जिस वर्ष आर्य समाज की स्थापना हुई उसी वर्ष 1875 में अमेरिका के न्यूयार्क नगर में कुछ लोगों ने आत्मचिंतन के लिए एक सभा बनाने का निश्चय किया और इसे थियोसोफिकल सोसाइटी का नाम दिया। दो मास के अंदर ही इस सभा के सभासदों में परस्पर विग्रह उत्पन्न हो गया, तब यह विचार हुआ कि […]
Month: February 2018
स्वामी दयानन्द ने अपने लेखन में अनेक स्थलों पर इस आरोपण का खण्डन किया है कि वेद बहुदेववाद, एकाधिदेववाद अथवा देवतावाद का प्रतिपादन करते हैं। डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी उनसे सहमति जताते हुए लिखते हैं-”एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखनी चाहिए कि ‘देव’ शब्द एकार्थी नहीं, अनेकार्थी है। देव वह है जो मनुष्य को देता […]
एकतत्त्ववाद बनाम त्रैतवाद स्वामी दयानन्द एकेश्वरवाद को मानते हैं, जिसका अर्थ है कि ईश्वर एक है। वस्तुत: अनेकता की धारणा ईश्वर-विचार के विरूद्घ है। नव्य वेदांत की धारणा भी वेद में नहीं है। नव्य-वेदान्त का सिद्घान्त तो अनिर्वचनीय माया के वर्णन के बिना स्थापित ही नहीं होता। वेदों में माया शब्द का प्रयोग अविद्या अथवा […]
स्वामी दयानन्द का चरित्र क्या यह बतलाने की आवश्यकता है कि स्वामीजी का आचार वैसा ही महान था जैसा कि एक महापुरूष का होना चाहिए? शुद्घ आचार के बिना कोई महापुरूष नहीं हो सकता। उनका जीवन, उनका प्रचार कार्य, उनका कृतित्व, उनके शुद्घाचारी होने की पूर्ण साक्षी है। कैरेक्टर का अर्थ आचार है, किन्तु यह […]
(अ) बंगाल के पत्र (1) कलकत्ता का पत्र-बंगाली (3 नवंबर 1883), (2) इंडियन एम्पायर, कलकत्ता (4 नवंबर 1883), (3) हिंदू पेट्रियेट कलकत्ता (4) पब्लिक ओपीनियन, कलकत्ता (नवंबर 1883), (5) लिबरल कलकत्ता (11 नवंबर) (6) इंडियन मैसेंजर, कलकत्ता (11 नवंबर 1883), (7) इंगलिश क्रोनिकल, बॉकीपुर पटना (5 नवंबर 1883)। (आ) बम्बई प्रान्त के पत्र (1) इंडियन […]
जब दयानन्द ने सत्य की खोज में गृह-त्याग किया तब उनका झुकाव वेदान्त की ओर हो गया था। वे ऐसे विद्वान संन्यासियों के संपर्क में आ गये थे जिन पर शांकर मत का प्रभाव था। उन्होंने अनेक वर्षों तक वेदान्त दर्शन एवं तत्सम्बन्धी ग्रंथों का अध्ययन एवं विचार किया था। एक समय तो वे भी […]
संसार में जितने भी ऋषि, महात्मा हुये है-हालांकि उनकी आपस में तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि प्रत्येक अपने-अपने विषय में महान थे। परन्तु महर्षि दयानन्द को महर्षि की उपाधि इसलिये मिली क्योंकि अन्य ऋषियों ने जहां अपने-अपने धर्म या मान्यताओं का गुणगान किया वहीं महर्षि दयानन्द ने अपने धर्म व मान्यताओं का गुणगान तो […]
महाराणा सज्जनसिंह की स्वामीजी से प्रथम भेंट तो नवंबर 1881 में चित्तौड़ में ही हो गयी थी। उस समय ही मेवाड़ नरेश के हृदय में स्वामीजी के प्रति आदर और भक्ति के भावों का बीजारोपण हो गया था, तथा उन्होंने स्वामीजी से राजधानी उदयपुर आने का अनुरोध भी किया था। इसे क्रियान्वित करने का अवसर […]
” स्वामीजी महाराज पहले महापुरूष थे जो पश्चिमी देशों के मनुष्यों के गुरू कहलाये।… जिस युग में स्वामीजी हुए उससे कई वर्ष पहले से आज तक ऐसा एक ही पुरूष हुआ है जो विदेशी भाषा नहीं जानता था, जिसने स्वदेश से बाहर एक पैर भी नहीं रखा था, जो स्वदेश के ही अन्नजल से पला […]
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज की 194वीं जयन्ती के अवसर पर विशेष सम्पादकीय महर्षि दयानन्द के व्यक्तित्व को किसी एक आलेख में आबद्घ किया जाना सर्वथा असम्भव है। जो व्यक्ति सम्पूर्ण क्रान्ति का अग्रदूत बनकर अपने देश में आया और सम्पूर्ण मानवता के उद्घार व कल्याण का मार्ग अज्ञानान्धकार में भटकते विश्व समुदाय को देकर […]