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भावशून्य हो रही है नई पीढ़ी

शिक्षा व्यवस्था में हैं खामियां

जो माता पिता अपने बच्चों पर ध्यान नहीं देते वे बच्चे घर पर टीवी, वीडियो आदि के रोग ग्रस्त हो जाते हैं। जो नहीं देखा सुना जाना चाहिए वह सब उसके माध्यम से अबोध बालक जानने लगता है। जिससे पढ़ाई में विशेष ध्यान नहीं दे पाते और उसी में सुख की अनुभूति करने लगते हैं।

भाषा का अध्ययन मानसिक भावों को जागृत करता है, विचारों की नई स्फूर्ति जीवन में लाता है, लेकिन आजकल की शिक्षा प्रणाली में भाषा की मुख्यता होने से इसका भी अभाव देखा जा रहा है, अतः नई पीढ़ी भावशून्य हो रही है। दया, परोपकार, सत्यवादिता जैसे भाव गुजरे जमाने की बात होती जा रही है। अपनी राष्ट्र भाषा या संस्कृति पर किसी को गौरव नहीं। यही कारण है कि पब्लिक स्कूल का बच्चा शुद्ध हिंदी भी नहीं लिख पाता। संस्कृत जैसी वैज्ञानिक भाषा को तो आज का छात्र विषधर की भांति हेय मानता है।

प्रकृति के प्रति किसी प्रकार का कोई प्रेम आज की इस पद्धति के कारण नहीं बन पाता। क्योंकि वैसे वातावरण में वे रहते ही नहीं। ईट, पत्थरों के जंगलों में रहते-रहते उनमें प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता नहीं आ पाती।

सांस्कृतिक दूषण रूप चुनौती- इस शिक्षा पद्धति में भारतीय जीवन मूल्य में दोष सा है, अतः वहां त्याग, तपस्या, ब्रह्मचर्य, आध्यात्म का स्पर्श भी जीवन में नहीं करवाया होगा, अतः सामान्य से कष्टों के आने से ही आत्महत्या की भावना आती है। सहिष्णुता का अभाव वहां मुख्य होता है। इसीलिए आर्थिक दृष्टि से सुखद भविष्य की संभावना होते हुए भी आई.आई.टी, आई.आई.एम जैसे संस्थानों के छात्र आत्महत्याएं कर लेते हैं। कहीं परस्पर ईर्ष्या, द्वेष के कारण अपने साथियों का संहार करने तक जघन्य कार्य भी कर डालते हैं। ऐसे कृत्य करने वाले विकसित जर्मनी, अमेरिका जैसे देशों में भी देखे जाते हैं। 11 मार्च 2009 को दक्षिण जर्मनी के वित्राण्डन नगर के अल्बर्टविले स्कूल में 17 वर्ष के बच्चे ने विद्यालय के तीन अध्यापकों, नौ लड़कियों सहित 15 लोगों को गोलियों से भून डाला था। बचपन में ऐसी उग्रता समाज के लिए घातक है जो नैतिक मूल्यों से ही दूर की जा सकती है और इसके लिए इस पद्धति में अवकाश नहीं।

हजारों की संख्या में शिक्षार्थी विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों से निकलते हैं, परंतु सभी अपने तक ही सीमित होते जा रहे हैं। किसी में माता-पिता, परिवार, समाज देव व राष्ट्र के प्रति कोई भक्तिभाव नहीं, उदारता नहीं। कारण आदर, सम्मान, सौहार्द, सहानुभूति, संवेदना आदि का अभाव। विद्यालयों में केवल गणित, विज्ञान, इतिहास अथवा कला संबंधी विचारों को बच्चे में सम्प्रेषित करने का अधिकतम कार्य किया जाता है जबकि बच्चों का अधिक समय तो पाठशालाओं से बाहर आराम की जिंदगी के सानिध्य, गलियों में खेलने या टी.वी., वीडयोगेम अथवा नेट पर चैट आदि में व्यतीत होता है। जीवन जीने की कला की शिक्षा इस मध्य लुप्त हो जाती है। इन नकारात्मक भावों से विपरीत श्रेष्ठ भावों का बीजारोपण करने के लिए आंतरिक भावों को जागृत करना होता है, जो आध्यात्मिकता में निहित है, वे आचार व्यवहार से सिखाए जा सकते हैं और उनके लिए आज की शिक्षाव्यवस्था में किसी के पास समय नहीं।

भाषा का अध्ययन मानसिक भावों को जागृत करता है, विचारों की नई स्फूर्ति जीवन में लाता है, लेकिन आजकल की शिक्षा प्रणाली में भाषा की मुख्यता होने से इसका भी अभाव देखा जा रहा है, अतः नई पीढ़ी भावशून्य हो रही है। दया, परोपकार, सत्यवादिता जैसे भाव गुजरे जमाने की बात होती जा रही है। अपनी राष्ट्र भाषा या संस्कृति पर किसी को गौरव नहीं। यही कारण है कि पब्लिक स्कूल का बच्चा शुद्ध हिंदी भी नहीं लिख पाता। संस्कृत जैसी वैज्ञानिक भाषा को तो आज का छात्र विषधर की भांति हेय मानता है।

कामवासना ऐसा रोग है, जो प्रत्येक को पीडि़त करता है, लेकिन आजकल की शिक्षा व्यवस्था में इस पर काबू पाने का कोई उपाय ब्रह्मचर्य आदि के रूप मे निर्दिष्ट नहीं किया जाता। अतः युवावस्था आने पर सह शिक्षा के कारण थोड़े से भी अनुकूल वातावरण के मिलते ही बच्चों को बहकने का खुला आमंत्रण मिलता है। भारतीय समाज में संस्कारों के कारण कुछ उससे बच जाते हैं तो कुछ नीचे से नीचे संलिप्त हो जाते हैं। दूसरी ओर विकसित राष्ट्रों के विकास की गति देखिए, जहां सोलह वर्ष की शायद ही कोई लड़की गर्भपात करवाने से बचती हो। अब ऐसा ही प्रभाव भारतीय समाज के बड़े-बड़े शहरों में देखने को मिल रहा है। यह भारतीय संस्कृति को शिक्षा प्रणाली में महत्व न देने का ही परिणाम है।

आज की परिस्थितियों में ऐसा कौन सा घर है जहां भारतीय संस्कृति में मानव के आंतरिक षड्रिपु कहे जाने वाले काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष जैसे कीटाणुओं का प्रवेश न हो। जन्म जन्मांतर की वासनाओं से ये दोष बच्चों में भी अनुकूल अवसर पाकर घरों, और समाज के सानिध्य में रहने के कारण प्रविष्ट होते हुए देर नहीं लगाते। जिससे अध्ययन में बाधा आती है और जो उपलिब्ध होनी चाहिए वही नहीं हो पाती।

डा. ब्रह्मदेव

योग संदेश से साभार

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