112- प्राची का पट खोल, बाल सूरज मुस्काया। भ्रमर कली खग ओस बिंदु को अतिशय भाया।। जागी प्रकृति तुरन्त, हुए गायब सब तारे। पुनः हुए तैयार, विगत में जो थे हारे।। उठे बालगण खाट छोड़ माँ – माँ – माँ रटने। माँ दौड़ी सब काम छोड़ लख आँचल फटने।। काँधे पर ले स्वप्न, सूर्य सँग […]
अवधपति! आना होगा