चौथा खम्भा लोकतन्त्र का चौथा खम्भा, कैसे हो? बिकते हो तुम शेष तीन के जैसे ही। उन तीनों ने अपने मोल लगाये हैं, लगा रहे तुम मोल उन्हीं के जैसे ही।। गिरते जाते हो प्रतिपल बाजारों में, जनता की आवाज, न सुनते- लिखते हो। राजभवन के आसपास जड़वत बैठे, गाँधी जी के बंदर जैसे रहते […]
लोकतंत्र का चौथा खंभा