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मुद्दा

पेपर-लीक,नकल और परीक्षा-नियंत्रक की मजबूरियां

हाल ही में, प्रश्नपत्रों का लीक होना और परीक्षाओं में नकल का प्रचलन, मीडिया,परीक्षार्थियों,उनके अभिभावकों,जन-प्रतिनिधियों,बुद्धिजीवियों आदि के बीच चिंता और व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। इस प्रवृत्ति ने न केवल परीक्षार्थियों, उनके अभिभावकों और शिक्षकों को निराश किया है, बल्कि देश की शिक्षा प्रणाली की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचाया है। अपने समय में विभिन्न परीक्षाओं के […]

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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

5 मार्च जयंती : राष्ट्रीयता के कवि सोहनलाल द्विवेदी

डॉ. हरिप्रसाद दुबे – विनायक फीचर्स राष्ट्रकवि पं. सोहनलाल द्विवेदी का जन्म 5 मार्च 1906 ई. को फतेहपुर जनपद के बिन्दकी गांव में हुआ था। उनके पिता पण्डित बिन्दाप्रसाद दुबे धार्मिक और सरल स्वभाव के थे। ग्राम परिवेश में प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने के बाद माध्यमिक और स्नातक परीक्षाएं उत्तीर्ण करके उन्होंने स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। कविता के माध्यम से सोहन लाल द्विवेदी ने राष्टï्रभारती की अनन्य आराधना की। इन्होंने बाल साहित्य की अनेक कृतियों का सृजन किया, जिनमें शिशु भारती, बॉंसुरी, बाल भारती, झरना और बच्चों के बापू प्रमुख हैं। काव्य के इतिहास पुरुष और स्वाधीनता आन्दोलन के मेरूदण्ड सोहन लाल द्विवेदी की रचनाओं ने जनमानस को विदेशी शक्तियों के विरुद्ध जूझने की शक्ति दी। उनकी सच्ची कविता ने प्रसुप्त हृदयों को जगाकर पथ प्रदर्शित कर ऊर्जावान होने के लिए प्रवृत्त किया। द्विवेदी जी कवियों की मणिमाला के जगमगाते रत्न थे। मातृभूमि के अनन्य उपासक सोहनलाल द्विवेदी की वन्दना की कामना भी अनूठी है। वे स्वातंत्र्य के महासंग्राम में प्राण प्रण समर्पित रहे। राष्टï्र के प्रति उच्च भावना थी। हिन्दी और संस्कृत के पारंगत विद्वान द्विवेदी जी निष्काम भाव से साहित्य सर्जना में आजीवन संम्पृक्त रहे। वे गांधीवादी विचार धारा के प्रतिनिधि कवि थे। राष्टï्रीय रचनाओं के साथ-साथ उनकी पौराणिक रचनाओं को भी आदर मिला। पूजा गीत, भैरवी, विषपान, वासवदत्ता और जय गांधी कृतियां हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। ‘युगावतार गांधीÓ रचना के राग, लय ने सोहनलाल जी के कृतित्व को उच्चता प्रदान की। युग पुरुष महात्मा गांधी के व्यक्तित्व को जितनी जीवन्तता उन्होंने दी वह अप्रतिम ही है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद की परिस्थितियों पर राष्टï्रनिष्ठï पं. द्विवेदी को पीड़ा हुई, जिसे उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया है। सोहनलाल द्विवेदी की अन्य कृतियों में हम बालवीर, गीत भारती, युगाधार, चित्रा, बासन्ती, प्रभाती, चेतना, कुणाल और संजीवनी आदि हैं। उनकी रचनाओं में अलग-अलग अनेक रंग हैं। इनकी काव्य-निर्झरिणी में अवगाहन करके जीवन पथ पर नये आयाम मिलते हैं। पं. द्विवेदी का कुणाल काव्य इतना श्रेष्ठï है कि यह उन्हें राष्टï्रीयता का अनन्य प्रेमी ही नहीं वीरोपासक कवि के रूप में स्थापित करता है। यह हिन्दी में राष्टï्रीय महाकाव्य की कमी पूर्ण करने में समर्थ है। अपने कवि कर्म के प्रति