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सी से कैमल नहीं, क्रम से कैमल

ऊंट जिसे रेगिस्तान का जहाज कहते हैं उसके लिए दुनिया की भिन्न भिन्न भाषाओं में अनेक नाम है । ऊंट के लिए सर्वाधिक शब्द संस्कृत भाषा में मिलते हैं यह संस्कृत भाषा की विलक्षणता है इसमें एक वस्तु के लिए जहां अनेक नाम मिलते हैं तो एक ही नाम यहां अनेक वस्तुओं का द्योतक होता है। अंग्रेजी में ऊंट को कैमल या कैमेल कहते हैं। ऊंट के लिए यह कैमल शब्द भी भारत अर्थात संस्कृत भाषा से ही गया है। संस्कृत में किसी भी जीवित या जड़ चीज का जब नामकरण किया जाता तो वह बस यूं ही मनमर्जी से नहीं कर दिया जाता संस्कृत भाषा में अधिकांशत वस्तु के नाम से ही वस्तु के गुण धर्म का बोध हो जाता है, इसे स्पष्टता से समझते हैं।

संस्कृत में ऊंट का एक नाम ‘क्रमेल’ है । यही शब्द भारत से बाहर यूनान यूरोप जाते हुए कैमेल या कैमल के तौर पर परिवर्तित हो गया अर्थ इसका वही रहा अर्थात यह ऊंट के लिए ही प्रयोग होता रहा आज भी होता। अब हम आज किसी अंग्रेज से पूछेंगे कि वह ऊंट को कैमल क्यों कहते हैं तो वह बगले झांकने लगेगा क्योंकि अंग्रेजों के पास यह शब्द पहुंचा लेकिन इस शब्द की उत्पत्ति के पीछे क्या भाव छुपा है इस शब्द के उच्चारण के पीछे क्या भाषा जन्य मनोविज्ञान है उनका उन्हें बोध नहीं है दोष अंग्रेजों का नहीं है दुनिया का प्रत्येक वह भाषा भाषी समूह जो उधार के शब्दों से अपना काम चलाता है वह इसी अजीबोगरीब मनोदशा से गुजरता है। अंग्रेजी भाषा किराए के शब्दों को लेकर फली फूली है । अंग्रेजी में 1 लाख 70 हजार के लगभग शब्द है जिनमें वर्तमान में आज केवल 20 हजार के लगभग शब्द ही प्रयोग में लिये जाते हैं। अंग्रेजी के संस्कृत हिंदी से ही नहीं फ्रेंच लैटिन ग्रीक जैसी भाषाओं से उधार लिए गए हैं उन भाषाओं में यह शब्द संस्कृत से ही गए हैं । संस्कृत एक वैज्ञानिक आद्य भाषा है जिसका शब्दकोश अनुमानित आज की तिथि में 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्दों के आसपास है।

संस्कृत भाषा के कोश की समृद्धि का कारण वैदिक व्याकरण व आज उपलब्ध पाणिनी ऋषि का व्याकरण है जो इसके शब्दों की उत्पत्ति के लिए एक वैज्ञानिक एल्गोरिदम तैयार करता है।

यह विषय भी मुख्य है किसी अन्य लेख में इसे स्पष्ट करेंगे। लेख के मुख्य विषय ऊंट के लिए संस्कृत के क्रमेल शब्द की व्युत्पत्ति की मीमांसा करते हैं।यह शब्द संस्कृत की क्रम धातु से मिलकर बना है। संस्कृत भाषा को शरीर माने तो धातुएं संस्कृत की डीएनए है। विषय पर आगे बढ़ने से पहले धातु शब्द को ही स्पष्ट करते हैं यह धातु पारिभाषिक शब्द है अर्थात ग्रंथ या किसी सब्जेक्ट विशेष में इसके अर्थ बदलते रहते हैं आयुर्वेद के प्रसंग में धातु का अर्थ हम रस रक्त आदि से लेंगे वहीं जहां फिजिक्स भौतिक विज्ञान का प्रसंग होगा तो वहां धातु का अर्थ ऐसे तत्व या यौगिक या कंपोजिट मैटेरियल से होगा जो ऊष्मा व विद्युत का सुचालक या चालक है। भारत के ऋषियों ने जितने भी शास्त्र रचे हैं उन सभी शास्त्रों के अपने-अपने पारिभाषिक शब्द हैं।

