‘आर्याभिविनय’ नामक अपनी पुस्तक के दूसरे अध्याय के पहले मंत्र में स्वामी दयानंद जी महाराज लिखते हैं कि – “हे प्रभु ! आप के अनुग्रह से हम सब लोग परस्पर प्रीतिमान, रक्षक, सहायक, परम पुरुषार्थी हों। एक दूसरे का दुख न देख सकें। स्वदेशस्थादि मनुष्यों को परस्पर अत्यंत निर्वैर, प्रीतिमान, पाखंडरहित करें।” इस कथन से […]