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सत्यार्थ प्रकाश में इतिहास विर्मश ( एक से सातवें समुल्लास के आधार पर) अध्याय – 24 क सभा और सभासद

सभा और सभासद

स्वामी दयानंद जी महाराज जी द्वारा स्थापित आर्य समाज की राजनीति की विचारधारा पर विचार व्यक्त करते हुए क्षीतिश वेदालंकार जी अपनी पुस्तक “चयनिका” के पृष्ठ संख्या 65 पर लिखते हैं कि -“आर्य समाज स्पष्टत: न तो एकतंत्र का न बहुतंत्र का, न ही दल तंत्र का, प्रत्युत लोकतंत्र का पक्षपाती है। आर्य समाज का संविधान इसका साक्षी है। धार्मिक क्षेत्र में जैसे गुरुडम है वैसे ही राजनीतिक क्षेत्र में एकतंत्र या अधिनायक तंत्र है। दोनों समान रूप से दूषित हैं। आर्य समाज इन दोनों का समर्थक कभी नहीं हो सकता। परंतु राजतंत्र का वाह उतना विरोधी नहीं है। राजनीति शास्त्र की परिभाषाओं की दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि आर्य समाज संसदीय लोकतंत्र का पक्ष पाती है। यदि इंग्लैंड में राजा के रहने पर भी संसदीय लोकतंत्र में बाधा नहीं पड़ती तो भारत में भी नहीं पड़ सकती। परंतु वह राजा वंश परंपरा से नहीं होना चाहिए। उसका भी लोकतंत्र के निर्वाचन पद्धति से निर्वाचन होना चाहिए। आर्य समाज का स्वपन चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित करने का है, परंतु यहां साम्राज्य शब्द से घबराने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि चक्रवर्ती साम्राज्य से आर्य समाज को भी कुछ अभिप्रेत है । वह लगभग वही है जिसे राजनीति विशारदों ने विश्व साम्राज्य का नाम दिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ की कल्पना उसी विचार का परिणाम है। आचार्य विनोबा भावे जय जगत के नारे से वही बात कहना चाहते हैं। सन्यासी के विश्व प्रेम की भावना उसी में चरितार्थ होती है और “सर्वे संतु निरामया” की वैदिक भावना तभी कृतकार्य हो सकती है।”
इस प्रकार स्वामी दयानंद जी महाराज जहां राज- धर्म की, राजा की या राजनीतिक प्रणाली की बात कर रहे हों वहां हमें इसी उद्धरण के अनुसार उनके राजनीतिक चिंतन का अर्थ लगाना चाहिए। स्वामी जी महाराज अपनी बात को मनु महाराज की मनुस्मृति के आधार पर स्पष्ट कर रहे हैं। यह उस समय की बात है जिस समय भारत में लोकतांत्रिक राजतंत्र शासन कार्य कर रहा था। कहने के लिए वह राजतंत्र था परंतु उसमें आज के तथाकथित लोकतंत्र से भी ऊंचे मानदंड थे। स्वामी जी महाराज उसी लोकतंत्र की बात कर रहे हैं।
कहने का अभिप्राय है कि इतिहास के बीते हुए उस काल को ही महिमामंडित करके स्वामी जी महाराज आज के संदर्भ में स्थापित करना चाहते थे। दूसरी बात यह भी है कि जिस समय स्वामी जी महाराज थे और सत्यार्थ प्रकाश को लिख रहे थे, उस समय वर्तमान लोकतंत्र नहीं था अपीतू उस समय भी राजतंत्र था। इसके उपरांत भी वह टूटे बिखरे रियासती राजतंत्र के समर्थक नहीं थे। वह बार-बार चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित करने की ओर आर्यों को प्रोत्साहित कर रहे थे। इसका अभिप्राय है कि वह तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में स्वाधीनता प्राप्त करने के उपरांत भी टूटे बिखरे रियासती राजतंत्र को समाप्त कर चक्रवर्ती साम्राज्य की ओर भारत को आगे लेकर बढ़ते। इसका अभिप्राय है कि वह भारत को चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित करने वाले देश के रूप में स्थापित कर विश्व गुरु के पद पर आसीन करने की ओर आगे बढ़ते।
स्वामी जी महाराज अपने द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में किसी भी प्रकार की छद्मवादी नीति को सहन नहीं करते। वे स्पष्टवादी और बिना लाग लपेट के बात को कहने वाली राजनीति के पक्षधर थे। राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने वाली राजनीति उन्हें रुचिकर थी। वह अपने देश के पहले प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के लिए उस व्यक्ति को पसंद करते जो राष्ट्र रक्षा को प्राथमिकता देता और दल से पहले देश की पूजा करने में विश्वास करता। उनका विश्वास होता कि दंड की कठोर व्यवस्था की जाए। जिससे देश में आतंकवादी और राष्ट्रद्रोही शक्तियां शांत रहें।

