राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार चंद्रगुप्त मौर्य और बैक्टीरिया के आक्रमणकारी

भारत के संबंध में मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां बड़ी सार्थक हैं :—

” गौतम वशिष्ट समान मुनिवर ज्ञान दायक थे यहां ,

मनु याज्ञवल्क्य समान उत्तम विधि विधायक थे यहां । वाल्मीकि वेद व्यास से गुणगान गायक थे यहां ,

पृथु , पुरु ,भरत , रघु से अलौकिक लोकनायक थे यहां।। ”

हमारे महान शासक राजा पोरस से हारकर सिकंदर अपने देश लौट गया था । विश्व विजेता का संकल्प लेकर भारत की ओर बढ़े सिकंदर के लिए यह बहुत ही दुख का विषय था कि वह भारत के एक छोटे से शासक से हार गया । भारत के इस महान शासक ने सिकंदर के विश्व विजेता बनने के संकल्प को चकनाचूर कर दिया । इससे न केवल सिकंदर का सपना चकनाचूर हुआ , अपितु भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने में भी राजा पोरस ने अपने इस महान कार्य के माध्यम से बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपनी इस पराजय से सिकंदर को बहुत आत्मग्लानि अनुभव हुई थी ।

सिकंदर का साम्राज्य

इतिहासकारों का मानना है कि जब सिकंदर ने इस संसार से विदा ली तो उसने अपने पीछे एक विशाल साम्राज्य छोड़ा था । यद्यपि वह स्वयं अपने इस साम्राज्य से निराश था , क्योंकि वह अपनी इच्छा के अनुकूल विशाल साम्राज्य स्थापित नहीं कर पाया था। सिकंदर के इस विशाल साम्राज्य में उस समय मैसीडोनिया,सीरिया, बैक्ट्रिया, पार्थिया, अफ़ग़ानिस्तान एवं उत्तर पश्चिमी भारत के कुछ भाग सम्मिलित थे। इस साम्राज्य का बहुत बड़ा भाग सिकन्दर के देहान्त के पश्चात सेल्युकस के अधीन रहा। परंतु इतिहास का यह भी एक सच है कि वह अपने इस विशाल साम्राज्य की सुरक्षा नहीं कर पाया था । इसका कारण यह था कि चंद्रगुप्त मौर्य औऱ उसके गुरु आचार्य चाणक्य इस बात को लेकर बहुत सचेत और जागरूक रहते थे कि भारत की एकता और अखंडता तभी सुरक्षित रह सकती है , जब सेल्यूकस के नियंत्रण में गया भारतवर्ष का भाग लौट करके फिर से चंद्रगुप्त मौर्य के आधीन हो जाए । चाणक्य की प्रेरणा से ही चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस से अपना वह भूभाग फिर से प्राप्त कर लिया जिसे सिकंदर अपना विजित प्रदेश कहकर सेल्यूकस को देकर गया था । भारत के प्रचलित इतिहास में इस घटना को या तो उल्लिखित ने किया गया है या फिर बहुत संक्षेप में इस पर प्रकाश डाला गया है , जबकि उस समय भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने के दृष्टिकोण से चंद्रगुप्त मौर्य के द्वारा किया गया यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण था।

चंद्रगुप्त मौर्य की यह बहुत बड़ी विजय थी । जिसे सिकंदर की तथाकथित विजय से अधिक महिमामंडित कर इतिहास में स्थान देने की आवश्यकता थी । यह इसलिए भी आवश्यक था कि चंद्रगुप्त मौर्य के साथ खड़े चाणक्य ने राष्ट्रवाद ,राष्ट्रीयता और राष्ट्रधर्म पर न केवल अपनी चाणक्य नीति में भरपूर प्रकाश डाला है अपितु उसने अपने शासन के लिए भी इन सबकी बहुत अधिक आवश्यकता मानी है और चंद्रगुप्त मौर्य ने इन्हीं सबको दृष्टिगत रखकर शासन किया था । ऐसे में चंद्रगुप्त मौर्य के द्वारा किए गए उन कार्यों का उल्लेख इतिहास में किया जाना बहुत ही आवश्यक था जिनसे राष्ट्रीय एकता बलवती होती है या हमारे पूर्वजों के उस चिंतन और सोच का ज्ञान होता है जिससे वह उस समय राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में सफल हुए या उसके प्रति संघर्ष करते रहे । इससे हमारी नई पीढ़ी को अपने गौरवपूर्ण इतिहास को समझ कर उससे प्रेरणा लेने का अवसर मिले।

