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पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और असम में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम अब हमारे सामने हैं। पांचो राज्यों के मतदाताओं ने जिस प्रकार अपना जनादेश दिया है, उसे एक परिपक्व जनादेश ही कहा जाएगा। सबसे पहले बाद पश्चिम बंगाल की करते हैं। 1905 में मुस्लिम सांप्रदायिकता के आधार पर बंगाल का विभाजन किया गया था। तब अगले ही वर्ष 30 दिसंबर 1906 को पूर्वी बंगाल में ढाका में मुस्लिम लीग का जन्म हुआ, यानी मुस्लिम नेताओं को बंग भंग की अपनी योजना में सफल होने के उपरांत इस बात का आश्वासन मिला कि भविष्य में वह देश का भी विभाजन करवा सकते हैं।पहले दिन से ही इस संगठन ने देश में मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना अपना लक्ष्य घोषित किया था।

मुस्लिम लीग के मुख्यमंत्री सोहरावर्दी ने 1946 की 16 अगस्त को यहां पर सीधी कार्यवाही दिवस का आयोजन किया था। उस समय गांधी जी ने भी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाते हुए हिंदू विरोध की कांग्रेसी नीति का परिचय दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि देश का विभाजन करने की अपनी कुत्सित योजना में मुस्लिम लीग सफल होने की स्थिति में आती चली गई।

1905 से 2005 भी चला गया। परंतु हिंदुओं के सौभाग्य का सूर्य पश्चिम बंगाल में उदय नहीं हुआ। उस पर कई प्रकार के ग्रहण लगते रहे। 1947 से लेकर 1977 तक अर्थात 30 वर्ष तक यहां पर कांग्रेस का शासन रहा। 30 वर्ष के अपने शासनकाल में कांग्रेस ने अपनी परंपरागत मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को जारी रखा। 1977 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल के बाद जब चुनावों की घोषणा की तो पश्चिम बंगाल से कांग्रेस का बोरिया बिस्तर बांध दिया गया। परंतु इस बार का यह निर्णय भी प्रदेश की जनता के लिए कष्टकर ही रहा। वह कुएं में से निकलकर खाई में जा पड़ी। कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में हम सभी जानते हैं कि यह पूर्णतया हिंदू विरोधी होती है। इसके आतंकी चेहरे ने अपना आतंकी शिकंजा पश्चिम बंगाल की जनता पर कसा और अगले 34 वर्ष तक निरंतर यहां के हिंदू को कम्युनिस्ट आतंकवाद का शिकार बने रहना पड़ा। 2011 में जाकर लोगों ने फिर परिवर्तन के लिए साहस किया और सत्ता ममता बनर्जी को दे दी। परंतु फिर यही हुआ कि यहां की जनता को अपने निर्णय पर कुछ समय बाद ही पछताना पड़ गया। क्योंकि ममता बनर्जी ने हिंदू विरोध की सारी सीमाओं को लांघते हुए कांग्रेस और कम्युनिस्टों के समय के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिये। देश के संसदीय लोकतंत्र में पहली बार ऐसा देखा गया कि यहां पर हिंदू समुदाय के लोगों को केवल इस बात पर मारा ,पीटा और काटा गया कि उन्होंने एक भगवा पार्टी को वोट क्यों दिया ? बांग्लादेश से लोग आकर अवैध रूप से बड़ी संख्या में यहां आकर बस गए।

इस प्रकार के कुशासन से बचने के लिए पश्चिम बंगाल की जनता निरंतर मौन साधना करती रही। अब जाकर उसकी साधना सफल हुई है। जब उसने एक भगवा पार्टी को अपना ‘ भाग्यविधाता’ बनाकर सत्ता उसके हाथों में सौंपी है? जन गण मन का राष्ट्रगान देने वाली बंगाल की भूमि को लगभग सवा सौ वर्ष के संघर्ष के बाद किस प्रकार वह आज पहली बार यह अनुभव कर रही है कि उसे अब खुली हवा में सांस लेने का अवसर मिलेगा और सत्ता वास्तव में उसके भाग्यविधाताओं के हाथों में होगी – उपरोक्त वर्णित इतिहास के तथ्यों को समझकर भली प्रकार यह अनुमान लगाया जा सकता है।