राजा की दिनचर्या

राजा के लिए सर्वोत्तम कार्य अपनी प्रजा का रक्षण - संरक्षण करना है। उसकी सबसे बड़ी भक्ति और शक्ति इसी में निहित है कि वह कितना अधिक लोकोपकार की भावना को अपनाता है? उसके लिए आपातकाल में संध्या से भी छूट दी गई है, यद्यपि सामान्य परिस्थितियों में राजा से भी अपेक्षा की जाती है कि वह धार्मिक क्रियाकलापों के साथ-साथ अपनी आध्यात्मिक उन्नति के प्रति भी सतर्क और सावधान रहे। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर संध्योपासन करना हमारे पूर्वजों की प्राचीन परंपरा रही है।
  इसी परंपरा और प्रक्रिया को अपनाना राजा के लिए भी अनिवार्य घोषित करते हुए स्वामी दयानंद जी महाराज महर्षि मनु के संबंधित श्लोक की व्याख्या करते हुए सत्यार्थ प्रकाश के छठे समुल्लास में लिखते हैं कि पूर्वोक्त प्रातःकाल समय उठ शौचादि सन्ध्योपासन अग्निहोत्र कर वा करा सब मन्त्रियों से विचार कर सभा में जा सब भृत्य और सेनाध्यक्षों के साथ मिल, उन को हर्षित कर, नाना प्रकार की व्यूहशिक्षा अर्थात् कवायद कर करा, सब घोड़े, हाथी, गाय आदि स्थान शस्त्र और अस्त्र का कोश तथा वैद्यालय, धन के कोषों को देख सब पर दृष्टि नित्यप्रति देकर जो कुछ उनमें खोट हों उन को निकाल, व्यायामशाला में जा, व्यायाम करके भोजन के लिये ‘अन्तःपुर’ अर्थात् पत्नी आदि के निवासस्थान में प्रवेश करे और भोजन सुपरीक्षित, बुद्धिबल पराक्रमवर्द्धक, रोगविनाशक, अनेक प्रकार के अन्न व्यञ्जन पान आदि सुगन्धित मिष्टादि अनेक रसयुक्त उत्तम करे कि जिस से सदा सुखी रहै, इस प्रकार सब राज्य के कार्यों की उन्नति किया करे।"

महर्षि मनु द्वारा डाली गई यह परंपरा सेना में आज ही लागू है। यहां तक कि विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ-साथ अंग्रेजों ने भी इस परंपरा को यथावत अपनाया था। अधिक अधिकतर मुस्लिम बादशाह और अंग्रेज अधिकारी इसी प्रकार सेना का निरीक्षण प्रतिदिन प्रातः काल में किया करते थे। यद्यपि संध्या आदि की वैदिक परंपरा से वह दूर रहे । उन्होंने केवल सैन्य बल को मजबूत करने की भारतीय परंपरा को अपनाया। इस प्रकार भारत की वैदिक परंपरा का आध्यात्मिक पक्ष उन्होंने छोड़ दिया। भारत की वर्तमान सेना या सैन्य बलों या सुरक्षाबलों में संध्या आदि का वैदिक प्रावधान तो लागू नहीं है, परंतु किसी पुजारी के माध्यम से तिलक छाप आदि लगवाने और मंदिरों में पूजा पाठ कराने की परंपरा अवश्य देखी जाती है।
कुछ लोग इस प्रकार की व्यवस्था को देखकर इसे आधुनिकता का नाम देते हैं। उनकी सोच होती है कि प्राचीन काल में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं होती होगी। परंतु स्वामी जी महाराज ने मनुस्मृति के जिस श्लोक को उद्धृत कर उसकी इस प्रकार की व्याख्या सत्यार्थ प्रकाश में की है, उसके अवलोकन से स्पष्ट होता है कि वर्तमान में सेना में जिस प्रकार की व्यवस्था दिखाई देती है वह भारत की प्राचीन परंपरा की टूटी फूटी परंपरा है। इसे आधुनिकता का नाम देकर इस प्रकार प्रचारित करना कि यह वर्तमान समय में अंग्रेजों की भारत को बहुत बड़ी देन है , हम भारतीयों की बहुत बड़ी मूर्खता है।

