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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 23 ख

युद्ध में राजा का स्थान

महर्षि यहां पर राजा को युद्ध नीति का पाठ पढ़ाते हुए कह रहे हैं कि वह अपने आप को सेनाओं के मध्य में रखे। युद्ध नीति और रणनीति के दृष्टिकोण से राजा के लिए यही आवश्यक है कि वह अग्रिम मोर्चे पर न होकर अपने आपको अपनी सेना के मध्य में रखे। इसका कारण केवल एक है कि युद्ध क्षेत्र में शत्रु सदा राजा को ही पकड़कर मारने के लिए लालायित रहता है। अतः राजा को अपनी सेना का मनोबल बढ़ाने , युद्ध नीति का पाठ पढ़ाते रहने के लिए साथ ही युद्ध की सारी गतिविधियों पर अपनी दृष्टि लगाए रखने के लिए युद्ध क्षेत्र में उपस्थित रहना आवश्यक है, परंतु यदि वह युद्ध क्षेत्र में अग्रिम मोर्चे पर जाकर युद्ध करने लगेगा तो राष्ट्र की संप्रभुता भी संकट में पड़ जाएगी। ऐसे में उसका युद्ध क्षेत्र में अपनी सेना के मध्य में रहकर ही युद्ध का संचालन करना उचित है। उस समय उसका रक्षित सुरक्षित रहना राष्ट्र के रक्षित और सुरक्षित रहने जैसा है। इसके विपरीत मध्यकाल में हमारे अनेक राजपूत योद्धाओं ने अपनी अंधी वीरता का परिचय देते हुए युद्ध के अग्रिम मोर्चे पर जाकर युद्ध किया और अपना बलिदान दे दिया। उसके पश्चात सेना में भगदड़ मची और शत्रु पक्ष ने अनेक युद्ध क्षेत्रों में विजय प्राप्त कर ली।
चाहे युद्ध के नियमों और युद्ध की नीति में कितने ही परिवर्तन आ गए थे परंतु इसके उपरांत भी यदि हम हल्दीघाटी जैसे सुप्रसिद्ध युद्ध के बारे में जानकारी लेते हैं तो हमें पता चलता है कि उस समय महाराणा प्रताप ने महर्षि मनु प्रतिपादित इस प्रकार की युद्ध नीति का अनुपालन करते हुए अपने आप को सेना के मध्य में ही रखा था । इससे पता चलता है कि उस समय तक भी हमारे राजा महाराजा युद्ध क्षेत्र में इसी प्रकार की नीति का पालन कर रहे थे।

युद्ध क्षेत्र में राजा और उसके सेनापति सहित विशिष्ट लोगों को दो आंखों की जगह दस -दस आंखें रखनी पड़ती हैं, जो दसों दिशाओं में देख सकने में समर्थ हों। इसके बारे में स्वामी जी महाराज हमें बताते हैं कि सेनापति और बलाध्यक्ष अर्थात् आज्ञा का देने और सेना के साथ लड़ने लड़ाने वाले वीरों को आठों दिशाओं में रक्खे, जिस ओर से लड़ाई होती हो उसी ओर से सब सेना का मुख रक्खे परन्तु दूसरी ओर भी पक्का प्रबन्ध रक्खे नहीं तो पीछे वा पार्श्व से शत्रु की घात होने का सम्भव होता है।

मुस्लिम आक्रमणकारियों के समय हमने कई बार ऐसी भी गलती की थी जब हमने अपने पार्श्व भाग को जानबूझकर कमजोर कर लिया था। हमने माना कि युद्ध सामने से ही होगा और पीछे से कोई आक्रमणकारी या शत्रु पक्ष की सेना आक्रमण नहीं करेगी। जबकि पीछे से हमला हुआ और युद्ध परिणाम हमारे विपरीत चला गया। यह बीमारी रूढ़िगत मान्यताओं में फंसे राजाओं में विशेष रूप से देखने को मिली। यदि वह महर्षि मनु जैसे राजनीति शास्त्री और युद्ध नीति के विशेषज्ञों के शास्त्रों का अध्ययन किए होते तो उनसे ऐसी गलती नहीं होती।

विभिन्न प्रकार के व्यूह

युद्ध नीति की आवश्यकता होती है कि :-

गुल्मांश्च स्थापयेदाप्तान् कृतसंज्ञान् समन्ततः।
स्थाने युद्धे च कुशलानभीरूनविकारिणः।।

‘जो गुल्म अर्थात् दृढ़ स्तम्भों के तुल्य युद्धविद्या से सुशिक्षित धार्मिक स्थित होने और युद्ध करने में चतुर भयरहित और जिनके मन में किसी प्रकार का विकार न हो उनको चारों ओर सेना के रक्खे।’