भारत से ईर्ष्या भाव रखने वाले इतिहासकारों ने इस घटना को बहुत हल्के से लिखा है । उनकी दृष्टि में यह बड़ी बात थी कि सिकंदर ने भारत का कुछ भूभाग जीता । इस घटना को वह अधिक महिमामंडित करके दिखाने का प्रयास करते हैं । जिससे कि भारत के लोगों के भीतर आत्महीनता का बोध उत्पन्न हो और वह यह सोचें कि भारत तो प्रारंभ से ही पिटता चला आया है । इतिहास की घटनाओं के इस प्रकार के प्रस्तुतिकरण का परिणाम यह हुआ है कि भारत का एक बड़ा वर्ग इतिहास की वास्तविकताओं से परिचित न होने के कारण आत्महीनता के भंवरजाल में फंस चुका है।

इस प्रकार की ईर्ष्या भाव रखने वाली मानसिकता वाले इतिहासकारों के लिए यह बात अधिक महत्वपूर्ण नहीं है कि भारत ने तथाकथित पीटने वाले को पीट कर अपनी पिटाई का बदला भी लिया है , अर्थात यदि कोई विदेशी आक्रांता किसी भी प्रकार से बाहर से किसी भूभाग को प्राप्त करने में सफल हो गया तो भारत के ‘पुनरुज्जीवी पराक्रम ‘ ने उसे फिर से प्राप्त करने में देर नहीं की । चंद्रगुप्त मौर्य भारत के इसी ‘ पुनरुज्जीवी पराक्रम ‘ का ही प्रतीक था । जिसने सेल्यूकस से अपने भारतीय भूभाग को प्राप्त कर भारत के पराक्रम का परिचय दिया था।

भारत हो गया था पूर्णत: जागरूक

सिकंदर के देहांत के पश्चात सेल्यूकस ने कुछ देर तक उसके दिए हुए साम्राज्य को संभालने का प्रयास किया। परंतु चंद्रगुप्त मौर्य जैसे वीर शासकों के रहते उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा । सेल्यूकस के परवर्ती शासक या अधिकारी तो सिकंदर के इस साम्राज्य को संभालने में पूर्णतया असफल सिद्ध हुए । इसका एकमात्र कारण यही था कि भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा के प्रति पूर्णतया जागरुक हो चुका था । आचार्य चाणक्य के प्रधानमंत्री रहते हुए भला यह कैसे संभव था कि भारत की तत्कालीन शासकीय नीतियों में सीमाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता न की जाए , और सीमाओं की सुरक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध न किए जाएं ? अतः सेल्यूकस या उसके परवर्ती उत्तराधिकारी यदि अपने साम्राज्य की संभाल करने में असफल हुए तो इसके पीछे चंद्रगुप्त मौर्य और आचार्य चाणक्य की नीतियों को पूर्णतया उत्तरदायी मानना चाहिए। जिनके चलते किसी भी विदेशी शासक के लिए अब सिकंदर बनकर भारत की सीमा में प्रवेश करना सर्वथा असंभव हो गया था ।

सत्यकेतु विद्यालंकार जी अपनी पुस्तक ‘मध्य एशिया तथा चीन में भारतीय संस्कृति ‘ के पृष्ठ 10 पर लिखते हैं कि – चंद्रगुप्त मौर्य ने 305 ईसा पूर्व में सेल्यूकस को हराकर हिरात , कंधार ,काबुल और मकरान उससे ले लिए थे। राजनीति व कूटनीति के महान पंडित चाणक्य की नीति आज तक भी भारत सहित सभी देशों के शासकों को यह प्रेरणा देती है कि किस प्रकार अपने पड़ोसी शासक को दुर्बल रखकर अपने राष्ट्रीय हितों की साधना शासकों को करनी चाहिए ?

वास्तव में चंद्रगुप्त मौर्य का यह कार्य राष्ट्रीय एकता के दृष्टिकोण से ही किया गया कार्य था । वह आर्यावर्त की उन सीमाओं के प्रति सचेत और सावधान थे जो कभी भारत के विशाल साम्राज्य को टर्की तक फैलाए हुए थीं । उनकी दृष्टि में यदि आज के अफगानिस्तान और ईरान में भी कोई व्यक्ति उथल – पुथल करता था तो वह भी आर्यावर्त या भारत की सीमाओं में की गई उथल पुथल ही मानी जाती थी । इसलिए चंद्रगुप्त मौर्य के इस प्रयास को विदेशी धरती पर किया गया कार्य न समझ कर तत्कालीन आर्यावर्त की सीमाओं में किए गए कार्य के रूप में देखा जाना चाहिए । जिससे पता चलता है कि वह अपनी राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए कितने क्रियाशील थे ?

