शिवाजी महाराज की विचारधारा और हमारा राष्ट्रीय आंदोलन

इतिहास में कोई भी घटना अपने समकालीन इतिहास को अवश्य प्रभावित करती है । यदि उस घटना के समकालीन घटना चक्र पर दृष्टिपात किया जाए तो पता चलता है कि एक घटना दूसरी को और दूसरी घटना तीसरी को प्रभावित करके चली जाती है । इससे एक घटना का प्रभाव बहुत आगे तक भी पड़ना संभव है । इसी से इतिहास की सरिता का प्रवाह निरंतर प्रवाहमान रहता है । इतिहास की सरिता की इसी प्रवाहमानता से राष्ट्रीय एकता बलवती होती है।

यदि मराठा साम्राज्य की स्थापना से पहले विजयनगर का साम्राज्य हिंदू प्रतिरोध की पवित्र भावना का प्रतिनिधि बनकर भारत की अंतश्चेतना को आगे बढ़ा रहा था तो उसका यह पवित्र कार्य आगे मराठा साम्राज्य ने हिंदवी साम्राज्य की स्थापना करके बढ़ाया था । हिंदवी साम्राज्य के संस्थापक मराठा शासकों का पतन तो हो गया , पर हमारा ध्यान इस ओर कभी नहीं गया कि उनके रहते हुए ऐसी कौन-कौन सी घटनाएं हुईं जो इस देश के स्वाधीनता आंदोलन को प्रभावित करती रहीं या उसको गतिमान करने में सहायक बनीं ?

इतिहास का यह एक कटु सत्य है कि भारत को मुक्त कराने के लिए सशस्त्र विद्रोह की एक अनवरत परम्परा रही है। सशस्त्र विद्रोह की इस परंपरा में ही हमें मराठा साम्राज्य के शासकों के प्रयासों को सम्मिलित करना चाहिए । मराठा साम्राज्य के शासकों ने जहां मुगलों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया और भारत को स्वतंत्र करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई , वहीं मराठा साम्राज्य के रहते हुए अंग्रेजों के विरुद्ध भी सशस्त्र विद्रोह की यह परंपरा स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ गई । जो लोग यह मानते हैं कि भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के साथ ही सशस्त्र विद्रोह का आरम्भ हो गया था , वह ऐसा कहकर सत्य को छुपाने का प्रयास करते हैं ।भारत में तो सशस्त्र विद्रोह वास्तव में उसी दिन से प्रारंभ हो गया था , जिस दिन से किसी भी विदेशी आक्रांता ने यहां अपना छोटा सा भी साम्राज्य स्थापित किया था ।

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि 1857 की क्रांति के पूर्व भारतवर्ष में बंगाल में सैनिक-विद्रोह, चूआड़ विद्रोह, सन्यासी विद्रोह, संथाल विद्रोह जैसे अनेक सशस्त्र विद्रोहों की लंबी और अनवरत श्रंखला क्यों चल रही थी ?- निश्चित ही इनके पीछे विद्रोह की वह भावना थी जो हमारे देशवासियों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित कर रही थी । इन सारे विद्रोहों की परिणति 1857 की क्रांति के रूप में हुई । यदि इन विद्रोहों के बारे में भी चिंतन किया जाए तो पता चलता है कि इनको हमारे वह महान योद्धा प्रभावित और प्रेरित करते रहे जो महाराणा प्रताप और शिवाजी के रूप में यत्र – तत्र और पराभव पूर्ण पराधीनता के उस काल में अपना तेजस्वी पराक्रम देश की स्वाधीनता के लिए प्रकट करते रहे थे।प्रथम स्वातन्त्र्य–संघर्ष के असफल हो जाने पर भी हम उसे असफल नहीं मानते , क्योंकि उसकी असफलता में ही उसकी सफलता का राज छिपा था । उसका कारण यही था कि 1857 की क्रांति के पश्चात भी हमारे देश में क्रांतिकारी आंदोलन निरंतर गति पकड़ता चला गया । इससे स्पष्ट होता है कि हमने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने महारथी भाव को या मराठा भाव को या हिंदुत्व की उस पवित्र भावना को मरने नहीं दिया जो हमको स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देने के लिए प्रेरित करती रही थी।