संध्या और हमारी आत्मशक्ति

संध्या सम्यक ध्यान के लिए कहा जाता है। सम्यक ध्यान परमपिता परमेश्वर का ही हो सकता है। संध्या में आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है, संधि होती है, इसलिए उसको संध्या कहते हैं। संध्या करने से परमपिता परमेश्वर के दिव्य गुण साधक में उसी प्रकार आ जाते हैं जैसे चुंबक के गुण लोहे को उसके पास रखने से लोहे में आ जाते हैं। ईश्वर की निकटता के बोध से व्यक्ति की आत्मशक्ति बढ़ती है। उसके भीतर आत्मबल का संचार होता है। अपनी बात को निर्भीकता से कहने की शक्ति प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त जैसे परमपिता परमेश्वर सबके साथ न्याय करते हुए सब का पालन पोषण करता है, वैसे ही व्यक्ति भी सबके साथ न्याय पूर्ण व्यवहार करते हुए सबके साथ विनम्र भाव रखता है। जहां तक राजा की बात है तो जैसे ईश्वर सबका पालन करता है वैसे ही राजा भी संध्या के माध्यम से सबका पालन करने की शिक्षा से प्रेरित होता है। यही कारण है कि आध्यात्मिक शक्ति अर्थात ब्रह्मबल की प्राप्ति करना राजा के लिए अनिवार्य किया गया है।

जो प्रतिदिन संध्या करता है, उसके चेहरे पर ब्रह्म-तेज या आध्यात्मिक चमक होती है। जो व्यक्ति शास्त्रों में बताए गए नियत समय पर, निर्धारित नियमों के अनुसार, अपनी दैनिक संध्या करता है, वह अपने हर कार्य में मनोवांछित सफलता प्राप्त करता है। वह शक्तिशाली होने के साथ-साथ मौन का अभ्यासी भी हो जाता है। नियमित संध्या वासना की जंजीर को काट देती है। व्यक्ति दुर्वासना की केंचुली से बाहर आता है और नवजीवन, नवस्फूर्ति व नवचेतना की अनुभूति अपने भीतर करता है। संध्या करने से व्यक्ति के भीतर दयालुता, निष्पक्षता न्याय प्रियता, सहयोग, सद्भाव ,सम्मैत्री, करुणा जैसे मानवोचित भावों का विकास होता है। राजा को प्रतिदिन अनेक प्रजाजनों के कष्टों को सुनना पड़ता है। ऐसे कष्टों को सुनते समय राजा अधीर ना हो, इसके विपरीत वह गंभीर बना रहे और सात्विक भावनाओं को अपनाकर बिना किसी प्रकार की चिड़चिड़ाहट दिखाएं समस्या का समाधान बहुत ही शांत भाव से करे, ऐसी उत्कृष्ट मानवीय सोच और हृदय की पवित्रता संध्या के माध्यम से ही बनती है। अतः राजा नियमित संध्या उपासना अवश्य करे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

मेरी यह पुस्तक डायमंड बुक्स नई दिल्ली के द्वारा प्रकाशित हुई है । जिसका अभी हाल ही में 5 अक्टूबर 2000 22 को विमोचन कार्य संपन्न हुआ था। इस पुस्तक में सत्यार्थ प्रकाश के पहले 7 अध्यायों का इतिहास के दृष्टिकोण से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक में कुल 245 स्पष्ट हैं। पुस्तक का मूल्य ₹300 है।
प्रकाशक का दूरभाष नंबर : 011 – 407122000।

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