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पुस्तक समीक्षा

भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास , भाग – 1 ‘ वह थमे नहीं हम थके नहीं ‘

लेखक ने सन 712 ईस्वी से लेकर 1947 तक का 1235 वर्ष का भारत का स्वाधीनता संग्राम एक अनुपम और अद्वितीय ढंग से प्रस्तुत किया है। लेखक की मान्यता है कि भारतवर्ष कभी गुलाम नहीं रहा। तथाकथित गुलामी एक मतिभ्रम है। वास्तविकता यह है कि भारत अपनी स्वाधीनता की रक्षा के लिए पहले दिन से […]

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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

लैटरल एंट्री स्कीम पर राहुल गांधी का विलाप

18 वीं लोकसभा के चुनावों के समय विपक्ष और विशेष रूप से राहुल गांधी ने जिस प्रकार की घटिया राजनीति का प्रदर्शन किया, उस पर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है। जनता में भ्रम फैलाकर जिस प्रकार उन्हें सरकार के विरुद्ध भड़काने का काम राहुल गांधी ने किया , उसके परिणाम अभी हमें […]

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पर्व – त्यौहार

स्वामी श्रद्धानन्दजी की कलम से- रक्षाबन्धन का संदेश

[‘रक्षाबन्धन’ पर्व पर विशेष रूप से प्रकाशित ] माता का पुत्र पर जो उपकार है उसकी संसार में सीमा नहीं। यही कारण है कि हर समय और हर देश में मातृशक्ति का स्थान अन्य शक्तियों से ऊंचा समझा जाता है। जहां ऐसा नहीं है वहां सभ्यता और मनुष्यता का अभाव समझा जाता है। जब वह […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत

मेरे मानस के राम अध्याय 43 : सीता की हत्या करने का रावण का विचार

बांह पसारे राम ने, किया लखन सत्कार। गले लगाया प्यार से , सिर सूंघा कई बार।। लक्ष्मण जी की चोट को , सह न पाए राम । नि:श्वास लेने लगे , कहा – करो आराम ।। ( आज रामचंद्र जी के लिए बहुत ही कष्ट का समय था। उन्हें ऐसा लग रहा था कि उनके […]

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विश्वगुरू के रूप में भारत

मेरे मानस के राम , अध्याय : 42 , मन मैला लंकेश का…

रावण का एक-एक योद्धा संसार से विदा हो रहा था। अब उसके पास अपना सबसे बड़ा योद्धा उसका अहंकार ही शेष बचा था। यद्यपि इसी अहंकार ने उसके अनेक योद्धाओं का अंत करवा दिया था। उसके हरे-भरे देश को शवों का ढेर बना दिया था। अब ऐसी स्थिति आ चुकी थी, जिससे रावण पीछे हट […]

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मेरे मानस के राम : अध्याय , 41: मेघनाद का अंत

एक दिन निश्चय होत है, पापी का भी अंत। बचता नहीं अभिशाप से, देता है जब संत।। धर्म विरुद्ध जो भी चले, निश्चय पापी होय। फल कठोर उसको मिले, बचा ना पावे कोय।। न्याय चक्र चलता सदा, धर्म चक्र के साथ। वंश सदा ही डूबता , किया हो जिसने पाप।। विभीषण जी से सारी जानकारी […]

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मेरे मानस के राम : अध्याय , 40 : नकली सीता का वध

राक्षसी शक्तियां प्राचीन काल से ही युद्ध को येन- केन- प्रकारेण जीतने का प्रयास करती रही हैं। इसके लिए उन्होंने युद्ध में भी धर्म निभाने की भावना को पूर्णतया उपेक्षित किया। हमारे प्राचीन साहित्य में सकारात्मक या धर्म की रक्षा के लिए युद्ध लड़ने वाली शक्तियों के द्वारा कहीं पर भी मायावी या छद्म उपायों […]

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मेरे मानस के राम अध्याय 39 मेघनाद ने किया राम और लक्ष्मण को अधमरा

विभीषण और हनुमान जी, लेकर हाथ मशाल । घूम रहे रणभूमि में , लाशें पड़ीं विशाल।। जामवंत भी हो गए , घायल थे गंभीर। विभीषण जी के साथ में, पहुंचे हनुमत वीर ।। जामवंत जी बहुत ही विद्वान व्यक्ति थे। वह विद्वान के साथ-साथ एक अच्छे-अच्छे चिकित्सक भी थे। उन्होंने रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी […]

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मेरे मानस के राम : अध्याय , 38 कुंभकर्ण का वध

कुंभकर्ण ने अपने भाई विभीषण को अपने आगे से सम्मान पूर्वक शब्दों के माध्यम से हटा दिया। कुंभकर्ण जानता था कि इस महाविनाशकारी युद्ध में उसके सहित सारी राक्षस सेना मारी जाएगी। अंत में रावण भी मारा जाएगा। ऐसे में विभीषण को सुरक्षित रहना चाहिए। अतः अच्छा यही होगा कि मैं उन पर किसी प्रकार […]

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मेरे मानस के राम : अध्याय , 37 : कुंभकर्ण रावण संवाद

रामचंद्र जी यद्यपि बहुत ही सौम्य प्रकृति के व्यक्ति थे, पर उनके भीतर आज सात्विक क्रोध अर्थात मन्यु अपने चरम पर था। वीरों का क्रोध भी सात्विक होता है। जिसमें नृशंसता , क्रूरता , निर्दयता और अत्याचार की भावना दूर-दूर तक भी नहीं होती। उन्हें क्रोध भी लोक के उपकार के लिए आता है। उनका […]

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