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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व संपादकीय

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-83

गीता का सोलहवां अध्याय माना कि अर्जुन तू और तेरे अन्य चार भाई दुर्योधन और उसके भाइयों के रक्त के प्यासे नहीं हो, पर तुम्हारा यह कत्र्तव्य है कि संसार में ‘दैवीय सम्पद’ लोगों की सुरक्षा की जाए और ‘आसुरी सम्पद’ लोगों की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए उनके विरूद्घ युद्घ किया जाए। यदि […]

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संपादकीय

एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम और प्रकाश जावड़ेकर

प्रकाश जावड़ेकर इस समय केंद्र की मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री है। उन्होंने भाजपा के संगठन और सरकार में अपना स्थान अपनी मेहनत और पुरुषार्थ से बनाया है। वह मोदी सरकार के परिश्रमी मंत्रियों में गिने जाते हैं। यही कारण है कि उन्हें मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का भारी भरकम […]

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संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा

मनोयोग से तप करता रहा वीर बन्दा वैरागी

बंदा बैरागी ने इतिहास को करवट दिला दी वीर सावरकर ने लिखा है-”सत्रहवीं शती के प्रारंभ से अर्थात प्राय: शिवाजी के जन्म से ही हिंदू मुसलमानों के संघर्ष में रणदेवता के निर्णय में एक आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा जाने लगा। पहले जहां हिंदू मुस्लिम संघर्ष में अंतिम पराजय हिंदुओं की हुआ करती थी, वहीं अब ठीक […]

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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व संपादकीय

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-82

गीता का सोलहवां अध्याय गीता के 15वें अध्याय में प्रकृति, जीव तथा परमेश्वर का वर्णन किया गया है तो 16वें अध्याय में अब श्रीकृष्णजी मनुष्यों में पाई जाने वाली दैवी और आसुरी प्रकृतियों का वर्णन करने लगे हैं। इन प्रकृतियों के आधार पर मानव समाज को दैवीय मानव समाज और आसुरी मानव समाज इन दो […]

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संपादकीय

लघुता पाय प्रभुता पाई

गोस्वामी तुलसीदासजी ने ‘रामचरित मानस’ में जिस प्रसंग में यह कहा है कि ‘लघुता पाय प्रभुता पाई’-उसका वहां अर्थ है कि विनम्रता से अर्थात लघुता से मनुष्य बड़प्पन प्राप्त कर लेता है, महानता की प्राप्ति करता है। गोस्वामीजी ने जहां भी जैसे भी जो भी कुछ कहा है उसका विशेष और गम्भीर अर्थ है। अब […]

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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व संपादकीय

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-81

गीता का पन्द्रहवां अध्याय गीता में ईश्वर का वर्णन गीता का मत है कि सूर्य में जो हमें तेज दिखायी देता है वह ईश्वर का ही तेज है। ‘गीताकार’ का कथन है कि जो तेज चन्द्रमा में और अग्नि में विद्यमान है, वह मेरा ही तेज है, ऐसा जान। किसी कवि ने कहा है- कह […]

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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व संपादकीय

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-80

गीता का पंद्रहवां अध्याय और विश्व समाज जो लोग अपनी ज्ञान रूपी खडग़ से या तलवार से संसार वृक्ष की जड़ों को काट लेते हैं और विषयों के विशाल भ्रमचक्र से मुक्त हो जाते हैं- उनके लिए गीता कहती है कि ऐसे लोग अभिमान और मोह से मुक्त हो गये हैं, उन्होंने आसक्ति के दोषों […]

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संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा

शत्रु ने छल से घेरना आरंभ किया वीर बंदा बैरागी को

रोगग्रस्त हो गया दिल्ली दरबार बादशाह बहादुरशाह की मृत्यु के उपरांत दिल्ली दरबार उत्तराधिकार के युद्घ के कारण रोगग्रस्त हो गया। उसकी इस अवस्था का लाभ वीर वैरागी को मिला। मुसलमानों के लिए ‘गुरूभूमि’ पंजाब जिस प्रकार की चुनौती प्रस्तुत कर रही थी-वह दिल्ली के लिए गले की हड्डी बन चुकी थी। वीर वैरागी को […]

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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व संपादकीय

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-79

गीता का पंद्रहवां अध्याय और विश्व समाज यह जो प्रकृति निर्मित भौतिक संसार हमें दिखायी देता है-यह नाशवान है। इसका नाश होना निश्चित है। यही कारण है कि गीता के पन्द्रहवें अध्याय में प्रकृति को ‘क्षर’ कहा गया है। इससे जो कुछ बनता है वह क्षरण को प्राप्त होता है। बच्चा जन्म लेता है, फिर […]

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गीता का कर्मयोग और आज का विश्व संपादकीय

गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-78

गीता का चौदहवां अध्याय और विश्व समाज क्या है त्रिगुणातीत? जब श्रीकृष्णजी ने त्रिगुणों की चर्चा की और लगभग त्रिगुणातीत बनकर आत्म विजय के मार्ग को अपनाकर जीवन को उन्नत बनाने का प्रस्ताव अर्जुन के सामने रखा तो अर्जुन की जिज्ञासा मुखरित हो उठी। उसने अन्त:प्रेरणा से प्रेरित होकर श्रीकृष्णजी के सामने अपनी जिज्ञासा प्रकट […]

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