बौद्धिक उत्कृष्टता जहां-जहां ‘विभूति’ है जग में और दिखा करती ‘श्री’ कहीं, वह बनकर ‘अंश’ मेरे ‘तेज’ का , मानो जग में चमक रही। मैं अपने तेज के कारण अर्जुन! जगत को धारण किए रहूं, यह सृष्टि -नियम-अनुकूल बात है मानस में मेरे दमक रही।। जो भी सृष्टि में दिख रहा उसे भगवान की विभूति […]