फलस्वरूप विद्रोह की अग्नि ठण्डी नहीं हुई। शीघ्र ही दस-पन्द्रह वर्षों के उपरांत पंजाब में कूका विद्रोह व महाराष्ट्र में वासुदेव बलवन्त फड़के के छापामार युद्ध आरम्भ हो गए। इन सब पर शिवाजी का चिंतन स्पष्ट अपना प्रभाव दिखा रहा था । संयुक्त प्रान्त में तो पं॰ गेंदालाल दीक्षित ने शिवाजी जैसे महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी के महान विचारों से प्रेरित होकर शिवाजी समिति और मातृदेवी नामक संस्था की स्थापना की।

शिवाजी की इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए बंगाल में क्रान्ति की अग्नि सतत जलती रही। सरदार अजीतसिंह ने 1857 के स्वतंत्रता–आन्दोलन की पुनरावृत्ति के प्रयत्न आरम्भ कर दिए। रासबिहारी बोस और शचीन्द्रनाथ सान्याल ने बंगाल, बिहार, दिल्ली, राजपूताना, संयुक्त प्रान्त व पंजाब से लेकर पेशावर तक की सभी छावनियों में प्रवेश कर 1915 में पुनः विद्रोह की सारी तैयारी कर ली थी। यह अलग बात है कि यह सभी महान क्रांतिकारी अपने प्रयत्न में सफल नहीं हो सके । दुर्दैव से यह प्रयत्न भी असफल हो गया था । शिवाजी महाराज की महान विचारधारा का अनुसरण करते हुए भारत वर्ष के प्रत्येक कोने में और प्रत्येक प्रांत में क्रांतिकारी जन्म लेते रहे और विदेशी सत्ताधारियों को यहां से भगाने के लिए अपना बलिदान देते रहे ।

देश ,काल व परिस्थिति के अनुसार अब साम्राज्य स्थापित करने तो संभव नहीं थे , परंतु हमारे क्रांतिकारी नेताओं ने अब अपने विद्रोह और विरोध का एक आधुनिक उपाय अपनाया , जिसमें विदेशों में अपनी स्थायी सरकारें बनाना भी सम्मिलित था । इसी मार्ग पर चलते हुए राजा महेन्द्र प्रताप और उनके साथियों ने अफगान प्रदेश में अस्थायी व समानान्तर सरकार स्थापित कर ली। अंग्रेजों के सामने इतना साहस दिखाना अपने आप में बहुत बड़ी बात थी, परंतु इस साहस के पीछे हमारा मानना है कि शिवाजी जैसे महापुरुषों का प्रेरक व्यक्तित्व ही कार्य कर रहा था । शिवाजी की परंपरा में विश्वास रखने वाले ऐसे अनेकों क्रांतिकारी हुए जिन्होंने विदेशों में रहकर क्रांतिकारी सेना खड़ी की और वहां से भारत की क्रांति का संचालन किया । इनमें रासबिहारी बोस का नाम अग्रगण्य है । रासबिहारी बोस ने जापान में आज़ाद हिन्द फौज के लिए अनुकूल भूमिका बनाई। इसी सेना का नेतृत्व आगे चलकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने संभाला । इस प्रकार हमारा मानना है कि 1674 में हिंदवी स्वराज्य का संकल्प लेने वाले शिवाजी की परंपरा वहां से चलकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्ति के अंतिम क्षणों तक हमारा मार्गदर्शन करती रही ।

