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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से विशेष संपादकीय हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

महर्षि ! तुझे प्रणाम, कोटिश: नमन

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज की 194वीं जयन्ती के अवसर पर विशेष सम्पादकीय

महर्षि दयानन्द के व्यक्तित्व को किसी एक आलेख में आबद्घ किया जाना सर्वथा असम्भव है। जो व्यक्ति सम्पूर्ण क्रान्ति का अग्रदूत बनकर अपने देश में आया और सम्पूर्ण मानवता के उद्घार व कल्याण का मार्ग अज्ञानान्धकार में भटकते विश्व समुदाय को देकर गया-उसका व्यक्तित्व सचमुच एक आलेख में समाहित किया जाना असम्भव ही है।
देशोपकारक महर्षि दयानन्द
गुजरात के टंकारा की पवित्र भूमि में 12 फरवरी 1824 को जन्मे महर्षि दयानन्द जी के जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है उनका देशोपकारक, राष्ट्रोद्वारक एवं राष्ट्रभक्त होना। महर्षि दयानन्द जी ने 1857 की क्रान्ति में भाग लेने वाले हमारे क्रान्तिकारी महान देशभक्तों का मार्गदर्शन किया और उन्हें देश से अंग्रेज सत्ताधीशों को उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया। वह मेरठ में क्रान्ति के दिनों में बाबा औघड़ नाथ के नाम से सक्रिय रहे।
अब प्रश्न ये है कि महर्षि दयानन्द एक आध्यात्मिक व्यक्ति होते हुए भी राष्ट्र जागरण क्यों आवश्यक मानते थे? इसका उत्तर ये है कि महर्षि दयानन्द ने यह भली प्रकार समझ लिया था कि वह जिस वैदिक विचारधारा को देश में प्रवाहित करना चाहते थे-उसमें सबसे बड़ी बाधा अंग्रेज थे। अंग्रेजों को भगाये बिना भारत ‘वेदों का देश’ नहीं बन सकता था। वह भारतभूमि से पहले अंग्रेज नाम की दुर्गन्धित वायु को बाहर निकालकर फिर वेद की सुगन्धित वायु बहाना चाहते थे। जब तक अंग्रेज यहां था, तब तक उनका सपना साकार नहीं हो सकता था। अत: उन्होंने भारत में सशस्त्र क्रान्ति के आन्दोलन की नींव रखी। उनके इस आन्दोलन को जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे, श्याम जी कृष्ण वर्मा जैसे क्रान्तिनायकों ने पकड़ा और देश में क्रान्ति की तेज आंधी लाने का कार्य किया। महर्षि दयानन्द के द्वारा न केवल सशस्त्र क्रान्तिनायकों का ही मार्गदर्शन किया गया अपितु उन्होंने देश में गरमदल और नरमदल वाले कांग्रेसी नेताओं का भी मार्गदर्शन किया। गरमदल वाले नेताओं के मार्गदर्शक रहे लाला लाजपतराय जैसे नेता महर्षि दयानन्द से सीधे प्रभावित थे। लालाजी महर्षि दयानन्द जी को धार्मिक रूप से अपना आचार्य मानते थे, और अपने आपको आर्य समाजी घोषित करने में उन्हें तनिक भी संकोच नहीं हुआ था। उनकी विचारधारा को पकडक़र कांग्रेस में सरदार पटेल तक जितने भी गरमदलीय नेता हुए उन सब तक महर्षि दयानन्द की प्रेरणाज्योति किसी न किसी रूप में पहुंचती रही। इसी प्रकार गांधीजी के गुरू गोखले जी भी महर्षि दयानन्द से ही प्रभावित थे। स्पष्ट है कि कांग्रेस की यह नरम दलीय शाखा भी किसी न किसी प्रकार महर्षि दयानन्द से प्रेरणा लेती रही। यह अलग बात है कि कांग्रेस की विचारधारा और महर्षि दयानन्द की विचारधारा में भारी अंतर रहा है।
इस प्रकार महर्षि दयानन्द जी महाराज देशोपकारक, राष्ट्रोद्वारक एवं क्रान्तिकारियों के मार्गदर्शक कहे जा सकते हैं। एक ऐसे राजपथ के निर्माता कहे जा सकते हैं जिन्होंने अपने देश के स्वतंत्रता संग्राम के प्रत्येक सैनिक, योद्घा या महारथी को किसी न किसी प्रकार प्रभावित किया।
