Categories
समाज हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

महर्षि दयानन्द जी का स्वकथित जीवनचरित्र, भाग 5      सिद्धपुर के मेले में, अपनी भूल से पिता की कैद में-

सिद्धपुर के मेले में, अपनी भूल से पिता की कैद में

कोट कांगड़े में मैंने सुना कि सिद्धपुर में कार्तिक का मेला होता है वहां कोई तो योगी अपने को मिलेगा और अमर होने का मार्ग बता देगा इस आशा से मैंने सिद्धपुर की बाट पकड़ी। मार्ग में मुझे थोड़ी दूर पर पास के एक ग्राम का रहने वाला वैरागी मिला जो हमारे कुल से भली-भांति परिचित था। उसको देखकर जैसे कि मेरा हृदय उमड़ कर नेत्र भर आये वैसी ही उसकी दशा देखने में आई। जब उसने मेरा सम्पूर्ण वृत्तान्त पास के धनादि का ठगा जाना और साहेला (सायेला) ग्राम के ब्रह्मचारी के पास मुंडना सुना और गेरुआ कुर्ता देखा तो प्रथम कुछ हंसा, पीछे उसने मुझ को अतीव खेद के साथ घर से निकल आने पर धिक्कारा और पूछा कि क्या घर छोड़ दिया ? मैंने उसकी पहली भेंट के कारण स्पष्ट कह दिया कि हां, घर छोड़ दिया और कार्तिक के मेले पर सिद्धपुर (सिद्धपुर स्वयं रेलवे स्टेशन है और वहां सरस्वती नदी के तट पर कार्तिक का मेला होता है और औदीच्य ब्राह्मणों के लड़कों का मुंडन भी वहां होता है) जाऊंगा। यह कह कर मैं वहां से चल दिया और सिद्धपुर में आकर नीलकंठ महादेव के स्थान में ठहरा कि जहाँ पर दण्डी स्वामी और बहुत बह्मचारी पहले से ठहरे थे, उनका सत्संग और जो कोई महात्मा विद्वान् पंडित मेले में मिला। उससे मेल-मिलाप किया वार्ता की और दर्शनों से लाभ उठाया। इस अन्तर में उस पड़ौसी वैरागी ने जो कोटकांगड़े में मुझको मिला था जाकर मेरे पिता के पास एक पत्र भेजा कि तुम्हारा लड़का काषायवस्त्र धारण किये ब्रह्मचारी बना हुआ यहाँ मुझ को मिलकर कार्तिकी मेले में सिद्धपुर को गया है।
ऐसा सुनकर तत्काल मेरा पिता चार सिपाहियों सहित सिद्धपुर को आया। मेले में मेरा पता लगाना आरम्भ किया। एक दिन उस शिवालय में जहां मैं उतरा था प्रात:काल एकाएक मेरे बाप और चार सिपाही मेरे सम्मुख आ खड़े हुए। उस समय वह ऐसे क्रोध में भरे हुए थे कि मेरी आंख उनकी ओर नहीं होती थी। जो उनके जी में आया सो कहा और मुझे धिक्कारा कि तूने सदैव को हमारे कुल को दूषित किया और तू हमारे कुल को कलंक लगाने वाला उत्पन्न हुआ।
मेरे मन में आतंक बैठ गया कि कदाचित् मेरी कुछ दुर्दशा करेंगे। इस डर से मैंने उठकर उनके पांव पकड़ लिये। मेरा पिता मुझ पर बहुत क्रुद्ध हुआ ।

