ऐतरेय उपनिषद भी अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण उपनिषद है।इस उपनिषद् में तीन अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में यह स्पष्ट किया गया है कि सृष्टि के आरम्भ में केवल एक आत्मा ही था, उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं था। उसने लोक-रचना के लिये ईक्षण (विचार) किया। ईक्षण एक प्रकार का उच्चतम कोटि का तप है। […]