जिस समय महामति चाणक्य स्वयं जीवित थे , उस समय उन्होंने ऐसी साधना न की हो यह कैसे संभव है ? निश्चित ही उन्होंने ऐसे सारे उपाय किए होंगे जिससे सिकंदर के द्वारा स्थापित किया गया ‘पड़ोस का साम्राज्य ‘ छिन्न-भिन्न हो कर रह जाए और भारत अपने पुराने वैभव को फिर से प्राप्त करने में सफल हो । इस प्रकार चाणक्य की देशभक्ति और सफल कूटनीति के कारण ही सिकंदर के द्वारा स्थापित किया गया अफगानिस्तान और उससे लगता हुआ उसका सारा साम्राज्य बहुत शीघ्र बिखर कर समाप्त हो गया । प्राचीन भारत के इस महान प्रधानमंत्री की इस महान योजना को इतिहास में समुचित स्थान मिलना अपेक्षित है ।

इतिहासकारों ने सिकंदर के आक्रमण को धूमकेतु की भान्ति उठने वाला एक तूफान कहकर संबोधित किया है ,जो शीघ्र ही कहीं अनंत में विलीन हो गया । जबकि सच यह है कि यह तूफान स्वयं विलीन नहीं हुआ था , अपितु उसे विलीन किया गया था और उसके पीछे चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य की जोड़ी काम कर रही थी ।

साम्राज्य बिखर गया

लगभग ई. पू. 250 में बैक्ट्रिया के प्रशासक डियोडोटस एवं पार्थिया के गवर्नर औरेक्सस ने अपने आपको स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। बैक्ट्रिया के दूसरे राजा डियोडोटस द्वितीय ने अपने देश को सेल्युकस के साम्राज्य से पूर्णतः अलग कर लिया। सिकंदर के साम्राज्य के इस प्रकार से दुर्बल पड़ जाने के पीछे चाणक्य की कूटनीति ने काम किया और जो लोग भारत को नीचा दिखाने के लिए चले थे , वह स्वयं ही कुछ देर पश्चात मिटकर समाप्त हो गए। यद्यपि उनके पतन के काल में चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य तो नहीं थे , परंतु उनकी कूटनीति और उनके द्वारा स्थापित किया गया मजबूत साम्राज्य तो अभी काम कर ही रहा था । यह एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि व्यक्ति तो चला जाता है , परंतु उसकी नीतियां , उसके विचार और उसकी विचारधारा बहुत देर बाद तक लोगों का मार्गदर्शन करती रहती है । जितनी ही अधिक शुद्ध पवित्र नीतियां , विचार और विचारधारा होती है, उतनी ही दूर तक वह देश , समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन करने में सक्षम होती हैं । इसी प्रकार प्रधानमंत्री चाणक्य और सम्राट चंद्रगुप्त की नीतियों ने उनके उत्तराधिकारियों का दूर तक मार्गदर्शन किया ।

यही कारण था कि चाहे सिकंदर के संसार से चले जाने के पश्चात बहुत देर तक उसके वंशज या उत्तराधिकारी भारत के पश्चिमी भूभाग पर अपना नियंत्रण स्थापित कर राज्य स्थापित करने के सपने संजोते रहे , परंतु उनमें से कोई भी फिर से न तो सिकंदर बन पाया और न ही अपना राज्य स्थायी रूप से किसी भारतीय भूभाग पर स्थापित करने में सफल हो पाया। इसका कारण यही था कि भारत का पराक्रम जाग चुका था और वह अब किसी दूसरे सिकंदर को अपने देश की सीमाओं में प्रवेश करने देने को तैयार नहीं था। यद्यपि सिकंदर के उत्तराधिकारियों की ओर से भारत की सीमाओं के साथ छेड़छाड़ दीर्घकाल तक होती रही , परंतु वह इतनी महत्वपूर्ण नहीं थी , जितना कि सिकंदर के द्वारा किया गया स्वयं का आक्रमण महत्वपूर्ण था।

