ऋषि के मंतव्य दो टूक में। जो पक्षपातरहित,न्यायाचरण,सत्य भाषणादियुक्त, ईश्व राज्ञा, वेदों से अविरुद्ध है उसको,धर्म, और जो पक्षपात रहित हि न्यायाचरण,मिथ्या भाषण आदि,ईश्वर आज्ञाभंग,वेद विरुद्ध है उसको अधर्म मानता हूं । जो इच्छा,द्वेष,सुख, दुःख,और ज्ञानादि गुणयुक्त,अल्पज्ञ,नित्य है उसी को जीव मानता हूं । जीव और ईश्वर स्वरूप और वैधमार्य से भिन्न और व्याप्य व्यापक […]
ऋषि दयानंद के दो टूक मंतव्य