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संपादकीय

प्रगति और दुर्गति से जूझता लोकतंत्र

भारत की जनसंख्या चीन के पश्चात विश्व में सर्वाधिक है। यह देश विभिन्न संप्रदायों, जातियों वर्गों और समुदायों में बंटा हुआ है। इसलिए बहुत सारी सामाजिक विसंगतियां भी हमारे यहां बनी हुई हैं। इन सामाजिक विसंगतियों की देश में इतनी भरमार है कि कभी कभी तो इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि ये देश चल […]

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‘महाभारत’ के युद्घ का आंखों देखा हाल

राकेश कुमार आर्य नई दिल्ली। भारत में लोकसभा चुनावों का ‘महाभारत’ अपने चरमोत्कर्ष पर है। धृतराष्ट्र बने डा. मनमोहन सिंह अपने राजभवन में आराम फरमा रहे हैं। उनके पास वक्त तो खूब है, पर उनकी अपनी ‘वक्त’ समाप्त हो चुकी है। फुरसत में बैठे मनमोहन चुनावी समर की सूचना लेने का प्रयास कर रहे हैं। […]

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संपादकीय

‘वायसराय’ नही जननेता चुनने का समय है

भारत के एक अधिकार विहीन लेकिन अपनी सादगी के भीतर छिपे अधिकार संपन्न प्रधानमंत्री के अवसान का समय आ गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जा रहे हैं, लेकिन शिकन उनके चेहरे पर न होकर सोनिया गांधी के चेहरे पर हैं। डा. मनमोहन सिंह को राजनीतिक अधिकार विहीन करके बैठाया गया और ‘सोनिया कीर्तन मंडली’ ने […]

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संपादकीय

अकबर था-फतेहपुर सीकरी का संस्थापक?

राकेश कुमार आर्य(पिछले दिनों 26 मार्च को अपनी बार एसोसिएशन के अधिवक्ता साथियों के साथ फतेहपुर सीकरी जाने का मुझे सौभाग्य मिला। हमारे 46 सदस्यीय यात्री दल का नेतृत्व बार एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री महीपाल सिंह भाटी कर रहे थे। जिसमें मुझसे अलग अधिवक्ता साथियों में प्रमुख नाम थे-श्री जयपाल सिंह नागर, श्री ऋषिपाल भाटी, […]

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सांस्कृतिक मूल्यों को समझने की आवश्यकता है

जब किसी विद्वान ने हिंदी साहित्य के लिए तन, मन और धन के शब्द के समुच्चय को दिया होगा तो सचमुच उसने हिंदी साहित्य की बहुत बड़ी सेवा की थी। ये तीन शब्द भारत की ही नही अपितु विश्व की भी समग्र व्यवस्था को अपने आप में निहित करने वाले सार्थक शब्द हैं। परिवार से […]

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संपादकीय

आर्य-द्राविड़ की धारणा का झूठ

भारत में आर्यों को विदेशी बताने वालों ने ही यहां गोरे-काले अथवा आर्य-द्राविड़ का भेद उत्पन्न किया। जिससे यह बात सिद्घ हो सके कि भारत में तो प्राचीन काल से ही गोरे-काले का भेद रहा है और यहां जातीय संघर्ष भी  प्राचीन काल से ही रहा है। इसके लिए देवासुर संग्राम को या आर्य दस्यु […]

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सावरकर ने हमें बताया था नेहरू के कारण हम चीन से हारे

आस्टे्रलियाई पत्रकार मेक्सवेल से भी पहले सावरकर ने हमें बताया थानेहरू के कारण हम चीन से हारे राकेश कुमार आर्य जितना यह सत्य है कि अहिंसा की रक्षा हिंसा से होती है, उतना ही यह भी सत्य है कि सत्य की रक्षा शस्त्र से होती है। आजादी के बाद उभरे हमारे नेतृत्व ने भारत के […]

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संपादकीय

संविधान निर्माण पर डा० अंबेडकर के विचार

हमारे देश के संविधान के विषय में समय-समय पर कुछ लोगों को आपत्तियां होती रही हैं, डा. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा के अंतिम दिन जो भाषण दिया था वह हमारे लिए बहुत कुछ मार्गदर्शन कर सकता है। इस भाषण में डा. बी.आर. अंबेडकर ने कई शंकाओं का समाधान प्रस्तुत किया। जिसे ध्यान से पढऩे […]

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संपादकीय

आर्यों का आदि देश आर्यवर्त (भारत) है

राकेश कुमार आर्य एक षडय़ंत्र के अंतर्गत भारत को नष्ट करने के लिए जो मिथ्या और भ्रामक कथा-कहानियां गढ़ी गयी है उनमें सबसे प्रमुख है-आर्यों का विदेशी होना। प्रश्न है कि ऐसी कहानियां गढ़ी क्यों गयीं? इसका उत्तर ये है कि भारतीयों के प्राचीन धर्म और इतिहास को मिटाकर भारत में ईसाइयत का प्रबलता से […]

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…और नेहरू बोले-‘जला डालो इन्हें’

शहरों में हम जहां एक ओर मानवता के संपूर्ण विकास का सपना संजोते हैं और उसे धरती पर उतारने का प्रयास करते हैं, वहीं मानव समाज को एक पाशविक समाज की भांति रहने के लिए अभिशप्त हुआ भी देखते हैं। इसे मानवता की घोर विडंबना ही कहा जाएगा कि एक ओर जहां बहुमंजिली इमारतें हमारे […]

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