बात निकलती है तो दूर तक जाती है — इस मुहावरे का अभिप्राय है कि परंपरा चलती है तो दूर तक और देर तक किसी देश या समाज का साथ देती है । इस संदर्भ में भारत की परंपराएं तो युगों पुरानी हैं ,जो सनातन धर्म के माध्यम से हमारा मार्गदर्शन करती चली आ रही हैं । अतः शिवाजी के या उन जैसे उनके पूर्ववर्ती क्रांतिकारी लोगों के माध्यम से जो सशस्त्र क्रांति की अनवरत परंपरा हमारे यहां पर डाली गई या स्वाधीनता का बिगुल फूंकने वाले लोगों ने चलाई थी , वह परंपरा हमारा दूर तक और देर तक साथ क्यों न देती ? आजाद हिंद फौज का नेतृत्व स्वीकार कर सुभाष चंद्र बोस ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया । इधर भारत ने भी उनकी आजाद हिंद फौज का भव्यता के साथ स्वागत किया । जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस अपनी सेना के साथ भारत भूमि पर पहुंचे तो यहां के कण-कण ने उनके अभिनंदन में कविता पाठ किया । इतने रोमांचकारी क्षणों को देखकर अंग्रेजों की आंखें खुल गई और उन्हें यह आभास हो गया कि भारत वीरों की भूमि है और इस देश में डाली गई वीर परंपरा आज भी जीवित है । जिसका इस समय नेतृत्व सुभाष और उनकी सेना के हाथों में हैं। यही कारण रहा कि अंग्रेजों को भारत को छोड़कर भागना पड़ा । ‘ भारत छोड़ो आंदोलन ‘ चलाने वाले चाहे इस तथ्य के रहस्य को आज तक न समझ पाए हों , परंतु अंग्रेज उसी समय समझ गए थे कि भारत को अब छोड़ देने में ही लाभ है ।

क्योंकि अब भारत की सनातन वीर परंपरा जागृत हो चुकी है।

यह शिवाजी की वीर परंपरा ही थी जिसके थोड़े से पराभव के काल में अंग्रेज भारत की शासन सत्ता को अपने नियंत्रण में लेने में सफल हो गए , परंतु जब वही महारथी भाव की वीर परंपरा उनमें जागृत हुई तो शिवाजी की ही इस परंपरा के समक्ष अंग्रेजों को झुकना पड़ा । यह अलग बात है कि उस समय की भूमिकाएं बदल चुकी थीं , परंतु लड़ाई का मूल मुद्दा तो वही था अर्थात भारत की स्वतंत्रता । इस स्वतंत्रता के अपहर्त्ता भी वही थे अर्थात विदेशी सत्ताधारी लोग । फिर ऐसी कौन सी चीज थी , जिसने इस खोई हुई स्वतंत्रता को प्राप्त कराने में सहायता दी ? इस प्रश्न का उत्तर यही है कि निश्चय ही हमारे महारथी भाव , मराठा भाव या हिंदुत्व की वीर परंपरा ने ही हमको विदेशी सत्ताधारी लोगों से स्वतंत्र कराया ।

भारतीय नाविकों ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया था , जो कि ब्रिटिश शासन पर एक भारी प्रहार के रूप में जाना जाता है । अंग्रेजों के बारे में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह भारत पर जितनी देर भी शासन करते रहे , उतनी देर भारतीय सैनिकों के बल पर ही शासन करते रहे ।उनके साथ अपनी कोई सेना ब्रिटेन से यहां पर नहीं आई थी , इसके विपरीत उन्होंने भारतीय लोगों को अपनी सेना में रखकर ही भारत पर भारतीयों के माध्यम से ही शासन किया था । भारतवासियों की यह भी एक विशेषता होती है कि वह जिस को विश्वास दिला देते हैं , उसके प्रति निष्ठावान बने रहना अपना धर्म समझते हैं । पर जब अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों के समक्ष भी राष्ट्र और धर्म की सुरक्षा और संरक्षा की बात आई तो उन्हें यह समझने में तनिक भी देर नहीं की कि अब इस समय राष्ट्रधर्म को सुरक्षित रखना हमारा सबसे बड़ा धर्म है । फलस्वरूप हमारे हमारे भारतीय सैनिक अंग्रेजों की सेना में रहते हुए भी उनके विरोधी हो गए । इस विरोध और विद्रोह को अंग्रेज सहन नहीं कर पाए थे । हम इस विरोध और विद्रोह के भाव में भी शिवाजीवाद या महारथीवाद या मराठावाद या हिंदुत्व को मूल प्रेरणा मानते हैं ।

