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मुद्दा

स्फटिक शिला राम की महिमा और जयंत की कुटिलता का साक्षी

आचार्य डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

चित्रकूट के जानकी कुंड से लगभग 2 किलोमीटर दक्षिण रामघाट से ऊपर की ओर में मां मंदाकिनी के सुरम्य तट पर सघन वृक्षों से आच्छादित परम रमणीय स्फटिक शिला नामक एक छोटी सी चट्टान है। जो हल्का पीला चमकीला और सदैव ठंडा रहा करता है। देवत्व के अभिमान को दंडित करने वाला चित्रकूट का यह स्फटिक शिला क्षेत्र है। इस समय इसे छत से सुरक्षित किया गया है। कहा जाता है कि इसी इस फटिक शिला पर प्रभु श्री राम एवं माता सीता विश्राम किया करते थे। माता सीता ने प्रभु श्री राम के साथ  बैठकर ज्यादातर समय इसी शिला पर व्यतीत कर चित्रकूट की सुन्दरता निहारते रहते थे।
ऐसा माना जाता है कि एक बार भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता का यहीं पर फूल पत्तों से श्रृंगार किया था। पौराणिक कथाओं में देवराज इन्द्र के पुत्र जयन्त की कथा बहुत रोचक ढंग से वर्णित है। उसके मन में भगवान के इस कार्य से आशंका हो गई कि ईश्वर ऐसा लौकिक क्रिया कैसे कर सकता है। जयंत कौवे का रूप बदलकर मनुष्यों को तंग किया करता था। लोगों को परेशान करने में उसे आनंद आता था। कौवे का रूप धारण कर वह श्री रामजी का बल देखना चाहता था। तुलसीदास लिखते हैं –
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥
(जैसे मंदबुद्धि चींटी समुद्र की थाह पाना चाहती हो उसी प्रकार से उसका अहंकार बढ़ गया था और इस अहंकार के कारण वह अपनी एक आंख खो बैठा। )
गोस्वामी तुलसीदास ने इस प्रसंग की शुरुवात इस प्रकार की है –
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥
( एक बार सुंदर फूल चुनकर श्री रामजी ने अपने हाथों से भाँति-भाँति के गहने बनाए और सुंदर स्फटिक शिला पर बैठे हुए प्रभु ने आदर के साथ वे गहने श्री सीताजी को पहनाए।)
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥
( देवराज इन्द्र का मूर्ख पुत्र जयन्त कौए का रूप धरकर श्री रघुनाथजी का बल देखना चाहता है। जैसे महान मंदबुद्धि चींटी समुद्र का थाह पाना चाहती हो)
सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥
(माता सीता को तंग करने के लिए उसने माता के पैर में चौंच मार दी।) माता के पैरों से रक्त बहने लगा। यह देखकर प्रभु श्री राम क्रोधित हो गए।
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥
(उन्होंने स्फटिक की शिला पर मौजूद एक सींक (सरकंडे)
को बिना फड़ का बाण बनाया और जयंत के तरफ फेंक  दिया।
प्रभु श्रीराम के प्रहार से बचने के लिए जयंत तीनों लोको में भागता रहा परंतु कहीं भी उसे संरक्षण नहीं मिला। परम पिता ब्रह्मा जी ने किसी प्रकार के मदद से इनकार कर दिया। शिव जी भी राम जी से वैर लेना उचित नही समझा। इन्द्र को तो कुछ भी उपाय ही नही सूझ रहा था।
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह॥1॥
(श्री रघुनाथजी, जो अत्यन्त ही कृपालु हैं और जिनका दीनों पर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणों के घर मूर्ख जयन्त ने आकर छल किया था। )
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा॥
धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥
( मंत्र से प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया, पर श्री रामजी का विरोधी जानकर इन्द्र ने उसको अपने पास रुकने नहीं दिया ।)
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।
(तब वह निराश हो गया, उसके मन में भय उत्पन्न हो गया, जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों में थका हुआ और भय-शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा।)
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही ॥
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।
(पैर रखना तो दूर रहा किसी ने उसे बैठने तक के लिए नहीं कहा। श्री रामजी के द्रोही को कौन रख सकता है? काकभुशुण्डिजी कहते हैं- है गरुड़ ! सुनिए, उसके लिए माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है।)
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।
