भारतवर्ष के स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद विजय सिंह पथिक का रहा है महत्वपूर्ण योगदान

विजय सिंह पथिक vijay singh pathik

27 फरवरी जयंती के विशेष अवसर पर विशेष आलेख

वस्तुत: 21 फरवरी 1915 को भारत वर्ष की स्वतंत्रता की घोषणा स्वतंत्रता आंदोलन में प्रमुख एवं अग्रणी भूमिका निभाने वाले श्री विजय सिंह पथिक और उनके साथियों ने कर दी थी । भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिन देदीप्यमान सितारों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति दी तथा भारत मां को विदेशी आक्रांताओं के जुल्मो-सितम, यातनाओं एवं पीड़ाओं से छुड़वाया ,जिन वीर सपूतों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया , ऐसे वीर शहीदों को इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया जिसके कि वह वास्तविक अधिकारी थे।

यह सब अक्षम्य पाप, दुष्कृत्य उद्देश्य पूर्ण,जानपूछकर तत्कालीन सरकार के कर्ण धारों और देश के उन नेताओं ने किया था जो यह समझते थे कि औरों को स्वतंत्रता का श्रेय प्रदान करने से उनके अभिमान की पूर्ति नहीं होगी, उन्होंने ऐसा इसलिए कराया था।
ऐसा नहीं है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जिन लोगों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था उनको तत्कालीन चाटुकार लेखक और भांड जानते नहीं थे।
भारतवर्ष की स्वतंत्रता का इतिहास ऐसे चाटुकार तथा भांडों द्वारा लिखा गया है, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता की कहानी को गांधी और नेहरू तक सीमित कर दिया है। परंतु मेरा कदापि तात्पर्य नहीं है कि गांधी और नेहरू का अपमान करना। लेकिन सारा श्रेय गांधी और नेहरू को देना यह हमारा बताने का उद्देश्य है। गांधी और नेहरू की भूमिका अन्य शहीदों के योगदान के आगे सीमित हो जाती है ।लेकिन इन दोनों की भूमिका को बड़ा करके लिखने का, अतिशयोंक्ति अतिरंजित करके बताने का राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत करने का कुत्सित प्रयास द्वेष भावना से किया गया।

विचार करिए कि कितना आश्चर्यजनक झूठ है कि गांधी के चरखे से भारत वर्ष को आजादी प्राप्त हो गई थी और नेहरू के शांति दूत बन जाने से हमें कोई क्षति नहीं हुई।
वास्तव में इतिहास के तत्कालीन चाटुकार लेखनी उन लोगों की तवायफ हो चुकी थी। इसलिए सत्य को स्वीकार कराने के लिए अब कुछ वर्तमान इतिहासकारों ने अपनी लेखनी को उचित दिशा में उठाया है।

कौन नहीं जानता कि तैमूर लंग को युद्ध के मैदान में लंगड़ा कर देने वाली वीरांगना कौन थी ? लेकिन उस रामप्यारी गुर्जरी को इतिहास में जगह नहीं मिली।
कौन नहीं जानता कि महाराणा प्रताप महान थे अकबर महान नहीं था लेकिन इतिहास में महाराणा प्रताप को महान नहीं पढ़ाया जाता।
कौन नहीं जानता कि सिकंदर महान नहीं था और उसकी पराजय हुई थी लेकिन पढ़ाया तो यही जाता है वह विश्व विजेता था।
कौन नहीं जानता कि विदेशी आक्रांताओं को हमारे तत्कालीन राजाओं ने वीरता एवं शौर्य तथा साहस का परिचय देते हुए कैद में रखा।
कौन नहीं जानता कि राजा भोज परमार धारा नगरी के राजा ने राजा सुहेलदेव के साथ मिलकर के महमूद गजनवी के भांजे सालार मसूद की सेना को गाजर मूली की तरह काट करके भारत मां के अपमान का बदला सन 1026 में बहराइच के पास लिया था, परंतु उस सम्राट भोज परमार परम योद्धा को इतिहास में जगह नहीं मिली।
कौन नहीं जानता कि सोमनाथ के मंदिर का पुनरुद्धार नेहरू के विरोध के बावजूद सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया था और भारत मां के अपमान का बदला लिया था।
कौन नहीं जानता कि कश्मीर की समस्या वर्ष 1943 में तत्कालीन राजा हरि सिंह के विरुद्ध शेख अब्दुल्ला को भड़का कर के नेहरू ने पैदा की थी ।
कौन नहीं जानता है कि नेहरू और गांधी इस भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार हैं।
कौन नहीं जानता कि नेहरू लेखक अरविंद घोष के अनुसार स्वयं एक मुस्लिम पूर्वजों की संतान था लेकिन इतिहास में सत्य को दबाया गया है।