अब बात तमिलनाडु की करते हैं। यहां पर सेक्युलरिस्ट गैंग ने सनातन विरोध को हवा देना आरंभ किया। भारत विरोध की आग लगाई गई। जनता ने सब की धुलाई कर टीवीके में अपना विश्वास व्यक्त किया। नए समीकरण के साथ भाजपा का अपना संतुलन है। यदि बात केरल की करें तो यहां पर कांग्रेस का सांप्रदायिक चेहरा विजय प्राप्त करने में सफल हुआ है। फिर भी जो जनादेश आया है, उसका स्वागत करनाआवश्यक है। अब असम की ओर चलते हैं असम में जिस प्रकार विदेशी घुसपैठियों के विरुद्ध वहां के निवर्तमान मुख्यमंत्री ने साहस दिखाया और सभी देश विरोधी शक्तियों का डटकर सामना किया, उनका वह साहसिक व्यक्तित्व आज जीतकर एक योद्धा के रूप में हमारे समक्ष है। पांडिचेरी में भाजपा अपने समर्थक दालों के साथ सत्ता में शानदार ढंग से वापसी कर रही है। पांचो प्रांतों की जनता ने जिस प्रकार स्पष्ट जनादेश दिया है, वह उसकी परिपक्वता को स्पष्ट करता है।

अब गेंद भाजपा के पाले में है । भाजपा प. बंगाल पर पहली बार अपनी सरकार बनाने जा रही है। उसे न केवल पश्चिम बंगाल की जनता के इस निर्णय को विनम्रता से लेना होगा बल्कि इसके पीछे छुपे सवा सौ वर्ष के दर्द को भी समझना होगा।

लोगों की पांच पीढ़ी इस दर्द को सहन करते हुए गुजर गई हैं।जिन लोगों ने अनेक प्रकार के अत्याचारों को सहन करते हुए अपने धर्म का निर्वाह किया है और धैर्य का परिचय दिया है उनकी उस देशभक्ति और धर्म की शक्ति को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करने का समय है। पश्चिम बंगाल के लोगों को नहीं लगा कि देश कभी आजाद हुआ था ? क्योंकि अंग्रेजों से पहले जो भी अत्याचार वहां पर जारी थे , वह आजादी के बाद भी जारी रहे और आज तक जारी हैं। अब नया सवेरा और नया सूर्य उगने की उम्मीद के साथ उन्होंने भाजपा को वोट किया है। ऐसे में भाजपा का विशेष कर्तव्य है कि वह लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए नये सवेरे और नए सूर्य को उगाकर दिखाने के लिए विशेष परिश्रम करे।

अभी बहुत काम करना है और जनता ने भी इसी उम्मीद के साथ भाजपा को वोट दिया है। घुसपैठियों की दुर्गंधपूर्ण वायु को बाहर निकालना और पश्चिम बंगाल, असम सहित पूर्वोत्तर भारत के प्रांतों को प्रदूषण मुक्त करना भाजपा की प्राथमिकता पर होना चाहिए। यहां के लोगों ने हिंदुओं के धर्मांतरण से दुखी होकर भी भाजपा को प्राथमिकता दी है। इसके अतिरिक्त समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून लागू करने की अपेक्षा भी इन सभी प्रांतों की जनता भाजपा से ही करती है। भाजपा को स्नातक सनातन के संरक्षक के रूप में लोगों ने चुना है। प्रधानमंत्री श्री मोदी में लोगों ने विशेष व्यक्तित्व के दर्शन किए हैं। इन सबकी दृष्टिगत ही भाजपा के नेतृत्व को इन प्रति के संबंध में निर्णय लेने होंगे। लोगों की अपेक्षा है कि कांग्रेस नाम की दुर्गंध पूर्ण विचारधारा को पूर्णतया विदा कर दिया जाए। सेक्युलरिस्ट विचारधारा को छोड़कर भारत भक्ति भरी सनातन की सर्वमंगलकारी विचारधारा को राजनीति का धर्म घोषित किया जाए। धर्मविहीन अर्थात धर्मनिरपेक्ष राजनीति को देश के लिए अभिशाप माना जाए। इन पांचो राज्यों के चुनाव परिणाम निश्चित रूप से यही संकेत दे रहे हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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