१९२० के दशक में नव-मुसलमानों का सामाजिक ढाँचा अत्यंत विचित्र था। वे आस्था से तो मुसलमान हो गए, पर अपने पूर्वजों के हिन्दू रीति-रिवाज, संस्कार और लोकविश्वास उन्होंने पूरी तरह नहीं छोड़े। उन्होंने बहुदेव-पूजा का स्थान सूफी पीरों, फकीरों और शहीदों की मजारों को दे दिया। मंदिरों की जगह खानकाहें और समाधियों की जगह कब्रें […]