कविता — 35 औदास्यमय उत्ताप की छाया से बचते वीरवर, नहीं देखते शूल कितने बिखरे पड़े हैं मार्ग पर। गाड़ते हैं निज दृष्टि को वे तो सदा ही लक्ष्य पर, वे चैन लेते हैं तभी जब पहुंच जाते गंतव्य पर।। आत्मावलम्बी बोध से जो ऊर्जा लेते सदा, निष्काम कर्म योग से जीवन महकता सर्वदा। जो […]
अमृतपुत्र हो तुम सोच लो ….