ऋषि दयानंद जी के विचार।। चारो वेदों को विद्या धर्मयुक्त श्वरप्रणित संहिता मंत्रभाग को निर्भ्रांत स्वतः प्रमाण मानता हूं, अर्थात जो स्वयं प्रमाणरूप हैं, कि जिस के प्रमाण होने में किसी अन्य ग्रन्थ की अपेक्षा न हो जैसे सूर्य वा प्रदीप स्वयं अपने स्वरूप के स्वतः प्रकाश और पृथिव्यादि के प्रकाश होते हैं वैसे चारो […]