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काल और धर्म का सम्बन्ध

  • ब्र0 वेदव्रत मीमांसक

युग-काल को मापने के जैसे घटी, मुहूर्त, तिथि, मास और वर्ष आदि मान हैं इसी प्रकार युग भी एक मानदण्ड है युग चार प्रकार के हैं। 1 कलियुग 2 द्वापर युग 3 त्रेता युग तथा 4 सतयुग। कलियुग 432000 वर्षों का होता है; द्वापर 864000 वर्षों का, त्रेता 1296000 वर्षों का तथा सतयुग 1728000 वर्षों का। इन चारों युगों को सम्मिलित करके महायुग अथवा चतुर्युग कहा जाता है। इस प्रकार एक सहस्र चतुर्युगोें का एक ब्राह्मदिन होता है। इतना ही प्रलय वा ब्रह्मरात्रि का समय होता है। काल जड़ होने से धर्माधर्म में साधक नहीं है। यदि काल कारण होता तो सत्ययुग में सब धर्मात्मा ही होते और कलियुग में पुण्यात्मा न होते, किन्तु यह प्रमाणविरूद्ध है। सत्य युग में यदि धर्म के चार चरण पूर्ण रूप से विद्यमान होते तो राज कुमार ध्रुव की विमाता को राज्य लोभ न होता और उत्तानपाद को पुत्र से अधिक पत्नी प्रिय न होती।

इसी प्रकार त्रेता में जिसमें धर्म के तीन चरण थे राजा कंस द्वारा जनता पर घोर अत्याचार न होते और इसके विरूद्ध कलियुग में जिसमें धर्म का एक ही चरण शेष रह जाता है देश, धर्म के लिए प्राण देते वाले हकीकतराय, गुरूगोबिन्दसिंह जी के धर्मप्राण बालकों का जन्म न होता। राणाप्रताप समर्थगुरू रामदास, शिवाजी, वीर वैरागी, मंगल पांडे, लक्ष्मीबाई, तांत्याटोपे, सुभाषचन्द्र बोस, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, लाला लाजपतराय, तिलक, स्वामी शंकराचार्य, ऋषि दयानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानन्द, चाणक्य, चन्द्रगुप्त, सरदार पटेल, राजा राममोहनराय जैसे सहस्रों महान् आत्माओं का जन्म न होता। इससे स्पष्ट है कि सत्ययुग आदि का धर्म के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। धर्म का मनुष्य के साथ संबंध है। धर्म देशकाल परिस्थिति से परे है। यदि धर्माधर्म काल से सम्बद्ध होता तो मनुष्य को धर्मात्मा-अधर्मात्मा नहीं कहना चाहिए, पाप-पुण्य भी नहीं होने चाहिए। इसके साथ ईश्वर पर बड़ा दोष उपस्थित होगा कि काल के साथ धर्म को बाँध दिया। इसके साथ कर्म वा कर्मफल सिद्धांत कपोल कल्पित हो जायेंगे। नास्तिक से नास्तिक भी कर्मफल को मानता है, उनकी यह मान्यता भी मिथ्या माननी पड़ेगी। मनुष्य स्वतन्त्र न होकर कर्म करने में परतन्त्र हो जायेगा। सर्वोपरि बात है कि वेदों में ऐसा कहीं नहीं है कि सत्य युग में धर्म के चार चरण विद्यमान रहते हैं, त्रेता में तीन, द्वापर में दो और कलि में एक। धर्म के साथ युगों का संबंध जोड़ना कपोलकल्पना मात्र है। जब सत्य युग में धर्म पूर्ण रूप से विद्यमान होता है तो भगवान् के मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह आदि चार-चार अवतारों की क्या आवश्यकता है ?
वास्तव में आलंकारिक भाषा में जैसा कहा जाता है कि दिन देवता है और रात्रि दैत्य है इसी प्रकार कहीं-कहीं ऐसा कहा गया है कि सत्ययुग में धर्म अधिक होता है और कलि में न्यून। इसका अर्थ यह नहीं है कि सत्ययुग में धर्म के चार और त्रेता, द्वापर और कलि में तीन, दो, एक चरण रहते हों। क्योंकि लिखा है कि “कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलि ये सब राजा की परिस्थिति के नाम हैं क्योंकि राजा का नाम ही युग है। यदि राजा सोया हुआ हो तो उसका नाम कलियुग है। यदि राजा जागता हो तो उसका नाम द्वापर युग है और यदि स्वकत्र्तव्य पालन में उद्यत हो तो उस का नाम त्रेता युग है और यदि राजा न्यायोचित कर्म करे तो उसका नाम सत्ययुग है। (302 मनु स्मृति अध्याय 9)”

(ज्योतिष विवेक से)
शांतिधर्मी के द्वितीय अंक मार्च 1999 ई0 में प्रकाशित

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