उत्तर प्रदेश को ‘उत्तम प्रदेश’ बनाने की बात कहने वाले ‘बीमार प्रदेश’ बनाकर छोडक़र गये हैं। साम्प्रदायिक आतंकवाद से जूझता रहा उत्तर प्रदेश ‘सरकारी आतंकवाद’ से भी जूझता रहा। यह ‘सरकारी आतंकवाद’ जातीय आधार पर अधिकारियों की नियुक्ति या पुलिस में भर्ती के रूप में तो देखा ही गया, साथ ही अधिकारियों और पार्टी के […]
Category: डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से
उसे हर प्रकार के शोषण से लडऩे और उसे उजागर करने के लिए प्रेरित किया जाता, राष्ट्र के नितांत ईमानदार और राष्ट्रसेवी आचार्य उसके भीतर की छिपी हुई मानवीय शक्तियों और प्रतिभाओं को सही दिशा और दशा प्रदान करते तो यह राष्ट्र अब तक स्वर्ग सम बन गया होता। इसमें दो मत नही हो सकते। […]
भारत की राजनीति का धर्म बन गया है :- कहां की पूजा नमाज कैसी कहां की गंगा कहां का जमजम। डटा है होटल के दर पै हर एक इमें भी दे दो इक जाम साहब।। भारत के राजनीतिज्ञों की इस मानसिकता के चलते राष्ट्रधर्म पीछे रह गया है। फिर भी हम वर्तमान संदर्भों में अपनी […]
उत्तराखण्ड के भूकंप के समय और गुजरात के भूकंप के समय मेरे मित्रों ने (जो या तो वहां गये या किसी भी प्रकार से निकटता से जुड़े रहे) मुझे बताया कि नकद धनराशि बहुत कमी के साथ उन लोगों तक पहुंच पाती है जिनके लिए वह भेजी जाती है। उसका अधिकांश भाग तो अधिकारियों के […]
परिस्थिति के निर्माता हम स्वयं वास्तव में सारी परिस्थितियों के हम स्वयं ही निर्माता हैं। परिस्थितियों को हम ही बनाते हैं, परिस्थितियां हमें कदापि नहीं बनाती हैं। लोकतंत्र को ‘लूटतंत्र’ में हमने ही तो परिवर्तित किया है। कैसे? जनता ने ‘वोट’ के बदले नेता से ‘नोट’ पाकर। अधिकारी ने मनचाहे स्थान के लिए ‘स्थानांतरण’ कराने […]
भ्रष्टाचारी भी नहीं और आय भी बहुत एक जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्टे्रट कह रहे थे कि जिलाधिकारी महोदय एक माह में 50 लाख रूपये तो तब कमा लेते हैं जब उन्हें किसी से रिश्वत या भ्रष्टाचार के माध्यम से कोई पैसा लेने या मांगने की आवश्यकता ही न पड़े। ऐसा सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ […]
जी हां! अपने प्यारे देश में ‘कमीशन’ ने सिद्घांतों का सौदा कर दिया है। इस ‘कमीशन’ के लिए अब तो समय आ गया है कि जब इसे भगवान मानकर इसकी आरती उतारी जाए। जिधर देखता हूं बस! उधर तू ही तू है। कि हर शय में जलवा तेरा हू ब हू है।। ‘कमीशन’ की इस […]
‘कमीशन’ का घुन खा रहा है, राष्ट्र को किंतु हम सब इस व्यवस्था के प्रति अभ्यस्त होने का प्रदर्शन करते हैं, न कि आंदोलित होते हैं, ऐसा क्यों? क्योंकि हमारे नेतागण ‘कमीशन’ का विष हमारी नसों में चढ़ाने में सफल रहे हैं। देखिये- जब कोई राष्ट्र अपने आदर्शों को भुलाकर उधारे आदर्शों का आश्रय लिया […]
दादरी रेलवे स्टेशन पर मैं अपने आदरणीय और श्रद्घेय भ्राता श्री देवेन्द्र सिंह आर्य (वरिष्ठ अधिवक्ता) के साथ फाटक बंद होने के कारण उनकी गाड़ी में बैठा रेलगाड़ी गुजरने की प्रतीक्षा कर रहा था। रेलगाड़ी पर्याप्त विलम्ब करने पर भी नहीं आयी। मैंने ज्येष्ठ भ्राता श्री से इतने पहले फाटक बंद कर देने का कारण […]
गांधीजी का कहना था कि- ”अगर पाकिस्तान बनेगा तो मेरी लाश पर बनेगा” परंतु यह उनके जीते जी ही बन गया। हां! ये अलग बात है कि वह उनकी लाश पर न बनकर देश के असंख्य लोगों की लाशों पर बना। क्या ही अच्छा होता कि यदि वह केवल उनकी ही लाश पर बनता तो […]