पिता से डर कर असत्य भाषण, परन्तु ध्यान फिर भी भागने में रहा-

मैंने प्रार्थना की कि मैं धूर्त लोगों के बहकावे में आकर इस ओर निकल आया और अत्यन्त दुःख पाया। आप शान्त हों, मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये । यहां से मैं घर आने को ही था, अच्छा हुआ कि आप आ गये हैं। आपके साथ ही चलने में प्रसन्न हूं। इस पर भी उनका कोपाग्नि शान्त न हुआ और झपट कर मेरे कुर्ते की धज्जियां उड़ा दीं और तूंबा छीन कर बड़े जोर से धरती पर दे मारा और सैकड़ों प्रकार से मुझे दुर्वचन कहे और दूसरे नवीन श्वेत वस्त्र धारण कराकर जहां ठहरे थे वहां मुझ को ले गये और वहां भी बहुत कठिन कठिन बातें कहकर बोले कि तू अपनी माता की हत्या किया चाहता है। मैंने कहा कि अब मैं चलूंगा तो भी मेरे साथ सिपाही कर दिये और उन्हें कह दिया कि कहीं क्षण भर भी इस निर्मोही को पृथक् मत छोड़ो और इस पर रात्रि को भी पहरा रखो , परन्तु मैं भागने का उपाय सोचता था और अपने निश्चय में वैसा ही दृढ़ था जैसे कि वे अपने यल में संलग्न थे। मुझ को यही चिन्ता थी और इसी घात में था कि कोई अवसर भागने का हाथ लगे।

भागने का अवसर मिल गया, स्वजनों से अन्तिम भेंट-
दैवयोग से तीसरी रात्रि के तीन बजे पीछे पहरे वाला बैठा-बैठा सो गया। मैं उसी समय वहां से लघुशंका के बहाने से भागकर आध कोस पर एक बगीचे के मन्दिर के शिखर में एक वटवृक्ष के सहारे से चढ़कर जल का लोटा साथ लेकर छुपकर बैठ गया और इस प्रतीक्षा में रहा कि देखिये अब दैव क्या-क्या चरित्र दिखाता है और सुनता रहा कि सिपाही लोग जहां-तहां मुझको पूछते फिरते हैं और बड़ी सावधानी से उस मन्दिर के भीतर-बाहर ढूंढ रहे हैं और वहां के मालियों से मुझ को पूछते फिरते हैं और बड़ी सावधानी से उस मन्दिर के भीतर-बाहर ढूंढ रहे हैं ओर वहां के मालियों से मुझ को पूछा और खोजते – खोजते असफल तथा निराश ही हो गये कि इस ओर की खोज वृथा है, विवश होकर वहां से लौट गये। परन्तु मैं उसी प्रकार अपने श्वास को रोके हुए दिन भर उपवास करता हुआ वहीं बैठा रहा, इस विचार से कि किसी नवीन आपत्ति में न फंस जाऊं। जब अन्धकार हुआ तब रात के सात बजे उस मन्दिर से नीचे उतर कर सड़क छोड़ किसी से पूछ वहां से दो कोस एक ग्राम था; वहां जाकर ठहरा और प्रात:काल वहां से चला । इसी को अपने ग्राम के या घर के मनुष्यों की अन्तिम भेंट कहा जाये तो अनुपयुक्त नहीं होगा। इसके पश्चात् एक बार प्रयाग में मेरे ग्राम के कुछ लोग मुझ को मिले थे, परन्तु मैंने पहचान नहीं दी। उसके पश्चात् आज तक किसी से भेंट नहीं हुई।

(कार्तिक में सिद्धपुर आये और तीन मास कोटकांगड़ा में रहे और एक मास के लगभग वहां लाला भक्त के ग्राम साहिला (सायला) में रहे । पांच-सात दिन का मार्ग है इस हिसाब से विदित होता है कि स्वामी जी जेठ संवत् १९०३ वि० के अन्त में तदनुसार मई, सन् १८४६ में घर से निकले थे ।)

वेदान्ती संन्यासियों की संगति में जीव-ब्रह्म की एकता का निश्चय –

अहमदाबाद से होता हुआ बड़ौदा नगर में आकर ठहरा और चेतनमठ में ब्रह्मचारियों और संन्यासियों से वेदान्त विषय पर बहुत बातें कीं। मुझ को ऐसा निश्चय उन ब्रह्मानंद आदिक ब्रह्मचारियों और संन्यासियों ने करा दिया कि ब्रह्म हम से कुछ पृथक नहीं। मैं ब्रह्म हूं अर्थात् जीव और ब्रह्म एक हैं । यद्यपि प्रथम ही वेदान्तशास्त्र के पढ़ते समय मुझ को कुछ इसका विचार हो गया था परन्तु अब तो मैं इसको अच्छी प्रकार समझ गया ।

क्रमशः

 

डॉ राकेश कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
casibom
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet giriş
betpark
betpark
betgaranti
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet
bettilt giriş
bettilt giriş
harbiwin giriş
harbiwin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
Hitbet giriş
xbahis
xbahis