सजग रहे सोहनलाल द्विवेदी ने 1965 में देश पर आए अन्न संकट के समय कृषकों को जाग्रत करने वाली सर्जना की। बाल साहित्य की विशिष्टï सेवा के उत्तरप्रदेश शासन ने उन्हें पुरस्कृत किया। इसके पश्चात्ï दीर्घकालीन विशिष्टï उत्कृष्टï सारस्वत साधना पर उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान ने पन्द्रह हजार रुपए की धनराशि पुरस्कार स्वरूप प्रदान करके सम्मानित किया। भारत सरकार ने पं. सोहनलाल द्विवेदी की राष्टï्रीय एवं बाल साहित्य की सारस्वत सेवा पर उन्हें 1969 में पद्ïमश्री अलंकरण से विभूषित करके उनके अप्रतिम अवदान को प्रतिष्ठिïत किया। वे महान व्यक्ति थे।  रामायण एवं तुलसी मर्मज्ञ पं. बद्रीनारायण तिवारी उनके अनन्य प्रशंसक रहे हैं। वे लिखते हैं ‘तुलसीदलÓ में सहजता ही जिनकी प्रमुख विशेषता है। कवि, पत्रकार दोनों रूपों में यशस्वी स्थान रहा है। अपनी लेखनी से द्विवेदी जी ने देश के गौरव की चिन्ता की। उनकी रचना ‘जवानों ने विजयश्री से मुकुट मां का संवारा है। किसानों। अन्न धन से अब तुम्हें आंचल सजाना है। हमारी अन्नपूर्णा मां न मांगे अन्न की भिक्षा। करोड़ों हाथ से मां का नया संबल सजाना है।Ó जन-जन की कंठहार बन गई। मानवीय मूल्यों में वे मनीषी कवि थे। पं. सोहनलाल द्विवेदी अत्यन्त सहृदय और निश्छल स्वभाव के थे। पत्रों के उत्तर तुरन्त देने की अनूठी दृष्टि अन्य रचनाकारों से पृथक थी। उनमें परोपकार, दया, क्षमा और कुशाग्र दृष्टिï अन्तर्मन तक थी। जीवन उत्तराद्र्ध में जब भी अस्वस्थ हुए तो पं. बद्रीनारायण तिवारी को सूचित करने में कोई संकोच नहीं करते थे। हिन्दी युग पुरुष पं. नारायण चतुर्वेदी, श्रीपति मिश्र से भी सम्पृक्त रहे। कविवर विनोदचन्द्र पाण्डेय ‘विनोदÓ की सृजनात्मकता पर द्विवेदी जी मुग्ध थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का प्रभाव  द्विवेदी की तुलसीदल के प्रति साहित्यिक दृष्टिï से है- है शब्द-शब्द में भरा भाव, है छन्द-छन्द में भरा ज्ञान। है वाक्य-वाक्य में अमरवचन, वाणी में वीणा का विधान। अपनी रचनाओं में द्विवेदी जी विनम्रता का भाव भरते हैं- ‘मैं मंदिर का दीप तुम्हारा जैसे चाहो इसे जलाओ जैसे चाहो इसे बुझाओ इसमें क्या अधिकार हमारा जला करेगा ज्योति करेगा जीवनपथ का तिमिर हरेगा होगा पथ का एक सहारा बिना देह यह चल न सकेगा अधिक दिवस यह जल न सकेगा भरे रहो इसमें मधु धारा मैं मंदिर का दीप तुम्हारा॥‘ 1976 में सोहनलाल द्विवेदी ने तुलसीदल की अष्टदलीय भव्यमाला गूंथ के तुलसी की उद्भावनाएं प्रगट की हैं। कवि की उच्च दृष्टि इस प्रकार है- ‘गूंजो फिर बनकर रामनाम रणवीरों के मन से अकाम। नवराष्ट्र जागरण के युग में तुलसी गूंजो तुम धाम-धाम॥ दो हमको भूली कर्म शक्ति, दो हमको फिर से आत्मबोध। दो हमें राम के मानस का वह क्षत्रिय का अपमान क्रोध॥ कुलपति श्री गिरिजाप्रसाद पाण्डेय ने पं. द्विवेदी के अमृत महोत्सव अगस्त 1980 में लखनऊ वि.वि. में कहा था ‘राष्ट्रकवि पं. सोहनलाल द्विवेदी की रचनाएं आज भी उच्च सांस्कृतिक मूल्यों से जोडऩे में समर्थ हैं। द्विवेदीजी अपने युग की एक विभूति हैं।  ‘भैरवी’ की भूमिका डॉ. सम्पूर्णानन्द ने लिखी। राजस्थान विद्यापीठ ने 1973 में साहित्य चूड़ामणि कानपुर वि.वि. ने 1975 में डी.लिट्ï की मानद उपाधि प्रदान की। उनके समग्र साहित्य में मानवता की दृष्टि भरी है। राष्ट्रकवि द्विवेदी जी 1 मार्च 1988 को चल बसे। (विनायक फीचर्स)