(मित्र सैकड़ों शत्रुओं की सी करनी करने लगता है। देव नदी गंगाजी उसके लिए वैतरणी (यमपुरी की नदी) हो जाती है। हे भाई! सुनिए, जो श्री रघुनाथजी के विमुख होता है, समस्त जगत उनके लिए अग्नि से भी अधिक गरम या जलाने वाला हो जाता है।)
नारद देखा बिकल जयंता। लगि दया कोमल चित संता॥
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।
(नारदजी ने जयन्त को व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गई, क्योंकि संतों का चित्त बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे समझाकर तुरंत श्री रामजी के पास भेज दिया। उसने वापस जाकर पुकारकर कहा- हे शरणागत के हितकारी! मेरी रक्षा कीजिए ।)
आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहीं पाई।
(आतुर और भयभीत जयन्त ने जाकर श्री रामजी के चरण पकड़ लिए और कहा- हे दयालु रघुनाथजी! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता – सामर्थ्य को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था।)
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ।
सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी।
(अपने कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपकी शरण तक कर आया हूँ। शिवजी कहते हैं- हे पार्वती! कृपालु श्री रघुनाथजी ने उसकी अत्यंत आर्त्त – दुःख भरी वाणी सुनकर उसे एक आँख का काना करके छोड़ दिया।)
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम।
(उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिए यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्री रामजी के समान कृपालु और कौन होगा?)
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।
( अमृत के समान प्रिय हैं। फिर कुछ समय पश्चात श्री रामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गए हैं, इससे यहाँ बड़ी भीड़ हो जाएगी।)
वास्तव में यह दृश्य सौंदर्य को आदर देने का था। परन्तु इंद्र का पुत्र जयंत अपने घमंड में आया और अनादर कर चला गया। भगवान राम को तो तब पता चला जब रक्त बहता देखा।
‘चला रुधिर रघुनायक जाना।निज कर सींक बान संधाना।
अंत में उसे अपनी भूल का प्रायश्चित हुआ और वापस माता सीता के चरणों में दंडवत करके क्षमा याचना करने लगा। माता सीता ने पुत्र जयंत को क्षमा कर दिया परंतु प्रभु श्रीराम का प्रहार खाली नहीं जा सकता था । इसलिए कौवा पक्षी के रूप में आए जयंत की आंख में प्रतीकात्मक प्रहार हुआ । आखिरकार यह सींक का बाण तब शांत हुआ जब उसने शरण में आए हुए जयंत की एक आंख का हरण कर लिया। तभी से कौवा पक्षी को एक आंख से कम दिखाई देता है।
यहां पर आज भी एक शिला पर भगवान राम सीता और जयंत के पैरो और पंख के छाप देखे जा सकते हैं। यहां पर एक पंडित जी बैठकर श्रद्धालुओं का मार्ग दर्शन करते रहते हैं।स्फटिक शिला पर पूजा अर्चना करने वाले एक पंडित जी ने सभी श्रद्धालुओं को स्फटिक शिला के बारे में जानकारी देते हैं और उसके लोगों को स्फटिक शिला की परिक्रमा करने को कहते हैं। माता सीता भगवान राम और जयंत कौवे का चिन्ह चट्टान में उभरा हुआ देखा जा सकता है। यहां पर आसपास का नजारा बहुत ही खूबसूरत है। मंदाकिनी नदी का दृश्य बहुत ही मनोरम है। यहां पर मंदाकिनी नदी गहरी भी है।
स्फटिक शिला के आसपास बहुत सारे बंदर गाय आदि जानवर घूमते रहते हैं। इन्हें लोग खाने पीने की सामग्री अर्पित करते रहते हैं। स्फटिक शिला के पास ही में  लक्ष्मण जी के चरण भी देखने के लिए मिल जाते हैं।
स्फटिक शिला के ऊपर इस समय शेड लगा हुआ है। कोई यहां पर आकर बैठना चाहे, तो बैठ सकता है । यहां  राम जी और कृष्ण जी का मंदिर भी है। हर कोई उनके दर्शन कर सकता है । यहां पर  यज्ञशाला देखने के लिए भी मिलती है, जहां पर हर साल फरवरी महीने में यज्ञ होता है। यहां पर आकर बहुत अच्छा लगता है। यहां का वातावरण बहुत ही शांत है। यहां से  मंदाकिनी नदी का बहुत ही विहंगम दृश्य देखा जा सकता  है। यहां पर बहुत शांति है और सकारात्मक ऊर्जा महसूस होती है। इसी तीर्थ के निकट महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्व विद्यालय एवं श्री राम दर्शन संग्रहालय नामक आधुनिक तीर्थ संस्थाएं भी स्थापित हुई हैं।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वर्ड्सएप मोबाइल नंबर 9412300183 )

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