अपने राष्ट्र की महान संस्कृति और उसकी मानवाधिकारवादी प्रकृति के प्रति कृतघ्नता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि लोग अपने देश को जंगलियों का देश मानकर ‘मैग्नाकार्टा’ और यू.एन.ओ. के घोषणापत्रों में मानवाधिकारों का अस्तित्व खोजते हैं। ऐसे लोगों की बुद्घि पर तरस आता है और क्षोभ भी होता है? तरस […]
Author: डॉ॰ राकेश कुमार आर्य
लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है
अनिल गुप्ता स्व.संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री इन्द्रेश जी, जो पिछले अनेक वर्षों से मुस्लिम समाज के साथ संवाद कायम करने में लगे हैं, के विभाजन और गांधीजी सम्बन्धी बयान पर उबलने वाले कांग्रेसी क्या विभाजन की घोषणा के बाद विभाजन विरोधी गांधीजी का कोई बयान दिखाएंगे? कुछ सवालों के जवाब देश जानना चाहता है […]
राजनीति का घिनौना स्वरूप हमें एक बार फिर ‘व्यापमं घोटाले’ के माध्यम से देखने को मिल रहा है। अपनी गौरवमयी ऐतिहासिक धरोहर और परंपरा के लिए प्रसिद्घ मध्य प्रदेश का नेतृत्व इस समय शिवराज सिंह नामक एक ‘चौहान’ के हाथों में है। पर यह अत्यंत दु:खद तथ्य है कि इस मुख्यमंत्री के रहते ‘व्यापमं घोटाले’ […]
देश की वास्तविकता को बयान करती तस्वीर हमारे सामने आई है। मोदी सरकार ने सामाजिक आर्थिक जनगणना के आंकड़े पेश किये हैं, इससे स्पष्ट हुआ है कि भारत की जनसंख्या का 75 प्रतिशत भाग अभी तक ऐसा है जो पांच हजार रूपये तक की मासिक आय से ही गुजारा कर रहा है। ऐसे लोगों की […]
संघ की अवधारणा
भारतीय संविधान भारत को संघ मानता और घोषित करता है। भारतीय संविधान की इस मान्यता और घोषणा का आधार ‘क्रिप्स-मिशन’ बना। क्रिप्स मिशन वेफ प्रस्तावों में भारत को संघ बनाने और उसका विभाजन करने के बीच समझौता कराने का प्रयत्न किया गया। ऊपरी तौर पर क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों में मुसलमानों की अलग संविधान सभा […]
जो लोग सुनने से पहले अपना निर्णय सुनाने के अभ्यासी होते हैं, वे अच्छे न्यायाधीश और अच्छे वात्र्ताकार नही हो सकते। अच्छा न्यायाधीश और वात्र्ताकार बनने के लिए आपके भीतर दूसरे को सुनने का असीम धैर्य होना चाहिए। सुनवाई का अवसर न्यायालयों में हर पक्षकार को इसीलिए दिया जाता है कि किसी भी पक्षकार को […]
एक समय था जब राजनीतिक लोगों की झलक पाने के लिए लोग आतुर रहा करते थे। बड़ी मुश्किल से लोगों की अपने नेताओं और जनप्रतिनिधियों से नजदीकियां विकसित हो पाती थीं। नेता के लिए सब अपने होते थे और कोई अपना नही होता था। इसलिए नेता सबके प्रति समानता का भाव बरतते थे, वह अपने […]
भाजपा जब अस्तित्व में आयी थी तो इसने ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का नारा दिया था। उसका अभिप्राय लोगों ने यह लगाया था कि यह पार्टी अन्य पार्टियों की राह को न पकडक़र राजनीति में अपना रास्ता अपने आप बनाएगी और वह रास्ता ऐसा होगा जो अन्य पार्टियों के लिए और इस देश की भविष्य की […]
भाजपा जब अस्तित्व में आयी थी तो इसने ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का नारा दिया था। उसका अभिप्राय लोगों ने यह लगाया था कि यह पार्टी अन्य पार्टियों की राह को न पकडक़र राजनीति में अपना रास्ता अपने आप बनाएगी और वह रास्ता ऐसा होगा जो अन्य पार्टियों के लिए और इस देश की भविष्य की […]
शाहिद रहीम अपनी पुस्तक ‘संस्कृति और संक्रमण’ के पृष्ठ 243 पर लिखते हैं- ‘1026 ई. से 1174 ई. तक की डेढ़ शताब्दी में कोई आक्रमण (भारत पर) नहीं हुआ। लेकिन संक्रमण के राजनीतिक प्रभाव से स्थिति इतनी दुरूह हो गयी कि संपूर्ण भौगोलिक क्षमता को आधार बनाकर कोई केन्द्रीय सत्ता स्थापित न हो सकी। धरती […]