‘स्वराज्य’ के उपासक महर्षि दयानन्द
महर्षि दयानन्द जी महाराज ने ‘सत्यार्थप्रकाश’ में जिस प्रकार ‘स्वराज्य’ शब्द पर बल दिया- उससे हमारे क्रान्तिकारियों को बड़ी ऊर्जा मिली थी। उनसे पहले यह शब्द भारत में प्रचलित नहीं था। बाल गंगाधर तिलक ने 1905 में पहली बार स्वराज्य का प्रयोग किया था। जब उन्होंने कहा था कि ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्घ अधिकार है, और मैं इसे लेकर ही रहूंगा।’ उनमें पूछा गया कि तुम्हें यह शब्द कहां से मिला तो उन्होंने जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे की ओर संकेत किया। रानाडे वही व्यक्ति थे जिन्होंने महर्षि दयानन्द को बुलाकर पूना में उनके 15 क्रांतिकारी व्याख्यान कराये थे। अत: वह भी महर्षि की ‘स्वराज्य’ संबंधी धारणा से गहराई से प्रभावित थे। बाद में देश में देशबन्धु चितरंजन दास ने ‘स्वराज्य पार्टी’ का भी गठन किया और महर्षि दयानन्दजी महाराज की शैली में ब्रिटिश सत्ताधीशों का विरोध देश के विधानमण्डलों में जाकर करने का निर्णय लिया। विदेशों में श्यामजी कृष्ण वर्मा, महर्षि दयानन्द की स्वराज्य सम्बन्धी विचारधारा से प्रभावित होकर कार्य करते रहे। उनके प्रयासों की श्रंखला रासबिहारी बोस द्वारा गठित की गयी आजाद हिंद फौज तक गयी। जिसके नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस बने। सुभाष चंद्र बोस को आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व संभालने की प्रेरणा वीर सावरकरजी द्वारा 22 जून 1940 को दी गयी थी। नेताजी के सेनापति कर्नल सहगल के पिता पंजाब में आर्य समाज के बड़े नामी कार्यकत्र्ता रहे थे। जिनका नाम महाशय अछरूराम था। महाशय जी का नाम उन दिनों पंजाब में बड़े आर्य समाजी नेताओं में लिया जाता था। निश्चित है कि एक आर्य समाजी पिता होने के नाते उन्होंने अपने पुत्र को क्रान्ति के माध्यम से देश को आजाद कराने की प्रेरणा अवश्य दी होगी। एक आर्य समाजी नेता के पुत्र का आजाद हिंद फौज में सम्मिलित होकर उसका नेतृत्व करना मात्र एक संयोग नहीं था। उसके पीछे महर्षि का स्वराज्य चिन्तन कार्य कर रहा था। इसी चिन्तन को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनाया।
1965 में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री एटली भारत की निजी यात्रा पर आये थे। जब उनसे पूछा गया कि आपने भारत को क्यों छोड़ा? क्या कांग्रेस के आन्दोलन से डरकर आपने ऐसा किया? तब उन्होंने कहा कि नहीं हमने कांग्रेस से डरकर भारत नहीं छोड़ा था, इसके विपरीत हमने नेताजी सुभाष की सेना से डरकर भारत छोड़ा था। जिसके कारण भारत की सेना में विद्रोह होने लगा था। इस प्रकार एटली ने एक प्रकार से महर्षि दयानन्द के स्वराज्य चिन्तन को ही भारत के स्वाधीनता संग्राम के लिए प्रशंसित कर दिया था।
कांग्रेस की स्थापना का कारण महर्षि थे
महर्षि दयानन्द 1883 में संसार से चले गये। उनके निर्वाण के दो वर्ष पश्चात ही कांग्रेस की स्थापना की गयी। इसका कारण महर्षि का चिन्तन ही था। महर्षि के चिन्तन से घबराकर ही अंग्रेजों ने भारत में कांग्रेस की स्थापना करायी थी।