जहां तक भारत के जनसाधारण की बात है तो उसका सहयोग और समर्थन प्रारंभ से ही सशस्त्र क्रांति के योद्धाओं के साथ रहा , क्योंकि भारत में प्राचीनकाल से ही दुष्ट ,अत्याचारी शासकों का विरोध करने का विशेषाधिकार जनता को दिया गया था । यही कारण रहा कि तुर्को ,मुगलों और अंग्रेजों के विरुद्ध जनता भी समय-समय पर विद्रोह करती रही । जब राजा ने भी अपने हथियार फेंक दिए या किन्हीं भी कारणों से राजा विद्रोह से पीछे हटने लगे तो जनता ने अपनी सेना बना कर भी विद्रोह किए । ऐसे उत्कृष्ट उदाहरण भी हमारे इतिहास में हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि जनता ने भी विदेशी शासकों का विरोध करने में सक्रिय भूमिका निभाई । ऐसे में हमारे देश के लोग अंग्रेजों के विरुद्ध कैसे मौन रह सकते थे ?

यदि काकोरी काण्ड के अभियुक्त तथा भगतसिंह और उसके साथियों ने जनता का प्रेम व सहानुभूति अर्जित की तो इसके पीछे भी कारण यही था कि जनता भी अत्याचारी विदेशी शासकों का विरोध करना अपना धर्म मानती थी । भगतसिंह ने अपना बलिदान क्रांति के उद्देश्य के प्रचार के लिए ही किया था। महात्मा गांधी के प्रति भी देश की जनता इसलिए ही आकर्षित हुई थी कि वह भी चाहे अपने शांतिपूर्ण उपायों के माध्यम से ही बता रहे थे , परंतु विदेशी सत्ताधारियों का विरोध करना ही जनता को उनका राष्ट्र धर्म कहकर प्रचारित कर रहे थे । बंगाल की सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी श्रीमती कमला दास गुप्ता ने कहा कि क्रांतिकारी की निधि थी ‘कम व्यक्ति अधिकतम बलिदान’, महात्मा गांधी की निधि थी ‘अधिकतम व्यक्ति न्यूनतम बलिदान’। सन् 42 के बाद उन्होंने अधिकतम व्यक्ति तथा अधिकतम बलिदान का मंत्र दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति में क्रांतिकारियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। इस सब की मूल प्रेरणा हमारी बलिदानी भावना रही जो हमारे रक्त में युग – युगों से समाविष्ट थी । मातृभूमि और राष्ट्र के लिए अपने आपको न्यौछावर करना भारत की प्राचीन परंपरा है । इसके पीछे कारण केवल इतिहास में अपना नाम अंकित करा लेना मात्र नहीं है , अपितु इसके पीछे कारण यह है कि यदि राष्ट्र और मातृभूमि सुरक्षित हैं तो सभी देशवासियों के मौलिक अधिकार भी सुरक्षित रहेंगे । उनका धर्म , उनकी संस्कृति और उनकी परंपराएं आदि सभी सुरक्षित रहेंगी । उन सब के लिए बलिदान देना प्रत्येक राष्ट्रवासी का मौलिक धर्म है।

