Categories
भारतीय संस्कृति

युद्ध में भी धर्म निभाने वाला देश है भारत – सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश (एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय 20(ख)

युद्ध में भी धर्म निभाने वाला देश है भारत

जब महाभारत का युद्ध आरंभ हुआ तो उससे पहले युद्ध के लिए नियम बनाए गए थे कि दोनों पक्षों के द्वारा दिन भर न्यायपूर्वक युद्ध करने के बाद संध्या काल में दोनों पक्षों के लोगों के बीच आपसी प्रेम बना रहेगा। उस समय कोई भी शत्रुता पूर्ण व्यव्हार नहीं करेगा। संध्या काल को संधि काल के रूप में मान्यता दी गई और यह नियम बनाया गया कि उसमें दोनों पक्षों के लोग आपस में मिल भी सकते हैं। युद्ध का नियम बनाया गया था कि जो वाग्युद्ध में प्रवृत हो उनके साथ वाणी के द्वारा ही युद्ध किया जायेगा । रथी के साथ रथी ,घुड़सवार के साथ घुड़सवार ,हाथीसवार के साथ हाथीसवार तथा पैदल के साथ पैदल युद्ध किया जायेगा। इसका अभिप्राय था कि समान शक्ति वाले से सामान शक्ति वाला ही युद्ध करेगा। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई दुर्बल हो और उसे सबल आकर मार डाले। या धर्म के विरुद्ध था।
युद्ध का एक नियम यह भी बनाया गया कि जो सेना से बाहर निकल गया हो उसको नही मारा जायेगा। जिसने आत्मसमर्पण कर दिया हो, हथियार रख दिए हों या पीठ फेर कर खड़ा हो गया हो या शारीरिक शक्ति के भंग होने या बीमार होने की अवस्था में युद्ध क्षेत्र से बाहर निकल गया हो, उस व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का युद्ध नहीं किया जाएगा।
युद्ध से पूर्व दोनों पक्षों के बीच यह बात भी स्पष्ट हो गई थी कि योग्यता, उत्साह और पराक्रम के अनुसार योद्धा को सावधान करके ही प्रहार किया जायगा, जो विश्वास करके असावधान हो रहा हो या जो अत्यंत घबराया हुआ हो उस पर वार करना उचित नहीं है। भारतवर्ष में इस प्रकार की परंपरा देहात में आजादी के बाद भी बनी रही है। धोखे और छल कपट से मारने की दुष्ट प्रवृत्ति भारत में मुसलमानों और अंग्रेजों की देन है।
सारथी, घोड़े , भेरी तथा शंख बजाने वाले लोगो पर या माल ढोने वाले लोगों पर कोई आक्रमण नहीं करेगा। जो एक के साथ युद्ध में लगा हो , शरण में आया हो , युद्ध से भाग गया हो और जिसके अस्त्र सस्त्र और कवच कट गए हों,ऐसे व्यक्ति को कदापि ना मारा जाये।