जिस क्रम धातु से संस्कृत का क्रमेल शब्द बना है उस क्रम धातु का मूल अर्थ है – नाप तौल कर पग आगे रखना। भाषा विज्ञान में निपुण जब हमारे पूर्वजों ने ऊंट को देखा और उसकी चाल में यह विशेषता देखी थी यह पग नाप तोलकर क्रम से रखता है। सभी स्तनधारी जीवों में ऊंट की पद चाल बहुत क्रमित व्यवस्थित होती है इसकी व्यवस्थित चाल ही रेगिस्तान जैसी भीष्ण परिस्थिति में इसकी ऊर्जा के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । अन्य शारीरिक विशेषताओं के साथ-साथ ऊंट की विशेष चाल ही इसे रेगिस्तान का जहाज बनाती है। वही घोड़ा यदि ऊंट की चाल चले तो मार खा जाएगा। विधाता ने सभी जीवो की चाल नियत की है।

ऊंट के लिए संस्कृत का क्रमेल शब्द जो ऊंट की चाल संबंधित व्यवहार को वैज्ञानिक तौर पर समेटे हुए हैं यूरोप में पहुंचते पहुंचते लैटिन भाषा में कैमेलस हो गया उल्लेखनीय होगा ऊंट के जंतु वैज्ञानिक नाम में जिसे जीवों के नामकरण की लीनियस पद्धति कहते हैं उसमें आज भी कैमेलस शब्द ही प्रयोग होता है। इंग्लैंड में जाकर यह शब्द कैमल हो गया। पश्चिम एशिया में यह कैमल या कैमेल शब्द परिवर्तित होकर गमल हो गया यहां तक तो ठीक था लेकिन जब यह शब्द अरब में पहुंचा तो अरब के लोग आज भी ग के स्थान पर ज का उच्चारण करते हैं अर्थात अरब के लोगों के लिए गाफ बोलना कठिन है वह उसे अजमी में परिवर्तित कर देते हैं इस तरह वहां गमल के स्थान पर यह जमल शब्द हो गया आज भी अरबी भाषा में ऊंट को जमल कहा जाता है। अरब के कुछ देशों में जमल को ही जमाल कहा जाता है। किसी भाषा का शब्द किसी जब दूसरे देश में जाता है तो उसमें परिवर्तन उत्पन्न हो जाता है लेकिन उसका अर्थ वही रहता है। संस्कृत के शब्दों के साथ भी ऐसा ही हुआ। कभी-कभी तो यह परिवर्तन इतना स्पष्ट हो जाता है कि हम दो शब्दों की तुलना मात्र से ही पहचान लेते हैं लेकिन कभी-कभी यह परिवर्तन बहुत जटिल होता है फिर आम व्यक्ति इसका आकलन नहीं कर सकता क्योंकि संस्कृत दुनिया की सभी भाषाओं की जननी है इसका दुनिया की अन्य भाषाओं के साथ जनक जन्य संबंध है। हिंदी इसकी बेटी है अन्य भारतीय भाषाएं इसकी नातिन है व दुनिया की अन्य भाषाएं भी इसकी निकट या दूर की रिश्तेदारी ही है। संस्कृत के अन्य भाषाओं के साथ इस अनुठे संबंध को संस्कृत व्याकरण को समझने वाला व्याकरण का विद्वान या इस क्षेत्र में काम करने वाला भाषाविद ही समझ सकता है। इसमें भी शर्तें लागू है ऐसा व्यक्ति भी मत पंथ मजहब नस्ल के दुराग्रह से मुक्त होना चाहिए ।

वैसे भी आदिम देव भाषा संस्कृत के उत्पत्ति स्थान ज्ञान विज्ञान की आदिम भूमि भारत में भी इसके कोई कम निंदक आलोचक नहीं है कुछ स्वयं घोषित भाषाविद तो संस्कृत की उत्पत्ति तमिल से बताते हैं तो कोई प्राकृत भाषा को तमिल से प्राचीन बताता है वगैरा-वगैरा संस्कृत के संबंध में यह सभी तथ्य मान्यताएं निराधार है।

अंततोगत्वा आपसे केवल इतना ही आग्रह है यदि आप अपने बच्चों को संस्कृत भाषा का अध्ययन नहीं करा सकते संस्कृत भाषा के अध्ययन को समर्पित किसी आर्ष गुरुकुल की आर्थिक मदद नहीं कर सकते तो आप यह तो कर ही सकते हैं अपने बच्चों को यह तो बता ही सकते हैं कि मेरे बेटे बेटियों अंग्रेजी वर्णमाला के सी लेटर से कैमल नहीं संस्कृत की क्रम धातु से कैमल शब्द बना है। ऐसा कर हम और आप संस्कृत जैसी वैज्ञानिक भाषा इसके व्याकरण पर अथाह बौद्धिक परिश्रम करने वाले कात्यायन, बुडिल, पाणिणी, पतंजलि जैसे असंख्य ऋषियों के ऋषि ऋण से कुछ अंश तक मुक्त हो जाएंगे।

लेखक – आर्य सागर
तिलपता ग्रेटर नोएडा

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