आज ऐसे ही विचारों से ओतप्रोत होकर मैं आपके सामने इतिहास की गर्द को झाड़ता हुआ भारत मां के सच्चे सपूत श्री विजय सिंह पथिक की जयंती के अवसर पर वास्तविक इतिहास से अवगत कराने का प्रयास कर रहा हूं ।हो सकता है मेरा यह न्यून प्रयास आपको अच्छा एवं प्रेरणास्पद लगे ।
अब हम विजय सिंह पथिक जी के विषय में बात करते हैं। जिन्होंने देश की आजादी के लिए नेहरू गांधी से बहुत पहले ऐसा कार्य कर दिखाया था जिसकी नेहरू गांधी से कल्पना तक नहीं की जा सकती।

होने लगी नई क्रान्ति की तैयारी

उस समय देश में एक साथ भारी क्रान्ति करके अंग्रेजों को मारकाट कर देश से बाहर भगा देने की बड़ी योजना पर कार्य किया जा रहा था। सारे क्रान्तिकारी उसी प्रकार गोपनीय ढंग से एक दूसरे से जुड़ रहे थे-जिस प्रकार 1857 की क्रान्ति के समय उस समय के क्रान्तिकारी नेता परस्पर जुड़े थे। इस बड़ी योजना को इस बार एक साथ एक झटके में मूर्तरूप दे देना था। क्रान्ति की तिथि (जैसा कि पूर्व में भी उल्लेख किया गया है) 21 फरवरी 1915 निर्धारित की गयी थी। योजना के अनुसार भूपसिंह बदला हुआ नाम विजय सिंह पथिक को राजस्थान में खरवा नरेश तथा देशभक्त व्यवसायी दामोदर दास राठी की सहायता से अजमेर, ब्यावर व नसीराबाद पर अधिकार कर लेने का दायित्व सौंपा गया था। इसके लिए वीर योद्घा भूपसिंह ने अपनी पूर्ण तैयारी कर ली थी। उसने कई हजार क्रान्तिकारी युवकों की सेना तैयार कर ली थी जो खरवा स्टेशन से कुछ दूर जंगल में किसी भी संकेत और संदेश की प्रतीक्षा में तैयार बैठे थे। उन्हें यह बता दिया गया था कि इस बार ना तो किसी को ‘धनसिंह कोतवाल’ जैसी अंधी या ‘मंगल पाण्डे’ जैसी शीघ्रता का प्रदर्शन करना है और ना ही किसी प्रकार के प्रमाद प्रदर्शन को अपनाना है। इसलिए ये क्रान्तिकारी दूर जंगल में ही रहकर उचित समय की प्रतीक्षा करते रहे।
उन वीर क्रान्तिकारियों पर महाकवि सुब्रहमण्य भारती की ये पंक्तियां अपना पूर्ण प्रभाव दिखा रही थीं-

”सुखप्रद गृह त्यागकर
यन्त्रणायुक्त कारा में रहना पड़े।
पदवी, लक्ष्मी से वंचित होकर
निन्दा का पात्र बनना पड़े,
कोटि कठिनाइयां मेरा
विनाश करने को हों प्रस्तुत,
तब भी हे स्वतन्त्रता देवी!
तुम्हारी वन्दना भुला नहीं सकता।”

