निराश फिर भी हूं नहीं, है उत्साहित मेरा जीवन …

क्यों कहते हो मुझे खिसकता रेत मुट्ठी का,
मेरी ‘ मुट्ठी ‘ में है बदलना चाल नियति का।
क्यों कहते जाते हो मुझे मैं खामोश रहता हूं ?
मर्यादा है छिपी इसमें बताऊं हाल हृदय का।।
जो करना था मुझे न कर सका अफसोस मुझको है,
डटे रहना -लगे रहना- मिली यह सोच मुझको है।
जीवन के खिसकते जा रहे पन्ने- ज्ञान मुझको है,
मृत्यु से भी न हारूंगा यह जिद भी तो मुझको है।।
कटता जा रहा जीवन – घटता जा रहा जीवन,
मत कहो कि व्यर्थ में सिमटता जा रहा जीवन।
न कर सका हूं उसे जो करना था मुझे अब तक,
निराश फिर भी हूं नहीं है उत्साहित मेरा जीवन।।
न जला पाएगी अग्नि न पानी भी गला सकता,
रोग है विषय तन का ‘ मैं ‘ रोगी हो नहीं सकता।
हाथ छोड़ें हथियार मेरा उपकरण कमजोर हों,
मैं दिव्य ईश्वर की दिव्यता को खो नहीं सकता।।
न खाली हाथ आया था न खाली हाथ जाऊंगा,
बहुत कुछ लेके आया बहुत कुछ लेके जाऊंगा।
आत्मा पर न पड़ेगी मेरे रोग की छाया कभी,
निरोग ही जन्मा था मैं निरोग ही मर जाऊंगा।।
बुढ़ापा खा रहा है रूप को आत्मा तो वृद्ध है,
रहता सदा वह एक सा -समृद्ध से समृद्ध है।
जो धन दूसरों का लूटता छल छंद रचता है सदा,
कहलाता वही संसार में वास्तव में गिद्ध है।।
- डॉ राकेश कुमार आर्य

लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है
