महाराष्ट्र की जनता ने राष्ट्रवाद बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षतावाद के बीच स्पष्ट अंतर करने वाला जनादेश देकर भाजपा को वहां की नगर पालिकाओं/महानगरपालिका में शानदार सफलता प्रदान की है। महाराष्ट्र की जनता के इस परिपक्व निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि वह अपने राष्ट्रवादी नेतृत्व के साथ कई प्रकार के भौतिक और मानसिक कष्ट झेल […]
Category: डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से
अंतरिक्ष अनंत है, और जितना अंतरिक्ष अनंत है-उतना ही वेद ज्ञान अनंत है। अनंत ही अनंत का मित्र हो सकता है। जो सीमाओं से युक्त है, सीमाओं में बंधा है, ससीम है, वही सांत है, उसके ज्ञान की अपनी सीमाएं हैं, परंतु ईश्वर ने हमें ‘मन’ नाम का एक ऐसा कंप्यूटर दिया है, जिसकी शक्तियां […]
भारत की राजनीति में मुसलमानों को केवल ‘वोट बैंक’ के रूप में प्रयोग करते रहने की परंपरा कांग्रेस ने डाली थी। 1947 में जो मुसलमान भारत में रह गये थे-उनमें से अधिकांश के भीतर एक भय व्याप्त था कि पाकिस्तान की मांग मजहब के आधार पर की गयी थी-जिसे 1945-46 में हुए नेशनल असेम्बली के […]
यह काल नि:संदेह भारत में मुस्लिम शासन में ही आया था। अन्यथा हमारी तो मान्यता थी कि- ‘यंत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ अर्थात जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है। हमने माता को निर्माता माना। व्यष्टि से समष्टि तक में उसकी प्रधानता को और उसकी महत्ता को स्वीकार किया। […]
तीन तलाक के मुद्दे पर एक ठोस और सकारात्मक पहल करते हुए केन्द्र सरकार ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से चार प्रश्न पूछे हैं। जिनमें पहला है कि क्या ‘तलाक-एक-बिद्दत’ (एक बार में तीन तलाक देना) निकाह, हलाला और बहुविवाह को संविधान के अनुच्छेद 25 (1) (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) में संरक्षण प्राप्त है? […]
महात्मा विदुर का मानना है कि राजा को चाहिए कि वह राजा कहलाने और राजछत्र धारण करने मात्र से ही संतुष्ट रहे, अर्थात राजा का ऐश्वर्य उसका राजा कहलवाना और राजछत्र धारण करना ही है। उसे चाहिए कि राज्य के ऐश्वर्यों को राज्यकर्मचारियों और प्रजा के लिए छोड़ दे, उनमें बांट दे, सब कुछ अकेला […]
13 अप्रैल 1919 भारतीय इतिहास का वह ‘काला दिवस’ है जिसे ‘जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड’ के लिए जाना जाता है। उस समय देश के स्वातंत्रय समर का क्रांतिकारी आंदोलन अपने यौवन पर था। कांग्रेस के नेता अक्सर यह कहते मिलते हैं कि देश की स्वतंत्रता के लिए हमने ही बलिदान दिये हैं-भाजपा जैसे दलों का स्वतंत्रता […]
हमें स्मरण रखना होगा कि संसार में मानव की मानवी और दानवी प्रवृत्तियों में एक शाश्वत संघर्ष चलता रहा है। इसे ‘देवासुर संग्राम’ की संज्ञा भी दी जाती है। मानव के भीतर का मानव उसे सृजनशील बनने के लिए प्रेरित करता है। उसे संसार के लिए उपयोगी और सकारात्मक बनाये रखने के लिए प्रोत्साहित करता […]
हमारे हिन्दू समाज में तैंतीस करोड़ देवों की कल्पना की गयी है। विद्वानों की अपनी-अपनी व्याख्याएं इस विषय में उपलब्ध हैं। हमें इस प्रकरण में प्रचलित व्याख्याओं का उल्लेख यहां विषयांतर के कारण नहीं करना है। आज हमें देवों के भी देव की आराधना करनी है, उसी की उपासना करनी है उसी की आरती उतारनी […]
भारत में आज न्यायालयों में करोड़ों वाद लंबित हैं। सस्ता और सुलभ न्याय देना सरकारी नीतियों का एक अंग है। किंतु यथार्थ में न्याय इस देश में इतना महंगा और देर से मिलने वाला हो गया है कि कई बार तो न्याय प्राप्त करने वाले व्यक्ति को भी वह न्याय भी अन्याय सा प्रतीत होने […]