महर्षि दयानन्दजी महाराज 16 दिसंबर 1872 को कलकत्ता गये। वहां वे राजा ज्योतीन्द्र मोहन टैगोर के कानन में ठहरकर मार्च 1873 तक प्रचार करते रहे। यही पर उनसे एक दिन भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड नार्थ बु्रक मिले। वात्र्तालाप में वायसराय ने महर्षि से अपने राज्य की भारत में चिरकाल तक स्थायी रहने की प्रार्थना करने का अनुरोध किया। तब महर्षि ने कहा था कि राजन! मैं तो प्रतिदिन प्रात: काल ये उठकर अपने ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूं कि शीघ्रातिशीघ्र यह ब्रिटिश राज्य भारत से उठ जाए। मैं शीघ्र ही वह दिन देखना चाहता हूं। जब भारत का शासन सूत्र हम भारतीयों के हाथ में हो। वायसराय के पास महर्षि दयानन्दजी की निर्भीकता और तर्कशक्ति का कोई सन्तोषजनक जवाब नहीं था।
दैनिक ‘वीर अर्जुन’ दिल्ली ने 9 अप्रैल 1961 के अपने अंक में दीवान अलखधारीजी के आलेख में इस घटना का उल्लेख किया था।
महर्षि दयानन्द राजाओं को अंग्रेजों के विरूद्घ ‘असहयोग आन्दोलन’ के लिए प्रेरित कर रहे थे। उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ समय पूर्व परोपकारिणी सभा में कहा था कि जहां तक हो सके न्यायप्राप्ति के लिए सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार किया जाए। महर्षि दयानन्द अंग्रेजों के सरकारी न्यायालयों को पक्षपाती मानते थे। इसका उल्लेख उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ (13-77) में भी किया है। अत: वे ब्रिटिश सरकार के विरोधी नायक के रूप में कार्य कर रहे थे।
महर्षि दयानन्द की प्रेरणा से ही पंजाब में ‘कूका आन्दोलन’ जो कि एक ‘असहयोग आन्दोलन’ था चलाया गया था। यह आन्दोलन 1870-71 में चला था। आगे चलकर भारत में ‘असहयोग आन्दोलन’ को अपनाने वाले कांग्रेस के नेता मोहनदास कर्मचंद गांधी उस समय मात्र 2 वर्ष के थे।
महर्षि दयानन्द की प्रेरणा से ही 1903 के दिल्ली दरबार में चित्तौड़ के महाराणा वंश ने उक्त दरबार का बहिष्कार किया था। बाद में 1912 में आयोजित दिल्ली दरबार का बहिष्कार भी महाराणा फतह सिंह ने किया था। महाराणा को इस बात के लिए प्रेरित करने वाला केसरी सिंह बारहठ था। यह 1903 के दिल्ली दरबार की घटना है। जब महाराणा फतहसिंह रेल में बैठकर दिल्ली दरबार के लिए चल दिया था। तब केसरी सिंह बारहठ जो कि महर्षि दयानन्द के परमशिष्य कृष्णासिंह बारहठ का पुत्र था-ने महाराणा को ऐसी झाड़ पिलायी थी कि महाराणा दिल्ली जाकर भी वहां से अपने राज्य को लौट गया था और उसने दिल्ली दरबार में अपनी पगड़ी झुकाने को राष्ट्रीय अपमान समझ लिया था। महर्षि दयानन्द का प्रयास फलीभूत हो गया था।

चित्तौड़ को अंग्रेजों से बचाने वाले ऋषि महर्षि दयानन्दजी
ये भी महर्षि दयानन्द ही थे-जिन्होंने चित्तौडग़ढ़ के किले को षडय़न्त्रपूर्वक अंग्रेजों द्वारा हड़प लेने की योजनाओं पर पानी फेर दिया था। बात महाराणा सज्जनसिंह के शासनकाल की है। उस समय तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर जनरल चित्तौड़ आये हुए थे। उन्होंने महाराणा सज्जन सिंह से कहा कि चित्तौड़ का किला आप सरकार को दे दें, इस पर महाराणा तो चुप रहे। जब स्वामीजी को इस बात का पता लगा तो उन्होंने उदयपुर के सरदारों को बुलाकर समझाया कि बारी-बारी जाकर गवर्नर जनरल से मिलें और कहें कि चित्तौड़ का किला केवल महाराणा का ही नहीं है इस पर सब राजपूतों का अधिकार है। सबकी सम्मति के बिना महाराणा को कोई अधिकार नहीं है कि इसके विषय में कोई बातचीत करें। तब गर्वनर जनरल समझ गया कि उसकी दाल गलने वाली नहीं है। उसने कहा कि मैंने तो वैसे ही महाराजा साहब से जिक्र किया था, हमने किला लेकर क्या करना है? ‘पूर्ण पुरूष का विचित्र जीवन’ के लेखक श्री कुन्दलाल आर्य ने इस घटना का उल्लेख किया।
