बाबाओं के पास जो भीड़ जमा होती है, उसके मूल में दुख है, अभाव है, गरीबी है या अशांति है। कोई बेटे से परेशान है, कोई बहू से, कोई नौकरी से, कोई जमीन के झगड़े में फंसा है और किसी को कोर्ट-कचहरी के चक्कर में जायदाद बेचनी पड़ गई है। या तो धन ही नहीं […]
Category: समाज
महर्षि दयानंद ने कहा था- ”यदि अब भी यज्ञों का प्रचार-प्रसार हो जाए तो राष्ट्र और विश्व पुन: समृद्घिशाली व ऐश्वर्यों से पूरित हो जाएगा।” इस बात से लगता है कि भारत सरकार से पहले इसे विश्व ने समझ लिया है। देखिये-फ्रांसीसी वैज्ञानिक प्रो. टिलवट ने कहा है- ”जलती हुई खाण्ड के धुएं में पर्यावरण […]
खेल की भावना से यदि कोई कार्य किया जाए तो उसे सबसे उत्तम माना जाता है। खेल में बच्चे गिरते हैं-चोट खाते हैं, जीतते और हारते हैं-पर खेल के मैदान से बाहर आते ही हाथ मिला लेते हैं। हार जीत के खट्टे मीठे अनुभवों को वहीं छोड़ देते हैं, और एक अच्छे भाव के साथ […]
मानसिक रुग्णता, समाज और सरकार
मानसिक रोगियों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की चिंता नई नहीं है। इसके पहले भी न्यायालय देश में बढ़ रहे मानसिक रोगियों को लेकर अपनी चिंता जता चुका है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस बार के आदेश में मानसिक रोगियों के पुनर्वास की बात भी कही गई है। कोर्ट ने माना है कि ऐसे कई रोगी […]
हमारे संविधान निर्माताओं ने देश की आर्थिक प्रगति में सभी वर्गों और आंचलों के निवासियों को जोडऩे के लिए और आर्थिक नीतियों का सबको समान लाभ प्रदान करने के लिए ‘आरक्षण’ की व्यवस्था लागू की थी। आरक्षण की यह व्यवस्था पूर्णत: मानवीय ही थी-क्योंकि इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से उपेक्षित रहे, दबे, कुचले लोगों को […]
एक दयालु नागरिक बनिए
दयालु होना अपने और दूसरों के भी जीवन को अर्थपूर्ण बनाने का एक महत्वपूर्ण गुण है। पियेरो फेरूबी के अनुसार दयालुता का अर्थ है ”कम प्रयत्न” करना। क्योंकि हमें नकारात्मक व्यवहार और नाराजग़ी, जलन, शंका और धोखेबाजी के बंधन से आजाद करती है। बेहतर मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य और खुशी अधिक सकारात्मक सोच से आती है, और […]
भावशून्य हो रही है नई पीढ़ी
शिक्षा व्यवस्था में हैं खामियां जो माता पिता अपने बच्चों पर ध्यान नहीं देते वे बच्चे घर पर टीवी, वीडियो आदि के रोग ग्रस्त हो जाते हैं। जो नहीं देखा सुना जाना चाहिए वह सब उसके माध्यम से अबोध बालक जानने लगता है। जिससे पढ़ाई में विशेष ध्यान नहीं दे पाते और उसी में सुख […]
मानव अधिकार हमारे स्वभाव में अंतर्निहित हैं
हर कोई दूसरे की तरफ अगुवाई के लिए देख रहा था तथा हमलावरों पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। राष्ट्रसंघ अगले युद्ध को रोकने में असमर्थ एक लाचार संस्था साबित हुआ। नाजियों के द्वारा प्रायोजित नस्ल की सर्वोच्चता का झूठा सिद्धांत तथा खून की प्यासी दो अन्य शक्तियों की धनलिप्ता के कारण 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध […]