शैल शिखर से गिरतीं नदियाँ, वसुधा के आँचल में। उच्छृंखल अनियंत्रित जल को, कूल सहेजे पल में।। हाहाकार मचातीं लहरें, तोड़ रहीं निज कूल। अवध यह समय – नहीं अनुकूल।। माली ने भगवान सरिस ही, नन्हा बीज उगाया। मातु-पिता ज्यों पाल-पोशकर, खिलने योग्य बनाया।। फूलों ने पंखुड़ियों के सँग, छुपा रखा है शूल। अवध यह […]
अवध यह समय नहीं अनुकूल