जब अंग्रेजों को अपनी योजना को असफल करने वाले इस क्रान्ति नायक की पता चली थी तो वे आग बबूला हो उठे थे। ये भी महर्षि दयानन्द ही थे-जिन्होंने चित्तौड़ के महाराणा सज्जनसिंह को भारत का राजधर्म समझाकर उसे क्रान्ति के लिए तैयार किया था। उनके इस स्वरूप को देखकर 1877 में दिल्ली दरबार के समय इंदौर के राजा और उनके कुछ अन्य साथियों ने महर्षि दयानन्द का एक ओजस्वी भाषण देशी नरेशों के सामने कराने की योजना बनायी थी। जिससे कि देश में क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके। अंग्रेजों ने इस योजना को फलीभूत नहीं होने दिया था।
ऐसी परिस्थितियों में ब्रिटिश सत्ता महर्षि दयानन्द की परम शत्रु हो गयी थी। महर्षि को जिस प्रकार समाप्त किया गया था-उसमें ब्रिटिश सत्ताधीशों का भी हाथ था? यह तथ्य आज तक इतिहास की दृष्टि में आने नहीं दिया गया है। बाद में उनकी योजना फलीभूत न हो-इसलिए अंग्रेजों ने देश में अपनी समर्थक नेशनल कांग्रेस को जन्म दिया। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि कांग्रेस पार्टी प्रारंभ से ही अंग्रेज भक्त और महर्षि के क्रान्तिकारी आन्दोलन की विरोधी रही।
सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत महर्षि
महर्षि दयानन्द जी महाराज देश में सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत बनकर आये। उन्होंने नारियों की दयनीय दशा को सुधारने के लिए उन्हें वेदादि सद्शास्त्रों के पढऩे का अधिकार दिया। विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया और बाल विवाह जैसी कुप्रथा को बंद कराने की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य किया। उस समय नारियों की बहुत ही दयनीय दशा थी। महर्षि दयानन्द जी महाराज के कारण ही देश की आधी जनसंख्या को जब वेद पढऩे का अधिकार मिला तो देश के वैचारिक जगत में क्रान्ति की लहर दौड़ गयी। यदि महर्षि दयानन्द उस समय महिलाओं को पढऩे-पढ़ाने का अधिकार नहीं देते तो आज देश कल्पना चावला को अंतरिक्ष में न भेज पाता।
महर्षि के जाने के पश्चात स्वामी श्रद्घानन्द जी महाराज ने गुरूकुल कांगड़ी की स्थापना की और शिक्षा के क्षेत्र में महर्षि दयानन्द के विचारों को एक यथार्थ दृष्टि प्रदान की। इस विश्व विद्यालय से अनेकों देशभक्त पैदा हुए। इस प्रकार का यह गुरूकुल एक प्रकार से देशभक्त पैदा करने का कारखाना सिद्घ हुआ।
स्वामी श्रद्घानन्द से प्रेरित होकर पं. मदनमोहन मालवीय जी ने लगभग 400 शैक्षणिक संस्थाएं देश में स्थापित करायीं। उनकी सबसे बड़ी देन बनारस का हिंदू विश्वविद्यालय था। यहां पर पहली बार लडक़े लड़कियों की सह शिक्षा की व्यवस्था की गयी। यद्यपि मालवीय जी पौराणिक थे-परन्तु लड़कियों को शिक्षा देने के लिए तो उन्हें भी महर्षि दयानन्द से ही पे्ररणा मिली। उन्होंने संसार से जाते समय अपने शिष्यों को कहा भी था कि आपको महर्षि दयानन्द की शरण में जाना चाहिए। माना कि पौराणिक जगत में महर्षि दयानन्द को लोग कम मानते हैं-परन्तु वे माने या न मानें पर आज उनके भीतर जितना भी सुधार है वह तो महर्षि दयानन्द की ही देन है।
सामाजिक क्षेत्र में महर्षि दयानन्द ने शूद्रों को पढऩे-पढ़ाने का अधिकार दिया। उनके द्वारा मनुस्मृति की जिस प्रकार व्याख्या की गयी और उसके वैदिक स्वरूप को लाकर सामने रखा गया-उसे देखकर डा. भीमराव अम्बेडकरजी ने भी यही कहा था कि शूद्रों की स्थिति को ठीक से समझने में और मनुस्मृति की तर्कसंगत व्याख्या करने में आर्य समाज ने सचमुच सराहनीय प्रयास किया है।