इतिहास लेखकों का यह मंतव्य पूर्णतया सत्य है कि भारतीय क्रांतिकारियों के कार्य सिरफिरे युवकों के अनियोजित कार्य नहीं थे। भारतामाता के पैरों में बंधी श्रृंखला तोड़ने के लिए सतत संघर्ष करने वाले देशभक्तों की एक अखण्ड परम्परा थी। देश की रक्षा के लिए कर्तव्य समझकर उन्होंने शस्त्र उठाए थे। क्रान्तिकारियों का उद्देश्य अंग्रेजों का रक्त बहाना नहीं था। वे तो अपने देश का सम्मान लौटाना चाहते थे। अनेक क्रान्तिकारियों के हृदय में क्रांति की ज्वाला थी, तो दूसरी ओर अध्यात्म का आकर्षण भी। हंसते हुए फाँसी के फंदे का चुम्बन करने वाले व मातृभूमि के लिए सरफरोशी की तमन्ना रखने वाले ये देशभक्त युवक भावुक ही नहीं, विचारवान भी थे। उनकी विचारशीलता में उनकी देशभक्ति बोलती थी , उनका देश के प्रति समर्पण बोलता था, उनका देश के प्रति गौरवबोध बोलता था और उनकी राष्ट्रभक्ति ,धर्मभक्ति व संस्कृति भक्ति बोलती थी । बात स्पष्ट है कि चाहे आज महाराणा प्रताप नहीं थे , शिवाजी नहीं थे ,परंतु उनकी परंपरा तो जीवित थी और वास्तव में परंपरा ही वह मौलिक चेतना होती है जो सांस्कृतिक चेतना का कार्य करती है , राष्ट्र के प्रति प्रचेतना का कार्य करती है और राष्ट्र जागरण का कार्य करती है । शोषणरहित समाजवादी प्रजातंत्र चाहते थे। उन्होंने देश के संविधान की रचना भी की थी। यदि स्वतंत्र भारत के संविधान में समाजवादी व्यवस्था की चर्चा की गई है , और साथ ही साथ पंथनिरपेक्षता के विचार को भी समाविष्ट किया गया है तो इसके पीछे भी भारत की ‘सबका साथ और सबका विकास ‘ करने की वही मौलिक चेतना काम कर रही है जिसके लिए हमारे लोगों ने दीर्घकाल तक स्वतंत्रता संघर्ष लड़ा था और इस देश में सशस्त्र क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया था। जिन शहीदों के प्रयत्नों व त्याग से हमें स्वतंत्रता मिली, उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। अनेकों क्रांतिकारियों को स्वतंत्रता के उपरांत भी अज्ञातवास का अपमानजनक जीवन जीना पड़ा। ये शब्द उन्हीं पर लागू होते हैं:—

” उनकी तुरबत पर एक दिया भी नहीं
जिनके खून से जले थे चिराग ए वतन ।
आज दमकते हैं उनके मकबरे
जो चुराते थे शहीदों का कफन ।। ”

शहीदों का कफन चुराने वाले लोगों को रातों रात देश के इतिहास का नायक बनाकर रख दिया गया और जो लोग इस देश के लिए क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे , उन्हें शून्य बनाकर रख दिया गया । यही वर्तमान इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है। इस विडंबना को मिटाना ही सच्चे इतिहास लेखों का सबसे बड़ा धर्म है । लेखकों के द्वारा जिस दिन अपना यह धर्म समझ लिया जाएगा ,उस दिन भारत वास्तव में जाग जाएगा और उसका अपने अतीत से वास्तव में परिचय भी हो जाएगा । उसी दिन हम समझेंगे कि शिवाजी का महारथीवाद या मराठावाद या हिंदुत्व इस देश की किस प्रकार प्राणशक्ति है , और कैसे यह देश अपनी इसी प्राण शक्ति के माध्यम से ऊर्जा प्राप्त कर आगे बढ़ता है ? यह हमारे लिए बहुत ही प्रसन्नता का विषय है कि छद्म इतिहासकारों के देशघाती षडयंत्रों के उपरांत भी क्रान्तिकारियों पर लिखने के कुछ प्रयत्न हुए हैं। शचीन्द्रनाथ सान्याल, शिव वर्मा, मन्मथनाथ गुप्त व रामकृष्ण खत्री आदि ने पुस्तकें लिखकर हमें अपने स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी आंदोलन के विषय में जानकारी देने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। इन महान लेखकों के अतिरिक्त कुछ अन्य लेखकों ने भी इस संबंध में हमारा बहुत ही प्रशंसनीय मार्गदर्शन किया है ।

मराठा साम्राज्य के समकालीन इतिहास पर यदि हम चिंतन करें तो हमें बहुत कुछ ऐसे गौरवपूर्ण तथ्य उपलब्ध होंगे जिनसे हमें पता चलेगा कि मराठा साम्राज्य के हिंदवी दर्शन से समकालीन समाज के लोग कितने प्रभावित थे और उस दर्शन ने हमारे तत्कालीन समाज के लोगों को कितना आंदोलित करके रख दिया था ? – तभी तो इस देश में उस समय अनेकों आंदोलन हुए । जिन पर आज के निष्पक्ष इतिहासकारों को कलम उठानी ही चाहिए और यह तथ्य स्पष्ट और स्थापित करना चाहिए कि मराठा साम्राज्य के हिंदवी दर्शन ने इस देश को उस समय बहुत कुछ सोचने के लिए विवश किया था। 1757 में हुए प्लासी के युद्ध को अंग्रेजों ने इस देश में अपना राज्य स्थापित करने का एक स्थाई बिंदु माना । तभी तो वह 1857 में उसके शताब्दी समारोह को मनाने की तैयारी कर रहे थे । परंतु हमारे महान क्रांतिकारियों को उस समय उनका इस देश में रहकर अपने राज्य की स्थापना का शताब्दी समारोह मनाना अच्छा नहीं लगा था । जिसका परिणाम यह निकला कि 1857 की क्रांति इस बात के लिए फूट पड़ी कि अंग्रेजों को शताब्दी समारोह मनाने से पूर्व ही यहां से बोरिया बिस्तर बांधने के लिए विवश कर दिया जाए ।