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आज का चिंतन

◼️आर्यावर्त क्या है?◼️*

◼️आर्यावर्त क्या है?◼️ ✍🏻 लेखक – प्रो० उमाकान्त उपाध्याय, एम० ए० प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’ जब कभी भ्रान्त विचार चल पड़ते हैं तो उनके अवश्यम्भावी अनिष्टकारी परिणामों से बचना दुष्कर हो जाता है। इसी प्रकार का एक अशुद्ध भ्रान्त विचार यह है कि आर्यावर्त की सीमा उत्तर भारत तक ही है और आर्यावर्त की दक्षिणी […]

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आज का चिंतन बिखरे मोती

जीवन की पतवार है, संयम और विवेक ।

  बिखरे मोती जीवनी नैया की पतवार क्या है! जीवन की पतवार है, संयम और विवेक । संयम साधै संतुलन, विवेक लगावै ब्रेक॥2560॥ विशेष :- सुख-शान्ति का स्रोत कहाँ है ? :- धन में संतुष्टि नहीं, अध्यात्म देय संतोष । देवयान का मार्ग ये, सुख-शान्ति का कोष॥2561॥ विशेष :- जब हृदय परिवर्तन होता है, तो […]

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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति – 308 वेदमंत्रों के उपदेश

    (ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं ) प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’) गताँक से आगे…. इस प्रकार से आवश्यकता पड़ने पर लड़नेवाला राजा अपने युद्धोपकरणों को मिट्टी के घरों में न रक्खे । इसके […]

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मुद्दा

स्फटिक शिला राम की महिमा और जयंत की कुटिलता का साक्षी

आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी चित्रकूट के जानकी कुंड से लगभग 2 किलोमीटर दक्षिण रामघाट से ऊपर की ओर में मां मंदाकिनी के सुरम्य तट पर सघन वृक्षों से आच्छादित परम रमणीय स्फटिक शिला नामक एक छोटी सी चट्टान है। जो हल्का पीला चमकीला और सदैव ठंडा रहा करता है। देवत्व के अभिमान को दंडित […]

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आज का चिंतन कविता

हम सनातन

  हम सनातन, हम सनातन, युगों-युगों से इस धरा पर, बस बचे हैं हम यहाँ पर, हम अधुनातन हम पुरातन।   सृष्टि का आगाज हम हैं, कल भी थे और आज हम हैं, सहस्त्रों वर्षों की कहानी, दुनिया भर में है निशानी।   विश्व भर से ये कहेंगे, हम रहे हैं,  हम रहेंगे अपनी जिद […]

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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

स्वामी भीष्म जी की एक रचना

  कैसे शिक्षा पुरानी भुलाई गई।।टेक।। गर्भ से अन्त्येष्टि तक संस्कार करते थे। पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य से प्यार करते थे। गुरुकुल में पढ़ते थे इकरार करते थे। गृहस्थी वेद विद्यालयों का उद्धार करते थे। जो भी जिस प्रकार गृहस्थी धन कमाते थे। नियम से दशमांश गुरुकुल में पहंुचाते थे। इसलिये निःशुल्क गुरुकुल में पढ़ाते […]

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समाज हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

महर्षि दयानन्द जी का स्वकथित जीवनचरित्र, भाग 5      सिद्धपुर के मेले में, अपनी भूल से पिता की कैद में-

सिद्धपुर के मेले में, अपनी भूल से पिता की कैद में कोट कांगड़े में मैंने सुना कि सिद्धपुर में कार्तिक का मेला होता है वहां कोई तो योगी अपने को मिलेगा और अमर होने का मार्ग बता देगा इस आशा से मैंने सिद्धपुर की बाट पकड़ी। मार्ग में मुझे थोड़ी दूर पर पास के एक […]

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विविधा

प्रवासी मजदूरों के बच्चे और उनके शैक्षणिक विकास का प्रश्न

छोटू सिंह रावत अजमेर, राजस्थान बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण की स्थिति को सुधारने के लिए सरकार कई सालों से प्रयासरत है. बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य का बेहतर विकास हो इसके लिए केंद्र से लेकर सभी राज्य सरकारों ने अपने अपने स्तर से कई तरह की योजनाएं चला रखी हैं. इसके अतिरिक्त कई स्वयंसेवी संस्थाएं […]

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