आध्यात्मिक विभूति महर्षि दयानन्द
महर्षि दयानन्द जी महाराज आध्यात्मिक विभूति थे। उनको 18 घंटे की समाधि का अभ्यास था। भारत में उन्होंने वैदिक दृष्टि से अध्यात्म का डंका बजाया। वह सम्पूर्ण मानव जाति को वेद की शरण में लाकर बीमार मानवता का उपचार करना चाहते थे। उनका राष्ट्रवाद किसी देश की सीमा में कैद नहीं था। वह चाहते थे कि राष्ट्रवाद सम्पूर्ण भूमण्डल को समाहित करने वाली एक आध्यात्मिक विचारधारा की मान्यता प्राप्त करे।
उनका अध्यात्मवाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में समाहित था और यही उनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था। वह एकात्ममानववाद के सच्चे प्रहरी थे। उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, एकात्ममानववाद और अध्यात्मवाद के सूत्र परस्पर इस प्रकार गुंथे हैं कि उन्हें अलग-अलग करके देखा जाना सर्वथा असम्भव है। आज का संसार उनके इस चिन्तन से लाभ उठा सकता है। आजकल का सभ्य मानव जिसे ‘ग्लोबल विलेज’ कहता है-उससे भी सुन्दर व्यवस्था महर्षि का ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सपना है।
अध्यात्मवाद को कुछ लोगों ने निजी लाभ का सौदा बनाकर पेश किया है-जबकि यह मानवतावाद की पराकाष्ठा है और मानवता का सर्वत्तोन्मुखी कल्याण ही इसका एकमात्र लक्ष्य है। महर्षि इसी प्रकार के अध्यात्मवाद की स्थापना के समर्थक थे। जिसे वह ‘कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्’ के बिन्दु से लेकर चलते थे। वह चाहते थे कि इसी के माध्यम से व्यष्टि से समष्टि का कल्याण हो सकता है।
संस्कृति रक्षक महर्षि दयानन्द
वेदों का उद्घारक कौन?-महर्षि दयानन्द। किसलिए?-देश और दुनिया को एक मत, एक धर्म, एक विचारधारा देने के लिए। महर्षि दयानन्द वैदिक संस्कृति के रक्षक थे-वेदोद्वारक थे तो केवल इसलिए कि संसार में मानव के लिए एक मत, एक धर्म आदि की स्थापना की जा सके।
वह विभिन्न मत-मतान्तरों, सम्प्रदायों और देशों की सीमाओं को मानवता की हार मानते थे। क्योंकि इन विभिन्नताओं ने मानवता को खण्ड-खण्ड करके खून के आंसू रूलाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। संसार में जितने भर भी उत्पात, उन्माद और उग्रवाद के कार्य हो रहे हैं-वे सभी इन्हीं विभिन्नताओं के कारण हैं। महर्षि दयानन्द इन सारी विभिन्नताओं को ‘एक’ में समाहित कर देने के पक्षधर थे। आज का संसार महर्षि दयानन्द के इस चिन्तन को जितना शीघ्र समझ लेगा- उसका उतना ही कल्याण होगा। यह विचार थोथा है कि ये विभिन्नताएं व्यक्ति को फूलने फलने का अवसर देती हैं-वास्तव में ये विभिन्नताएं व्यक्ति को मार रही हैं और मानवता का दम घोंट रही हैं।
महर्षि दयानन्द जीमहाराज ब्रह्मचर्य के सूर्य थे। संस्कृति रक्षा और मानवतावाद को पोषित करने के लिए वह युवाओं को ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए प्रेरित करते थे। आज का संसार ब्रह्मचर्य की कल्पना से भी कांपता है। महर्षि दयानन्द की शिक्षा प्रणाली में इस पर विशेष बल दिया गया है, जिससे कि बच्चों का चरित्र निर्माण किया जा सके।
