सबनानी प्राचीनकाल में भारत विश्व गुरु रहा है इस विषय पर अब कोई शक की गुंजाईश नहीं रही है क्योंकि अब तो पश्चिमी देशों द्वारा पूरे विश्व के प्राचीन काल के संदर्भ में की गई रिसर्च में भी यह तथ्य उभरकर सामने आ रहे हैं। भारत क्यों और कैसे विश्व गुरु के पद पर […]

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*पतंजलि योगदर्शन में ईश्वर व ओम् जप का महत्व-*

ईश्वरप्रणिधानाद्वा- योगदर्शन- 1.23 ईश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास, प्रेम व समर्पण से समाधि शीघ्र लग जाती है। इसके लिए शब्द प्रमाण, अनुमान प्रमाण और ईश्वर द्वारा किए जा रहे बेजोड़ उपकारों का चिन्तन करते रहना आवश्यक है। तप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग: (योगदर्शन 2.1) तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान क्रिया योग है।‌ ध्यानं निर्विषयं मन: (सांख्य दर्शन- 6.25) […]

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ओ३म् “आर्यसमाज वेदनिहित सत्य सिद्धान्तों पर आधारित एक धार्मिक एवं सामाजिक संगठन है”

============= आर्यसमाज एक धार्मिक एवं सामाजिक संगठन है जो विद्या से युक्त तथा अविद्या से सर्वथा मुक्त सत्य सिद्धान्तों को धर्म स्वीकार करती है और इनका देश देशान्तर में बिना किसी भेदभाव के प्रचार करती है। आर्यसमाज की स्थापना से पूर्व देश व विश्व अविद्या से ग्रस्त था। धर्म तथा मत-मतान्तरों में अविद्या प्राबल्य था। […]

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मनु की वैश्विक प्रतिष्ठा

आशीष सिंह चौहान १. महर्षि मनु ही वो पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने संसार को एक व्यवस्थित, नियमबद्ध, नैतिक एवं आदर्श मानवीय जीवन जीने की पद्धति सिखायी है| वे मानवों के आदि पुरुष है, आदि धर्मशास्त्रकार है, आदि विधिप्रेणेता, आदि विधिदाता(ला गिवर), आदि समाज और राजनीति व्यवस्थापक है| मनु ही वो प्रथम धर्मगुरु है जिन्होंने यज्ञ […]

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मेरे मानस के राम अध्याय- 57 : रामचंद्र जी का अयोध्या आगमन

श्री राम जी की आज्ञा पाकर हंसों से युक्त वह उत्तम पुष्पक विमान बड़ा शब्द करते हुए उड़कर आकाश में पहुंचा । उस समय उन्होंने लंका नगरी को बड़े ध्यान से देखा। तब रामचंद्र जी सीता जी से कहने लगे कि देखो! यह समर भूमि है। जहां पर असंख्य राक्षसों और वानरों का वध हुआ […]

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मेरे मानस के राम अध्याय 56 श्री राम का अयोध्या के लिए प्रस्थान

रावण वध, विभीषण राज्याभिषेक और सीता जी की अग्नि परीक्षा के पश्चात जब वह रात्रि व्यतीत हुई और प्रात:काल हुआ तब शत्रु नाशक श्री राम सुखपूर्वक उठे। उस समय विभीषण हाथ जोड़ तथा ‘आपकी जय हो’ ऐसा कह कर बोले – आपके स्नान के लिए उत्तम अंगराग (उबटन) विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषण तथा […]

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मेरे मानस के राम : अध्याय , 54 – अग्नि परीक्षा और सीता जी

सीता जी ने उपस्थित महानुभावों के समक्ष अपनी पीड़ा को व्यक्त करते हुए रामचंद्र जी से कहा कि जिस समय रावण ने मुझे पकड़ा था, उस समय उसने मेरा शरीर अवश्य स्पर्श किया था, परंतु तब मैं विवश थी। मेरी इच्छा से उसने मेरा शरीर नहीं छुआ था। इसमें मेरा कोई दोष नहीं था। यह […]

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मेरे मानस के राम : अध्याय – 53 , सीता का राम के पास आना

अयोध्या नगरी लौटने के लिए व्याकुल श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी को आदेश दिया कि वह सीता जी को यथाशीघ्र हमारे पास ले आएं। हनुमान जी ने रामचंद्र जी के आदेश का पालन किया और कुछ समय पश्चात ही वे सीता जी को अपने साथ लेकर रामचंद्र जी के समक्ष उपस्थित हो गए। तब […]

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मेरे मानस के राम : अध्याय – 52 , रावण का अंतिम संस्कार और विभीषण का राज्याभिषेक

संकेत किया श्री राम ने , विभीषण जी की ओर। वीर हित नहीं शोभता, ऐसा बिरथा शोक।। महिलाओं को दूर कर , करो दाह संस्कार। धर्म आपका है यही , याद करे संसार।। विभीषण बोले – “राम जी ! क्या कहते हो आप ?” उसका ना सम्मान हो , किया हो जिसने पाप।। ( विभीषण […]

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मेरे मानस के राम अध्याय 51 मंदोदरी का विलाप

रामचंद्र जी विभीषण को पूर्व में ही यह वचन दे चुके थे कि लंका की जीत के पश्चात वह रावण के स्थान पर उन्हें लंका का राजा बनाएंगे। आज वह घड़ी आ गई थी, जब लंका के राजा रावण का अंत हो गया था। उसका राज्यसिंहासन खाली पड़ा था। जिस पर अब विभीषण का राजतिलक […]

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