संहतान् योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेद् बहून्।
सूच्या वज्रेण चैवैतान् व्यूहेन व्यूह्य योधयेत्।।

“जो थोड़े पुरुषों से बहुतों के साथ युद्ध करना हो तो मिलकर लड़ावें और काम पड़े तो उन्हीं को झट फैला देवे। जब नगर दुर्ग वा शत्रु की सेना में प्रविष्ट होकर युद्ध करना हो तो सब ‘सूचीव्यूह’ अथवा ‘वज्रव्यूह’ जैसे दुधारा खड्ग, दोनों ओर युद्ध करते जायें और प्रविष्ट भी होते चलें वैसे अनेक प्रकार के व्यूह अर्थात् सेना को बनाकर लड़ावें जो सामने (शतघ्नी) तोप वा (भुशुण्डी) बन्दूक छूट रही हो तो ‘सर्पव्यूह’ अर्थात् सर्प के समान सोते सोते चले जायें, जब तोपों के पास पहुंचें तब उनको मार वा पकड़ तोपों का मुख शत्रु की ओर फेर उन्हीं तोपों से वा बन्दूक आदि से उन शत्रुओं को मारें अथवा वृद्ध पुरुषों को तोपों के मुख के सामने घोड़ों पर सवार करा दौड़ावें और मारें, बीच में अच्छे-अच्छे सवार रहैं, एक बार धावा कर शत्रु की सेना को छिन्न-भिन्न कर पकड़ लें अथवा भगा दें।”

इसके अतिरिक्त युद्ध क्षेत्र के विषय में महर्षि दयानंद जी द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि “जो समभूमि में युद्ध करना हो तो रथ घोड़े और पदातियों से और जो समुद्र में युद्ध करना हो तो नौका और थोड़े जल में हाथियों पर, वृक्ष और झाड़ी में बाण तथा स्थल बालू में तलवार और ढाल से युद्ध करें करावें।”
“जिस समय युद्ध होता हो उस समय लड़ने वालों को उत्साहित और हर्षित करें। जब युद्ध बन्ध हो जाय तब जिस से शौर्य और युद्ध में उत्साह हो वैसे वक्तृत्वों से सब के चित्त को खान-पान, अस्त्र-शस्त्र सहाय और औषधादि से प्रसन्न रक्खें। व्यूह के विना लड़ाई न करे न करावे, लड़ती हुई अपनी सेना की चेष्टा को देखा करे कि ठीक-ठीक लड़ती है वा कपट रखती है।”
“किसी समय उचित समझे तो शत्रु को चारों ओर से घेर कर रोक रक्खें और इसके राज्य को पीड़ित कर शत्रु के चारा, अन्न, जल और इन्धन को नष्ट दूषित कर दे।”

हिंदू राजा अपनाते रहे इसी प्रकार की नीति

“शत्रु के तालाब, नगर के प्रकोट और खाई को तोड़ फोड़ दे, रात्रि में उन को (त्रस) भय देवे और जीतने का उपाय करे।”
जिस समय अकबर या उसके वंश के अन्य बादशाह या उससे पूर्व सल्तनत काल के सुल्तान हमारे हिंदू राजाओं के किलों पर या राजधानियों पर आक्रमण किया करते थे उस समय के अनेक उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं जब हमारे हिंदू सैनिकों ने इसी प्रकार की नीति का अनुसरण करते हुए शत्रु के लिए तालाब सुखा दिए थे, फसलों को उजाड़ दिया था, कुओं में मिट्टी भर दी थी। वास्तव में यह भी युद्ध के जीतने के लिए आवश्यक क्रियाकलाप होते हैं। इससे शत्रु कमजोर होता है और भूखा प्यासा मरने की स्थिति में आकर लौटने के लिए बात हो जाता है।
ऋषि द्वारा दी गई इस व्यवस्था से हमें यह भी मान कर चलना चाहिए कि युद्ध क्षेत्र में शत्रु को भयभीत करना हमारे लिए भी उतना ही आवश्यक है जितना वह स्वयं हमको भयभीत करता है। युद्ध में नीति अर्थात धर्म का पालन करते हुए भी हम उस समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि अब शत्रु को भयभीत करना भी हमारा धर्म है।

युद्ध के उपरांत विजयी राजा क्या करे ?