महर्षि दयानन्द चरित्र और मानवता को एक ही सिक्के के दो पहलू मानते थे। आज हम देश को करवट लेता देख रहे हैं। इसके पीछे भी महर्षि की विचारधारा ही कार्य कर रही है। सम्पूर्ण भारत को गर्व हो रहा है कि उसका योग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो गया है। इसके लिए महर्षि दयानन्द की विचारधारा को लेकर चलने वाले बाबा रामदेवजी का विशेष योगदान है यद्यपि उन्होंने मात्र प्राणायाम पर ही अधिक बल दिया है परन्तु फिर भी भारत का योग विश्व में प्रसिद्घ हो गया है, और लोगों का कल्याण कर रहा है। इसी से सिद्घ हो जाता है कि महर्षि दयानन्द की विचारधारा से ही विश्व का कल्याण हो सकता है।
महर्षि दयानन्द को नवाब हैदराबाद के एक दरबारी ने इस प्रकार श्रद्घांजलि दी थी-
ये आसमाने पीर गर ले हाथ में शम्सो कमर,
चक्कर लगाये दरबदर गाहे अरब गाहे अजम।
तौफीक में कोई बशर नजीर आये उसकी नजर,
नामुमकिन है शरबशर, ईमान से कहते हैं हम।।

अर्थात हम बड़ी ईमानदारी से कहते हैं कि सूर्य और चांद को आसमानी पीर अर्थात परमात्मा अपने हाथ की टॉर्च बनाकर सारे भूमण्डल पर भी महर्षि दयानन्द जैसा व्यक्तित्व ढूंढने का प्रयास करेगा तो वह कामयाब नहीं हो सकेगा। यह सर्वथा असम्भव है।
महर्षि दयानन्द के निर्वाण पर ‘ट्रिब्यून’ (लाहौर 3 नवंबर 1883) ने लिखा था-‘हमको दारूण शोक सागर में डुबोकर (स्वामीजी) परमधाम में जा विराजे। स्वामीजी महाराज के उपदेशों का प्रकाश केवल आर्य समाज पर पड़ा हो-ऐसा नहीं, किन्तु अन्य समस्त मत और सम्प्रदायी लोगों के जीवन पर भी अपने उपदेश रूपी सांचे का नक्शा ऐसा जमकर बैठा है कि उसने उन सबका आन्तरीय अभिप्राय साफ तब्दील की कोशिश पर कोशिश कर रहा है।’
‘हिन्दी प्रदीप’ के सम्पादक बालकृष्ण भट्ट (प्रयाग) ने लिखा था-‘हम इस हिन्दुस्तान को अभागा ही कहें कि इसके ऐसे हितैषी परलोक यात्रा के लिए दत्तचित्त हो झटपट सिधार गये….आर्य समाज की बांह टूट गयी, सरस्वती का भण्डार लुट गया, यहां के बिगड़े समाज के संशोधन का फाटक ढह गया, यह इन्हीं महात्मा का पुरूषार्थ है कि भारतवर्ष के धर्मतत्व का सर्वस्व वेद है।….उसे चारों वर्ण के लोग समझने लगे।….हम तो महर्षि दयानन्द की सर्वतो भाव से सराहना ही करेंगे।’
इसी प्रकार अलीगढ़ से प्रकाशित होने वाले ‘भारत बन्धु’ ने लिखा था-‘हमको यह सुनकर बड़ा पश्चात्ताप हुआ कि 30 अक्टूबर सन् 1883 ई. कार्तिक बदी 30 सम्वत 1940 को श्रीमान दयानन्द सरस्वती जी महाराज बैकुण्ठ को पधारे।….एक स्वामीजी महाराज की यह प्रशंसा दर्शनीय थी कि इन्होंने मुसलमानों को यह निश्चय करा दिया था कि आर्य मत यवन मत की अपेक्षा सनातनिक और श्रेष्ठ है।….बड़े-बड़े मौलवी, जो फारसी और अरबी के ज्ञाता थे, वे स्वामी जी की भाषणशैली के आगे मूक हो जाते थे। इसी प्रकार अंग्रेजों को भी ….कि तुम्हारे मत से आर्य मत श्रेष्ठ है, इनकी विद्वत्ता की प्रशंसा विलायत आदि देशों में ऐसी हुई कि आज तक किसी विद्वान की नहीं हुई।’
आज हम अपने ऐसे महामानव, आप्तपुरूष और समग्र क्रान्ति के अग्रदूत महर्षि दयानन्दजी महाराज का जन्मदिवस मना रहे हैं-तो इस पर सभी राष्ट्रवासियों को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण मानवता को गर्व होना चाहिए। क्योंकि महर्षि का चिन्तन कभी संकीर्ण नहीं रहा। उनका चिन्तन सम्पूर्ण मानवता के लिए, संपूर्ण भूमंडल के लिए और प्राणिमात्र के लिए था। हमें उस महामानव को इसी दृष्टिकोण से ऊंचा उठकर अपनी विनम्र श्रद्घांजलि अर्पित करनी चाहिए।
महर्षि तुझे प्रणाम, कोटिश: नमन।

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