डियाडोटस एवं उसके उत्तराधिकारी मध्य एशिया में अपना साम्राज्य सुगठित करने में व्यस्त रहे , किन्तु उनके उत्तरवर्ती एक शासक डेमेट्रियस प्रथम (ई. पू. 220–175) ने भारत पर आक्रमण किया। ई. पू. 183 के लगभग उसने कुछ भाग अफगानिस्तान का तो कुछ भाग भारत के तत्कालीन पंजाब का जीतने में सफलता प्राप्त की । इतना ही नहीं उसने साकल को अपनी राजधानी बना कर वहां से शासन करना भी आरंभ कर दिया । डेमेट्रियस ने भारतीयों के साथ अपना तारतम्य स्थापित करने और उन पर अपना राजकीय वर्चस्व स्थापित करने के दृष्टिकोण से भारतीयों के राजा की उपाधि धारण की । इस विदेशी शासक ने यूनानी तथा खरोष्ठी दोनों लिपियों वाले सिक्के चलाए। यहां पर यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि जब डेमेट्रियस भारत में व्यस्त था, तभी उसके बैक्ट्रिया में एक युक्रेटीदस की अध्यक्षता में विद्रोह हो गया और डेमेट्रियस को बैक्ट्रिया से हाथ धोना पड़ा।

हेमचंद्र राय चौधरी जैसे इतिहासकारों के माध्यम से हमें पता चलता है कि बैक्ट्रिया की ओर अशोक के धर्म प्रचारक और बौद्ध भिक्षु बौद्ध धर्म का प्रचार करने वहां पहुंचे थे । कपिशा में अनेकों स्तूप उस समय बनवाए गए थे । अशोक की मृत्यु के पश्चात भारतीय बैक्ट्रिया यूनानी बादशाह के समीप बैक्ट्रिया से लेकर पूर्वी पंजाब तक शासन करते थे । उस समय के हिंदूकुश में भारतीय संस्कृति प्रचलित थी । वहां पर उस समय प्राकृत भाषाएं बोली जाती थी और भारतीय भाषाओं के सिक्के चलते थे। ईसा पूर्व 135 के करीब जर्दन नदी के पास के अपने घरों में यूचियों द्वारा भगाए जाने पर शक लोग दक्षिण की ओर बढ़ कर बैक्ट्रिया में फैल गए।

विद्वानों का यह भी निष्कर्ष है कि सम्राट मित्रदत्त द्वीतीय ने 123 से 88 ईसा पूर्व के मध्य उन्हें पूर्व में धकेल दिया । जहां उन्होंने भारतीय बैक्ट्रियन यूनानियों से अफगानिस्तान और पूर्वी पंजाब जीत लिया । तब कुषाण आए। उन्होंने यूची जातियों को संगठित करके हिंदूकुश पार करने के बाद भारतीय पार्थियनों से काबुल और कंधार लेकर मध्य एशिया के काशगर खोतान और अफगानिस्तान के काबुल और कंधार तक भारत के कश्मीर ,पंजाब और सिंध में 20 ईसवी सन में कुषाण साम्राज्य की स्थापना की। यूचियों में सर्वाधिक श्रेष्ठ कुषाण सम्राट कनिष्क को माना जाता है । जिसके बारे में इतिहासकारों का मत है कि इसने ईसवी सन 78 से 123 ईसवी तक शासन किया था । इसके शासनकाल में बौद्ध मत का विशेष प्रचार प्रसार हुआ। क्योंकि इसने स्वयं ने भी बौद्ध मत स्वीकार कर लिया था। फलस्वरूप एशिया के अधिकांश भागों में बौद्ध धर्म के प्रचार को बड़ा प्रोत्साहन मिला। जिसमें अफगानिस्तान का क्षेत्र भी सम्मिलित था । मैथिलीशरण गुप्त ही कहते हैं :—

वे आर्य ही थे जो कभी अपने लिए जीते न थे ,

वे स्वार्थरत हो मोह की मदिरा कभी पीते न थे ।

संसार के उपकार के हित जब जन्म लेते थे सभी , निश्चिंत होकर किस तरह में बैठ सकते थे कभी ।।

कहने का अभिप्राय है कि राष्ट्रीय एकता के लिए काम करना और सामाजिक समरसता को बनाए रखना हमारे राष्ट्र धर्म का प्रमुख अंग था , अपने इसी राष्ट्र धर्म का पालन चंद्रगुप्त मौर्य ने भी किया। ऐसे महान शासक को हमारा कोटि-कोटि प्रणाम ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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