स्वामी जी महाराज द्वारा सुझाए गए युद्ध नियम

संसार में भारतवर्ष ही एकमात्र ऐसा देश है जो युद्ध में भी धर्म निभाता है। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही हमारे यहां पर युद्ध के नियम बनाकर युद्ध लड़े गए हैं। युद्ध में भी धर्म का निर्वाह करना भारतीय इतिहास का एक ऐसा आदर्श उदाहरण है जो विश्व इतिहास में अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। ईसाई और मुस्लिम बादशाहों या सम्राटों ने युद्ध में अधर्म को अपनाकर युद्ध की भारतीय परंपरा को कलंकित किया है।
यही कारण रहा कि भारत में जब मुसलमान और ईसाई आक्रमणकारी आए तो कई बार हमको अपनी ‘सद्गुण विकृति’ के कारण अर्थात युद्ध में भी नैतिकता को अपनाने की भावना के कारण पराजित होना पड़ा। सिद्धांत की अतिवादिता सदा दु:खदायक होती है। जब युद्ध में धर्म निभाने की बात कही जाती है तो उसके अपने कुछ अपवाद होते हैं, उन अपवादों को छोड़कर ही युद्ध में धर्म की भावना का निर्वाह करना चाहिए। हमें ध्यान रखना चाहिए कि जहां हम युद्ध में धर्म निभाने के लिए प्रेरित होते हैं, वहीं हम दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करने के लिए भी स्वतंत्र होते हैं।
स्वामी दयानंद जी हमारे लिए युद्ध में धर्म की सीमाएं निर्धारित करते हुए कहते हैं कि युद्ध समय में न तो इधर उधर खड़े व्यक्ति पर, न नपुंसक पर, न हाथ जोड़े हुए पर, न जिसके सिर के बाल खुल गए हों उस पर, न बैठे हुए पर, न ‘मैं तेरी शरण हूं’ ऐसा कहने वाले पर न सोते हुए पर, न मूर्छा को प्राप्त हुए पर, न नग्न हुए पर, न युद्ध से रहित पर प्रहार करे। न युद्ध करते हुए को देखने वालों को, न शत्रु के साथी को, न आयुध के प्रहार से पीड़ा को प्राप्त हुए को, न दुखी को ,न अत्यंत घायल को, ना डरे हुए को और न पलायन करते हुए पुरुष को सत्पुरुषों के धर्म का स्मरण करते हुए योद्धा लोग कभी मारें। किंतु उनको पकड़ के जो अच्छे हों, बंदी गृह में रख दें और भोजन आच्छादन यथावत देवें और जो घायल हुए हों, उनकी औषधि आदि विधि पूर्वक करें। न उनको चिढ़ावें, न दु:ख देवें। जो उनके योग्य काम हो उसे करावे। विशेष इस पर ध्यान रखें कि स्त्री, बालक, वृद्ध और आतुर तथा शोकयुक्त पुरुषों पर शस्त्र कभी न चलावे। उनके लड़के बालों को अपनी संतानवत पाले और स्त्रियों को भी पाले। उनको अपनी मां, बहन और कन्या के समान समझे , कभी विषयसक्ति की दृष्टि से भी ना देखे। जब राज्य अच्छे प्रकार जम जाए और जिनमें उन्हें उन्हें युद्ध करने की शंका न हो , उनको सत्कारपूर्वक छोड़कर अपने – अपने घर व देश को भेज देवें और जिनसे भविष्यत काल में विघ्न होना संभव हो, उनको सदा कारागार में रखे।
महर्षि मनु द्वारा प्रतिपादित और स्वामी दयानंद जी महाराज द्वारा सत्यार्थ प्रकाश के षष्ठम समुल्लास में लिखित नियमों के सूक्ष्म अवलोकन ये स्पष्ट हो जाता है कि इसमें आत्म रक्षा को कहीं भी तिलांजलि नहीं दी गई है। राष्ट्र हितों को भी सर्वोपरि रखा गया है। यदि राष्ट्र ,देश ,जाति व धर्म के लिए मर मिटने की कोई भावना देश के जागरूक क्षत्रिय समाज के भीतर ना होती या इसको धर्म विरुद्ध माना जाता तो हमारे भारतवर्ष की दिव्य संस्कृति के कुशल शिल्पकार ऋषि लोग अपनी स्मृतियों में युद्ध संबंधी ऐसे नियमों को कदापि नहीं देते। इतना ही नहीं, तब महर्षि दयानंद भी अपने पूर्वजों की दिव्य परंपरा का निर्वाह कर रहे होते।
जैसे कोई राजमिस्त्री किसी भवन के बनाते समय काट छांट कर ईंटों को लगाता जाता है और फिर एक दिन वह आ जाता है जब वह भव्य भवन बनकर खड़ा हो जाता है। बस, इसी प्रकार हमारी दिव्य और भव्य वैदिक संस्कृति के निर्माता ऋषियों ने भी इसकी एक -एक ईंट को काट छांटकर लगाया है। भव्य भवन को बनाने का नाम ही भारत का इतिहास है। इस भव्य भवन में रहकर आत्मोन्नति करने का नाम भारत की दिव्य संस्कृति है। इस प्रकार इतिहास और संस्कृति का अन्योन्याश्रित संबंध है। इस अन्योन्याश्रित संबंध को बड़ी कुशलता से महर्षि दयानंद जी महाराज ने सत्यार्थ प्रकाश के छठे समुल्लास में स्थान दिया है। राज- विषयक इस विषय को यहां रखकर स्वामी जी महाराज ने प्राचीन भारत की राजनीति और इतिहास को हमारे समक्ष प्रस्तुत कर हमें यह संदेश दिया है कि वर्तमान राजनीति को भी इन्हीं सिद्धांतों और नियमों के अनुरूप बनाकर हमें देश की सेवा करनी चाहिए।

-राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
betgaranti
betgaranti giriş
kolaybet
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
onwin giriş
sahabet giriş
betnano giriş
Kolaybet
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş