क्रान्तिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा के पत्र की बानगी

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प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ, डॉ० विवेक आर्य

(30 मार्च को श्याम जी का देहांत हुआ था।)

यह कौन जानता था कि ४ अक्टूबर १८५७ को कच्छ रियासत के माण्डवी ग्राम के भंसाली परिवार में जन्मे श्यामजी कृष्ण वर्मा, १८५७ के संग्राम के बाद के पहले ऐसे क्रान्तिकारी बनेंगे जो बाद की पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्त्रोत तो होंगे ही, साथ ही साथ विदेशों में रहकर वहां अपने संस्कृत पाण्डित्य के ज्ञान को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से प्रस्फुटित कर वहां की जनता में अपना प्रभाव बढ़ाते हुए भारत में कार्यरत क्रान्तिकारियों के लिए उच्च कोटि के आदर्श सिद्ध होंगे। सन् १८७५ की १० अप्रैल को उनकी भेंट समाज सुधारक व वेदों आदि के ज्ञाता स्वामी दयानन्द सरस्वती से हुई। जिनसे मिलकर वे बहुत प्रभावित हुये व उनसे काफी प्रेरणा मिली। श्यामजी अपने विचारों व कार्यकलापों को यूरोप व विशेषकर भारत के अधिक से अधिक क्रान्तिकारियों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने जनवरी सन् १९०५ में ‘इण्डियन सोशियोलॉजिस्ट’ नामक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया। जिसकी प्रतियां किसी भी प्रकार भारत भी भेजी जाती थी तथा उन्हें बड़े ही चाव से पढ़ाया जाता था। इस पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर लिखा रहता था कि यह “स्वतन्त्र और राजनैतिक सामाजिक व धार्मिक सुधार का मुख पत्र है”। इस पत्र की व्यापक रूप से धूम मची तथा प्रशंसा हुई। इस पत्र में किस प्रकार की सामग्री प्रकाशित की जाती थी इसकी कुछ बानगी यहां प्रस्तुत है-

(क) डॉ० अविनाश भट्टाचार्य लिखते हैं कि हम लोग १९०५ में क्रान्तिकारी बने तो इण्डियन सोशियोलॉजिस्ट की प्रतियां पढ़ने लगे इन निबन्धों में स्पष्ट रूप से निरंकुश शासन के विरुद्ध लिखा था और मार्गदर्शन दिया गया था कि इससे निपटने का एक मात्र उपाय है- “पैसिव रजिस्टैंस यानी निष्क्रिय प्रतिरोध। १९०५ की दिसम्बर वाली प्रति में समानान्तर सरकार की स्थापना के पक्ष में भी तर्क दिया गया था।”

(ख) १८९९ के लगभग दक्षिण अफ्रीका में ट्रान्सवेल लोकतन्त्र के जोहन्सवर्ग के पास एक सोने की खान का पता लगा। तब ब्रिटेन के व्यापारियों ने इसे हड़पने के प्रयास में सहायता के लिए ब्रिटिश सरकार को भी उकसाया। इनके कुटिल प्रयासों को निष्फल करते हुए ट्रान्सवेल के शासक सेनापति कुनर ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई की घोषणा कर दी तथा उनकी जीत होने लगी। तभी नाटाल में रहकर गांधी जी बैरिस्टरी कर रहे थे। वे लोकप्रिय भी थे। उन्होंने एक स्वयंसेवी सेना का गठन किया व अंग्रेजों का युद्ध में साथ दिया। श्यामजी ने अपने पत्र में लिखा कि जिस जाति ने अन्यायपूर्वक भारत पर अधिकार कर रखा है और निर्लज्ज शोषण से भारत को गरीब बना दिया है, ऐसे राष्ट्र की सहायता कर गांधी जी ने जो काम शुरू किया है वह बिल्कुल नाजायज, औचित्यहीन व न्याई विरुद्ध है।
इस प्रकार वे उग्र विचारों की ओर जाने लगे। अमेरिका के आयरिस्ट प्रजातन्त्रीय मुख पत्र ‘गेलिक अमेरिकन’ ने लिखा कि नाटाल के भारतीयों का आचरण इतना निन्दनीय है कि उसका भाषा में वर्णन सम्भव नहीं।

(ग) उन्हीं दिनों कांग्रेस में १९०५ वाले अधिवेशन की अध्यक्षता कौन करे, इस पर वाद-विवाद चल रहा था। प्रश्न था ‘गोखले तथा बालगंगाधर तिलक’ के बीच। अपने पत्र में गोखले व तिलक की तुलना करते हुए श्याम जी ने लिखा कि एक ओर तो गोखले ने १८९७ में ताउन के बहाने भारतीयों पर अत्याचार के बारे में लिखा पर बाद में माफी मांगकर अंग्रेजों के कृपापात्र बन गए, पर तिलक माफी न मांगने के कारण जेल चले गए। गोखले पर कालान्तर में सरकारी कृपा होती रही पर तिलक अपने उग्र विचारों के कारण या तो आर्थिक कष्ट उठाते रहे या जेल जाते रहे। अन्त में गोखले को अध्यक्ष के लिए चुने जाने पर श्यामजी ने लिखा कि “देखिए किस प्रकार एक पेशेवर राजनीतिज्ञ (गोखले) तरक्की करता है तथा सच्चा देशभक्त (तिलक) मुसीबत में फंसता है।”

(घ) प्रसिद्ध क्रान्तिकारी खुदीरामबोस व प्रफुल्लचाकी ने बिहार के मुजफ्फरपुर में एक कुख्यात न्यायाधीश किंग्स फोर्ड को मारने की चेष्टा की पर धोखे से दूसरे गोरे मारे गये। खुदीरामबोस को १७ वर्ष की उम्र में ही फांसी हो गयी तथा उसे व उन्हीं जैसे कार्य करनेवाले क्रान्तिकारियों को ‘आतंकवादी’ कहा जाने लगा। श्यामजी इससे बहुत उत्तेजित हुये, वे आतंकवाद को भारतीय परिस्थितियों में न्याय संगत ठहराने के सम्बन्ध में कई लेख प्रकाशित किये। लीरायस्कर नामक एक प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार ने “आतंकवाद की मनोवृत्ति के बारे में एक निबन्ध प्रकाशित किया”, उसी को श्यामजी ने अपने पत्र में प्रकाशित किया। उसमें एक रूसी आतंकवादी का हवाला था। वह युवक रसायन शास्त्र विशारद था। उस युवक ने अपने बयान में यह कहा था कि मैं क्यों आतंकवादी हूं, क्यों आतंकवाद को उचित मानता हूं, यह आपके लिए समझ पाना कठिन है। आपके देश में आतंकवाद के लिए कोई उचित कारण नहीं है पर हमारे देश जारशाही रूस में यही एक मात्र सही तरीका है। कितने सालों व पुश्तों से हम सरकार से कुछ स्वतन्त्रता की मांग कर रहे हैं पर हमें कुछ भी नहीं मिला। हम राजनैतिक रूप से बहुत कष्ट भोग रहे हैं। आप जानते हैं कि खुलकर क्रान्तिकारी कार्य करना असम्भव है। कैसे गुप्तचर पहरा देते हैं, किस तरह से हमारे नेताओं को फांसी पर चढ़ाया जाता है, कैसे घर-घर अस्त्र-शस्त्र के लिए तलाशी ली जाती है इसलिए सरकार ने स्वयं ही ऐसी परिस्थिति का स्त्रजन किया है कि हम आतंकवाद की ओर बढ़ने को मजबूर हैं…।

(ङ) सन् १९०८ में सितम्बर अन्त में एक लेख इस शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ- डाइनमाइट का नीति शास्त्र व भारत में ब्रिटिश तानाशाही। इसमें श्यामजी ने कहा कि यदि ब्रिटिश शासक व उसके बूढ़े सैनिक भारतीय स्वतन्त्रता व राष्ट्रीय सम्मान को जबर्दस्ती हरण करके करोड़ों लोगों को डेढ़ सौ वर्षों से मृत्यु के द्वार तक पहुंचाते रहे हैं तो क्या देश के लोग नीतिशास्त्र के अनुसार आत्मरक्षा के लिए शत्रु के आक्रमण को रोकने के लिए कोई रास्ता अख्तियार न करें। क्या यह उनका एकमात्र कर्त्तव्य नहीं है।

इसी प्रकार उन्होंने आयरलैण्ड व रूस के क्रान्तिकारियों के उदाहरण दे-देकर बहुत से लेख व वक्तव्य प्रकाशित कर भारतीय क्रान्तिकारियों के लिए मार्गदर्शन व प्रेरणा देने का कार्य किया। इस प्रकार बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्यामजी एक तरफ तो संस्कृत के विद्वान् थे, दूसरे समाज सुधारक थे, तीसरे उनके द्वारा भारत की सभ्यता व संस्कृति का ज्ञान फैल रहा था तथा सर्वोपरि व क्रान्तिकारी विचारों के थे। भारत में १८५७ के बाद के इस प्रथम मनीषी चिन्तक व क्रान्तिकारी का सारा जीवन ही राष्ट्र की सेवा में अर्पित रहा तथा इनके कार्यकलापों से न जाने कितने क्रान्तिकारियों ने प्रेरणा लेकर अपना सर्वस्व मातृभूमि की बलिवेदी पर न्यौछावर कर दिया।

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