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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से भयानक राजनीतिक षडयंत्र

जर, जोरू और जमीन, भाग-दो

यह काल नि:संदेह भारत में मुस्लिम शासन में ही आया था। अन्यथा हमारी तो मान्यता थी कि-
‘यंत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’
अर्थात जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है। हमने माता को निर्माता माना। व्यष्टि से समष्टि तक में उसकी प्रधानता को और उसकी महत्ता को स्वीकार किया। हमने माना कि व्यक्ति के और राष्ट्रनिर्माण के महत्वपूर्ण कार्य के निष्पादन में माता का प्रमुख स्थान है। इसलिए हमने मातृशक्ति को पूजनीया मानते हुए ‘देवी’ के उच्च पद पर आसीन किया।

देवी की पूजा
यही कारण है कि भारतीय समाज में देवी की पूजा का विशेष विधान है। हमने इन देवियों को, समाज निर्माण में इनकी भूमिका को इन्हें निभाने के लिए खुला छोड़ा। प्रतिबंधों में जकड़ा नहीं, और चरित्र पर बिना कारण संदेह करते हुए इन पर पहरा नहीं बैठाया। हमने ‘नर’ के निर्माण में ‘नारी’ की निर्णायक भूमिका को शुद्घ अंत:करण से स्वीकार किया। उस पर बंधन था तो नैतिकता का था, मर्यादा का था, कुल की परंपराओं का था, पति के प्रति पूर्णत: समर्पित रहने की भावना का था।
ये ही सारे प्रतिबंध ‘पुरूष’ पर भी थे। वह उच्छ्रंखल नहीं था, वह व्यभिचारी नहीं था, वह क्रूर नहीं था और यदि ऐसा था तो शेष समाज के लिए वह घृणा के योग्य था। इसीलिए हमारे यहां दूसरे के धन को मिट्टी और दूसरे की स्त्री को माता मानने की उच्च, महान और अनुकरणीय परंपरा थी। जो लोग संसार में नारी को भोग्या मानकर उसके लिए लडऩे-झगडऩे और मरने-कटने को मानवीय सभ्यता में सम्मिलित करके देखना चाहते हैं, अथवा ऐसी धारणा को बलवती करने में विश्वास रखते हैं वे लोग भारत की इस महान संस्कृति के इस गुण पर विचार करेंगे तो उनकी ऐसी धारणाएं स्वयं ही धूलि-धूसरित हो सकती हैं।
जो व्यक्ति भारत में उसकी महान सांस्कृतिक परंपराओं को तोडऩे अथवा उनका उल्लंघन करने का दुस्साहस करता था शेष समाज उसे बहिष्कृत कर दिया करता था। यह बहुत बड़ा दण्ड था। इसे बाद में हमारे यहां ग्रामीण क्षेत्रों के अंदर ‘हुक्का पानी बंद’ करने के नाम से भी जाना जाता रहा है। आज भी आप देखें कि यदि आपसे कोई व्यक्ति घर आने पर ‘पानी’ तक को भी न पूछे और फिर आपकी रूचि के अनुसार पेय पदार्थ आदि को न पूछे तो आपको कैसा लगेगा? आप भी स्वयं को अपराधी मानेंगे। अब यदि यह  ‘हुक्का पानी बंदी’ का क्रम सारे समाज में आपके प्रति चला दिया जाए तो क्या होगा?
आप अपने ही घर में बेघर हो जाएंगे। आपका घर से निकलना दूभर हो जाएगा। अपना घर ही आपके लिए पराया बन जाएगा। आप बिना पहरे  के और बिना किसी सजा के कैद और कठोर दण्ड पा रहे होंगे। ऐसी थीं-हमारी महान सामाजिक परंपराएं। कोई जेल नहीं थी-किंतु फिर भी व्यक्ति को कितनी बड़ी सजा दे दी जाती थी। सारा समाज अपराधी को उपेक्षित करता था। उससे घृणा करता था। आज इसके विपरीत हो रहा है। आज अपराधी को हुक्का पानी देकर व्यक्ति अपना प्रभाव समाज के व्यक्तियों पर जमाने के लिए उसे संरक्षण प्रदान करता है, सहयोग और सहायता प्रदान करता है। फलस्वरूप सारा समाज दुखी है।

घातक विस्मृति
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारत के प्राचीन सामाजिक मूल्यों को विस्मृत किया जा रहा है। हमारी यह प्रवृत्ति आत्महत्या के समान है। नारी उत्पीडऩ और उसके यौन शोषण की घटनाओं पर आज भी यदि हमारे शासक वर्ग का यही दृष्टिकोण हो जाए तो भारतीय समाज की बहुत सी समस्याओं का निदान हो जाना संभव है। हमारे राम ने सूपर्णखा का प्रणय निवेदन सविनय ही ठुकरा दिया था। उस काल के सम्राट रावण ने राम की मर्यादा का ध्यान न रखते हुए अपनी अहंकार पूर्ण प्रवृत्ति के कारण राम के इस आचरण को अपनी ‘नाक काटने’ की चुनौती माना।
दूसरे शब्दों में अपने सम्मान को चोट पहुंचाने वाली बात समझी। हम राम के कथित उपासकों ने अपने राम पर यह आरोप सहज रूप से ही स्वीकार कर लिया है कि उन्होंने सूपर्णखा की नाक काट ली थी। बिना यह सोचे समझे कि राम की मर्यादा इस आचरण की कभी अनुमति नहीं दे सकती। इसके पश्चात रावण ने मर्यादा का हनन किया। सीताहरण की इस पैशाचिक घटना का परिणाम उसे मिला-साम्राज्य गंवाकर और स्वयं का प्राणांत करके। हमारे यहां चाहे राम रहे या शिवाजी महाराज रहे सभी ने नारी सम्मान के लिए अपना जीवन समर्पित रखा। नारी रक्षा को मर्यादा का विषय बनाये रखा। यहां कृष्ण का जीवन देखें, या गौतम, कणाद कपिल की दार्शनिक वाणी को देखें, या फिर मनु, याज्ञवल्क्य की स्मृतियों को देखें या किसी कवि के काव्य को देखें सभी ने नारी सम्मान के समक्ष मस्तक झुकाया है, उसे मातृशक्ति मानकर, विधाता का विशेष वरदान मानकर और ईश्वर की दिव्य कृति मानकर। अत: जोरू के लिए लडऩे की बात भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थों एवं संदर्भों में कहना अथवा मानना अनुचित है, इस अवधारणा को परिवर्तित कर स्वस्थ सोच को पुन: प्रतिष्ठित करना होगा। वस्तुत: जोरू के लिए लडऩे वाले लोग दूसरे हैं। उन्हीं की लड़ाकू प्रवृत्ति का दुष्प्रभाव भारतीय संस्कृति में एक विकृति के रूप में हमें दृष्टिगोचर होता है। भारतीय संस्कृति में बहुपत्नी का निषेध है। यदि किन्हीं विशेष परिस्थितियों में दूसरी पत्नी रखना अथवा लाना उचित और आवश्यक हो गया है तो इसमें पहली पत्नी की सहमति लिया जाना आवश्यक है। ‘जर, जोरू और जमीन’  ये शब्द भी उन्हीं लोगों की भाषा के शब्द हैं जो उनकी मान्यता के पोषक हैं जो रात-दिन उसी में मरते, खपते और अपना जीवन बर्बाद करते रहते हैं।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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