विद्या प्रचारिणी सभा मारवाड़, आर्य समाज और विजय सिंह पथिक जी

vijay-singh-pathik-2

लेखक – आर्य सागर

आज राजस्थान केसरी, क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक जी की जन्म जयंती है। पथिक जी का नश्वर शरीर आज हमारे बीच नहीं नहीं है लेकिन उनके विचार यश काया सदैव जीवित रहेगी।

विजय सिंह पथिक जी ने मेवाड़ की निरक्षर दिन हीन भील किसान आदि जनता की विद्या जागरूकता के लिए ‘विद्या प्रचारिणी सभा’ स्थापित की थी। उस सभा के वार्षिक अधिवेशन में पथिक जी ने 1923 में आर्य समाज के अंतरराष्ट्रीय संन्यासी जिन्होंने स्वामी श्रद्धानंद के निर्देश पर अमेरिका जर्मनी आदि में जाकर शेष अध्ययन कर वैदिक सिद्धांतों का प्रचार किया फिर भारत में स्वाधीनता संग्राम हिंदी भाषा के प्रचार के लिए कार्य किया स्वामी सत्यदेव परिव्राजक, पंजाब केसरी महान क्रातिकारी लेखक पत्रकार लाला लाजपत राय जो आर्य समाज को अपनी धर्म माता महर्षि दयानंद को अपना धर्म पिता कहते थे लाला लाजपत राय को मेवाड़ में विद्या प्रचारिणी सभा के वार्षिक अधिवेशन में बुलवाया था इन दोनों महान पुरुषों की व्याख्यान आयोजित कराए थे।अब इस रहस्य से पर्दा उठ रहा है की विजय सिंह पथिक भी आर्य समाज के बलिदानीयो की बगिया के एक फूल थे।

जिसने महर्षि दयानंद की वसीयत के इस बिंदु को कि– आर्यावर्त के दीन हीन अनाथों की सुशिक्षा उनके पालन में तन मन धन से उद्योग करे और महर्षि दयानंद के इस वाक्य की — “अन्यायकारी बलवान से भी ना डरे , न्यायकारी धर्मात्मा से भी सदा डरता रहे” को शिरोधार्य मानकर आर्य वीर विजय सिंह पथिक ने राजस्थान के निरंकुश सामंतवादी शक्तियों जागीरदारों राजाओं से पथिक जी किंचित भी भयभीत न हुए। प्रजा के हित में आंदोलन किया। अनेक वर्ष कारागारों में यात्ना भोगी जंगलों की खाक छानी।

एक महिला जो बाल विधवा हो गई थी उससे पथिक जी ने अंतर्जातीय विवाह किया। बाल विधवाओं के विवाह का दायित्व आर्य समाज ने अपने हाथों में लिया था। आर्य समाज के सुधार के कार्य में उतरने से पूर्व बाल विधवाएं काशी मथुरा में तिल तिल कर मरती थी तो कहीं-कहीं उनके चरित्र को दूषित कर दिया जाता था। पथिक जी के निधन के उपरांत उनकी धर्मपत्नी माता जानकी ने एक श्रद्धांजलि लेख लिखा था उनके स्मृति ग्रन्थ के लिए पथिक जी के व्यक्तित्व के विषय में ।जो इस बात को पुष्ट करता है कि विजय सिंह पथिक महर्षि दयानंद के आदर्श मानस पुत्र थे । आर्य समाज की विचारधारा में रचे बसे थे।

श्रद्धांजलि लेख को यथा अवसर आपके साथ साझा किया जायेगा।

यह भली भांति सिद्ध है वीर क्रांतिकारी विजय सिंह पथिक जी को भी वैचारिक प्रेरणा उत्साह नवजागरण के पुरोधा महर्षि दयानंद के चिंतन उनकी शिक्षाओं से ही मिली। पथिक जी जेल में जिन भजनों को गुनगुनाते थे उन भजनों में भी आर्य समाज की चिंतन की छाप रहती थी।

राजस्थान के साहित्यकार पत्रकार श्री विजय सिंह पथिक स्मृति ग्रंथ के संपादक डॉ विष्णु पंकज ने उनके विषय में ठीक ही लिखा था-

आर्य भूमि के आर्य पुत्र तुम, अमर केसरी राजस्थान|
कैसे मैं कर दूं शब्दों में वीर तुम्हारा गौरव -गान।।

परतंत्रता की कुटिल बेड़िया, बन करके विषधर विकराल ।
पड़ी हुई थी आर्य -भूमि के पद कमलों में हा ! उस काल।।

पथिक जी को उनकी जन्म जयंती पर शत-शत नमन!

लेखक – आर्य सागर
तिलपता, ग्रेटर नोएडा

Comment:

meritking giriş
betpark güncel giriş
betgaranti güncel giriş
kolaybet güncel giriş
betnano giriş
betpark
betpark
betpark
betpark
betpark
betpark
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
betpark
betpark
supertotobet
supertotobet
betpark
betpark
supertotobet
bettilt giriş
supertotobet
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vaycasino
vaycasino
hititbet giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
supertotobet
supertotobet
vaycasino
vaycasino
bettilt giriş
bettilt giriş