1757 से लेकर 1857 की क्रांति के मध्य के 100 वर्षीय कालखंड में हमारे देश में जिन आंदोलनों ने हमारे देश के लोगों को आंदोलित कर ब्रिटिश सत्ताधारियों के विरुद्ध कार्य करने के लिए प्रेरित किया , उनमें प्रमुख आंदोलनों के नाम इस प्रकार हैं :-

1757 के बाद शुरू हुआ संन्यासी विद्रोह (1763-1800), मिदनापुर विद्रोह (1766-1767), रगंपुर व जोरहट विद्रोह (1769-1799), चिटगाँव का चकमा आदिवासी विद्रोह (1776-1789), पहाड़िया सिरदार विद्रोह (1778), रंगपुर किसान विद्रोह (1783), रेशम कारिगर विद्रोह (1770-1800), वीरभूमि विद्रोह (1788-1789), मिदनापुर आदिवासी विद्रोह (1799), विजयानगरम विद्रोह (1794), केरल में कोट्टायम विद्रोह (1787-1800), त्रावणकोर का बेलूथम्बी विद्रोह (1808-1809), वैल्लोर सिपाही विद्रोह (1806), कारीगरों का विद्रोह (1795-1805), सिलहट विद्रोह (1787-1799), खासी विद्रोह (1788), भिवानी विद्रोह (1789), पलामू विद्रोह (1800-02), बुंदेलखण्ड में मुखियाओं का विद्रोह (1808-12), कटक पुरी विद्रोह (1817-18), खानदेश, धार व मालवा भील विद्रोह (1817-31,1846 व 1852), छोटा नागपुर, पलामू चाईबासा कोल विद्रोह (1820-37), बंगाल आर्मी बैरकपुर में पलाटून विद्रोह (1824), गूजर विद्रोह (1824), भिवानी हिसार व रोहतक विद्रोह (1824-26), काल्पी विद्रोह (1824), वहाबी आंदोलन (1830-61), 24 परगंना में तीतू मीर आंदोलन (1831), मैसूर में किसान विद्रोह (1830-31), विशाखापट्टनम का किसान विद्रोह (1830-33), मुंडा विद्रोह (1834), कोल विद्रोह (1831-32) संबलपुर का गौंड विद्रोह (1833), सूरत का नमक आंदोलन (1844), नागपुर विद्रोह (1848), नगा आंदोलन (1849-78), हजारा में सय्यद का विद्रोह (1853), गुजरात का भील विद्रोह (1809-28), संथाल विद्रोह (1855-56), ।

यह सारे आंदोलन हमें बताते हैं कि शिवाजी और भारत की सनातन क्रांतिकारी विचारधारा किस प्रकार समकालीन भारतीय इतिहास के एक – एक पृष्ठ पर अपना रंग बिखेर चुकी थी ? वास्तव में यह सनातन क्रांतिकारी विचारधारा ही हमारी प्रतिनिधि विचारधारा है जो इस देश के कण कण में समाविष्ट हैं । शिवाजी जैसे वीर क्रांतिकारियों के पुरुषार्थ ,शौर्य और वीरता ने इस देश का नेतृत्व किया । माना कि शिवाजी 1680 में इस असार संसार से चले गए थे ,परंतु उनके यश की सुगंध और देशभक्ति की फैलाई गई चादर ने इस देश के लोगों का दीर्घकाल तक मार्गदर्शन किया। इसी को अमरता कहते हैं । शिवाजी की इसी महानता से पता चलता है कि उनका इस देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने में कितना योगदान है ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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