जब ये सैनिक अपना प्रशिक्षण लेते और उन्हें अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का भान होता, तो उसमें भी महाकवि सुब्रहमण्य भारती की ये पंक्तियां ही इनका मार्गदर्शन करती थीं-

”एक मां की कोख से ही जन्मे हम,
अरे विदेशियो! हम अभिन्न हैं।
मन मुटाव से क्या होता है,
हम भाई-भाई ही रहेंगे,
हम वन्देमातरम् कहेंगे।
हजारों जातियों का यह देश
सम्बल न मांगेगा तुमसे…
अरे विदेशियो! हम अभिन्न हैं।”

21 फरवरी 1915 को देश कराना था आजाद

21 फरवरी 1915 को इन क्रान्तिकारियों ने मां भारती को वह अनुपम और अमूल्य भेंटें देने का दिन निश्चित किया था-जिसके लिए उनके पूर्वज सदियों से संघर्ष करते आ रहे थे। परन्तु दुर्भाग्यवश 19 फरवरी को ही क्रान्ति की भनक अंग्रेजों को लग गयी, जिससे पंजाब में क्रान्तिकारियों की धरपकड़ आरम्भ हो गयी। क्रान्तिकारियों की योजना थी कि अजमेर से अहमदाबाद जाने वाली यात्री गाड़ी में रास बिहारी बोस का भेजा हुआ व्यक्ति रात्रि 10 बजे बम धमाका करेगा। इसे अपने लिए संकेत मानकर सारे क्रान्तिकारी भूपसिंह के नेतृत्व में अजमेर, ब्यावर और नसीराबाद पर आक्रमण कर देंगेे ।
नियत समय पर जब कोई सूचना या संकेत सैनिकों को नहीं मिली तो उन्हें कुछ व्याकुलता हुई। तब उन्हें अगले दिन लाहौर से आये एक संदेशवाहक ने लाहौर में घटी घटनाओं की सूचना दी। क्रान्तिकारियों की धरपकड़ का समाचार पाकर भूपसिंह का रक्त उबलने लगा। उनके लिए ऐसा समाचार दु:ख-दायक और असहनीय था। उन्होंने तुरन्त तीस हजार बन्दूकों और अन्य शस्त्रों को तथा गोला बारूद को गुप्त स्थानों पर छुपा दिया।
उस समय परिस्थितियों के अनुसार भूपसिंह के लिए यही उचित था-जो उन्होंने कर लिया था, क्योंकि अन्धे होकर ‘क्रान्ति-क्रान्ति’ का शोर मचाकर अंग्रेजों से लडऩा उस समय नीतिसंगत नहीं था। यदि ऐसा किया जाता तो हार निश्चित थी। संघर्ष से पहले यह देखा जाना नीतिसंगत होता है कि शत्रु की तैयारी क्या है? हमारे लोगों के पास शत्रु से निपटने के लिए साधन कैसे हैं ? ऐसी परिस्थितियों में भूपसिंह ने अपनी शक्ति का आकलन कर सभी क्रान्ति सैनिकों को इधर-उधर बिखर जाने का निर्देश दिया।
डा. अम्बा लाल शर्मा ने लिखा है-”मैं पथिक जी की विलक्षण बुद्घि और सामयिक सूझ पर घंटों ही सोचा करता हूं, कि वह व्यक्ति कितना जबरदस्त दिमाग वाला है ? एक बार पथिक जी से एक अंग्रेज ने कहा कि आप अपने सैक्रेटरी श्री रामनायण चौधरी को हमारा सैक्रेटरी बना दो, तो पथिक जी ने तुरन्त कहा- मैं तो स्वयं चौधरी के लिए एक अच्छे सेक्रेटरी की खोज में हूं।
भारत के इस महान सपूत को भारत रत्न से नवाजा जाना बहुत आवश्यक है। तभी उनका उचित सम्मान होगा।

– देवेंद्र सिंह आर्य

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