युद्ध में हमारी जीत होने के पश्चात हमें क्या करना चाहिए ? इस पर स्वामी जी महाराज का मार्गदर्शन इस प्रकार है – “जीत कर उनके साथ प्रमाण अर्थात् प्रतिज्ञादि लिखा लेवे और जो उचित समय समझे तो उसी के वंशस्थ किसी धार्मिक पुरुष को राजा कर दे और उस से लिखा लेवे कि तुम को हमारी आज्ञा के अनुकूल अर्थात् जैसी धर्मयुक्त राजनीति है उस के अनुसार चल के न्याय से प्रजा का पालन करना होगा ऐसे उपदेश करे और ऐसे पुरुष उनके पास रक्खे कि जिससे पुनः उपद्रव न हो और जो हार जाय उसका सत्कार प्रधान पुरुषों के साथ मिलकर रत्नादि उत्तम पदार्थों के दान से करे और ऐसा न करे कि जिससे उस का योगक्षेम भी न हो, जो उस को बन्दीगृह करे तो भी उस का सत्कार यथायोग्य रक्खे ,जिस से वह हारने के शोक से रहित होकर आनन्द में रहे।”

यहां पर प्राचीन काल में हमारे राजाओं और राजनीति के द्वारा युद्ध बंदी राजा के साथ किए जाने वाले व्यवहार को स्वामी जी महाराज ने स्पष्ट किया है। युद्ध बंदी राजा के साथ सत्कार पूर्ण व्यवहार करने का अभिप्राय यह है कि उस समय भी उसकी वीरता और उसके देश के प्रजाजनों की उस भावना का हमें ध्यान रखना चाहिए जिसको अपमानित करने से वह हमारे विरुद्ध ईर्ष्या और द्वेष की अग्नि से भड़क उठेंगे और कालांतर में हमारे विरुद्ध पुनः युद्ध छेड़ने की नीति पर उतर आएंगे। विजयी राजा को संधि के समय पराजित राजा के प्रति उदारता का व्यवहार इसलिए करना चाहिए कि ऐसा करने से ही वह आपका मित्र हो सकता है। यदि उसको जबरन अपनी शर्तों पर सहमत किया गया तो आज नहीं तो कल युद्ध फिर भड़केगा।

अपमानजनक संधि होती है नए युद्ध की जननी

महर्षि दयानंद जी महाराज की इस बात को हमें इस उदाहरण से समझना चाहिए कि जब प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ था तो जर्मनी पर उसके शत्रु देशों ने ऐसी – ऐसी शर्तें लागू कर दी थीं जिससे जर्मनी के लोगों का अपना सम्मान आहत हुआ। परिणाम स्वरूप उन शर्तों ने हिटलर को जन्म दिया। वार्साय संधि में विजेता पक्ष द्वारा इस प्रकार की शर्तों को लागू करने से द्वितीय विश्व युद्ध की भूमिका तैयार हो गई। जिससे बहुत भारी विनाश संसार को देखने को मिला। इसके अतिरिक्त हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मुस्लिम शासकों ने भारत में जब-जब भी हमारे पराजित राजाओं से संधियां कीं तो वे बहुत ही अपमानजनक संधियां थीं। जिनके विरुद्ध उस राजा की प्रजा ने देर सवेर विद्रोह किया और अपने आत्मसम्मान के लिए फिर युद्ध छेड़ दिया। मुगलों की ही नीति का अनुकरण अंग्रेजों ने और भी निंदनीय ढंग से किया। यही कारण रहा कि अंग्रेजों के विरुद्ध भी भारत के लोग एक दिन के लिए भी शांत नहीं बैठे , अपितु विद्रोह अर्थात युद्ध करते ही रहे। यदि विजयी होने के पलों में विदेशी आक्रमणकारी तुर्क, मुगल और अंग्रेज हमारे लोगों के साथ सभ्यता का व्यवहार करते तो भारत के लोग उन्हें सहर्ष अपने साथ मिला लेते और उनके विरुद्ध युद्ध जैसी मानसिकता को त्याग देते।

इस संबंध में स्वामी दयानंद जी महाराज आगे व्यवस्था देते हैं कि “क्योंकि संसार में दूसरे का पदार्थ ग्रहण करना अप्रीति और देना प्रीति का कारण है और विशेष करके समय पर उचित क्रिया करना और उस पराजित के मनोवाञ्छित पदार्थों का देना बहुत उत्तम है और कभी उस को चिड़ावे नहीं, न हंसी और ठट्ठा करे, न उस के सामने हमने तुझ को पराजित किया है ऐसा भी कहै, किन्तु आप हमारे भाई हैं इत्यादि मान्य प्रतिष्ठा सदा करे।”
स्वामी जी महाराज के ज्ञान गंभीर ये को देखकर ही डॉक्टर भगवान दास ने उन्हें हिंदू पुनर्जागरण के मुख्य निर्माता के रूप में स्थापित किया है। इसी प्रकार एनी बेसेंट ने भी कहा था कि दयानंद पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत भारतीयों के लिए की घोषणा की थी।

डॉ राकेश कुमार आर्य


मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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