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भारतीय संस्कृति

18 विवादास्पद मार्ग और राजा

सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय- 24 ख 18 विवादास्पद मार्ग और राजा संध्या आदि के पश्चात राजा के लिए अनिवार्य किया गया है कि :- “सभा राजा और राजपुरुष सब लोग सदाचार और शास्त्रव्यवहार हेतुओं से निम्नलिखित अठारह विवादास्पद मार्गों में विवादयुक्त कर्मों का निर्णय प्रतिदिन […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 24 क सभा और सभासद

सभा और सभासद स्वामी दयानंद जी महाराज जी द्वारा स्थापित आर्य समाज की राजनीति की विचारधारा पर विचार व्यक्त करते हुए क्षीतिश वेदालंकार जी अपनी पुस्तक “चयनिका” के पृष्ठ संख्या 65 पर लिखते हैं कि -“आर्य समाज स्पष्टत: न तो एकतंत्र का न बहुतंत्र का, न ही दल तंत्र का, प्रत्युत लोकतंत्र का पक्षपाती है। […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 23 ख

युद्ध में राजा का स्थान महर्षि यहां पर राजा को युद्ध नीति का पाठ पढ़ाते हुए कह रहे हैं कि वह अपने आप को सेनाओं के मध्य में रखे। युद्ध नीति और रणनीति के दृष्टिकोण से राजा के लिए यही आवश्यक है कि वह अग्रिम मोर्चे पर न होकर अपने आपको अपनी सेना के मध्य […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 22 ख लोकपाल और भारत की प्राचीन शासन व्यवस्था

लोकपाल और भारत की प्राचीन शासन व्यवस्था हमारे देश में दीर्घकाल से लोकपाल की नियुक्ति की मांग की जाती रही है। वास्तव में ऐसी मांग करना हमारी मृगतृष्णा का ही प्रतीक है। हमारे ऐसा कहने का कारण यह है कि जो लोग यह मानते हैं कि लोकपाल की नियुक्ति के पश्चात तुरंत सारे घपले घोटालों […]

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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

जनसंख्या विस्फोट और भारत

भारत में बढ़ती जनसंख्या बहुत बड़े खतरे की घंटी है। स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात ही यदि इस दिशा में सरकारों की ओर से उचित कदम उठाए जाते तो आज देश में भुखमरी, बेरोजगारी, गरीबी जैसी समस्याओं से जूझने की स्थिति नहीं आती। निस्संदेह भारत ने स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात कई क्षेत्रों में आशातीत उन्नति की […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 22 ( क ) राजपुरुषों का आचरण

राजपुरुषों का आचरण स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने “श्रीमद दयानंद प्रकाश” की भूमिका के अंत में लिखा है – “स्वामी जी महाराज पहले महापुरुष थे जो पश्चिमी देशों के मनुष्यों के गुरु कहलाए । … जिस युग में स्वामी जी हुए उससे कई वर्ष पहले से आज तक ऐसा एक ही पुरुष हुआ है जो […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 21 ख राजा की नीति ऐसी हो

राजा की नीति ऐसी हो महर्षि मनु प्रतिपादित संविधान अर्थात मनुस्मृति की यह व्यवस्था या इस जैसी अनेक व्यवस्थाऐं आज के संविधानों में कहीं दिखाई नहीं देती हैं। आगे भी लिखा है :- वकवच्चिन्तयेदर्थान् सिहवच्च पराक्रमेत्। वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत्।। इसका अभिप्राय है कि जैसे बगुला ध्यानावस्थित होकर मछली पकड़ने को ताकता रहता है, वैसे राजा […]

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युद्ध में भी धर्म निभाने वाला देश है भारत – सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश (एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 20(ख)

युद्ध में भी धर्म निभाने वाला देश है भारत जब महाभारत का युद्ध आरंभ हुआ तो उससे पहले युद्ध के लिए नियम बनाए गए थे कि दोनों पक्षों के द्वारा दिन भर न्यायपूर्वक युद्ध करने के बाद संध्या काल में दोनों पक्षों के लोगों के बीच आपसी प्रेम बना रहेगा। उस समय कोई भी शत्रुता […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 20 ( क ) युद्ध में भी धर्म निभाने का भारत का दर्शन

युद्ध में भी धर्म निभाने का भारत का दर्शन राजनीति में पवित्रता बनाए रखने और सार्वजनिक जीवन के प्रति अपने कर्तव्य भाव को उत्कृष्टता के साथ निर्वाह करने के लिए दिव्य गुणों से युक्त जीवनसंगिनी का होना आवश्यक है। जिन जिन सम्राटों या क्रूर तानाशाहों के विरुद्ध इतिहास में क्रांति हुई हैं, उन उनकी जीवनसंगिनी […]

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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 19 ( क ) महर्षि दयानंद का स्वराज्य दर्शन

महर्षि दयानंद का स्वराज्य दर्शन स्वामी दयानंद जी महाराज संसार के समकालीन इतिहास के सबसे बड़े स्वराज्यवादी हैं। उनके स्वराज्यवाद की अवधारणा अन्य राजनीतिक मनीषियों के चिंतन से बहुत ऊंची है। संसार के अन्य स्वराजवादी चिंतक जहां केवल और केवल अपने विचारों को राजनीति तक सीमित रखते हैं, वहीं स्वामी जी महाराज ने स्वराजवाद को […]

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