ईश्वर से भला क्यों नाराज रहते हैं लोग ?

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    बहुत से लोग ईश्वर से नाराज़ रहते हैं। क्योंकि जैसा वे चाहते हैं, वैसा उनको जीवन में नहीं मिल पाता। वे बहुत कुछ चाहते हैं और भगवान से प्रार्थना भी करते हैं, कि "हे भगवान्! हमको बंगला दिला दो। कार दिला दो। नौकरी दिला दो। बेटा दिला दो। अच्छी धन संपत्ति और सम्मान दिला दो, आदि आदि।"
      उनकी वे सब इच्छाएं और प्रार्थनाएं पूरी हो नहीं पातीं। "क्योंकि उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए जितना पुरुषार्थ करना चाहिए, उतना पुरुषार्थ वे करते नहीं। ऐसे अज्ञानी लोग इतना भी नहीं समझते, कि "सारी इच्छाएं तो कभी भी किसी की भी पूरी नहीं हुई, तो उनकी भी कैसे पूरी हो सकती हैं?"
    ईश्वर की न्याय व्यवस्था को वे लोग समझते नहीं, और समझना चाहते भी नहीं। अज्ञानता एवं पुरुषार्थहीनता के कारण उनकी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती। "कभी 2 / 4 इच्छाएं पूरी हो भी जाती हैं, तो 5 / 7 और नई इच्छाएं पैदा हो जाती हैं। इस प्रकार से जब उनकी सारी इच्छाएं पूरी नहीं होती हो पातीं, तब वे ईश्वर से नाराज़ हो जाते हैं।" तब कितने ही लोग तो नास्तिक भी हो जाते हैं, और कहते हैं, कि "हे भगवान्! तुमने मेरा यह काम नहीं किया, आज के बाद मैं तुम्हें नहीं मानूंगा।" "और इस प्रकार से स्वयं नास्तिक हो कर दूसरों को भी नास्तिक बनाते हैं। उनका यह व्यवहार उचित नहीं है।"
     पहली बात -- "सारी इच्छाएं कभी भी किसी की पूरी नहीं होती।" क्योंकि इच्छा करना तो सरल है, परन्तु उसके अनुसार पुरुषार्थ करना बहुत कठिन है। कोई भी जीवात्मा सर्वशक्तिमान नहीं है, वह सारे काम नहीं कर सकता। इसलिए उसकी सारी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती। और दूसरी बात -- "बाधक कारण भी बहुत सारे हैं, जो उसकी इच्छाओं को पूरा होने नहीं देते।" "इसका दोषी ईश्वर नहीं है, फिर भी वे अज्ञानी लोग ईश्वर को दोषी मानते हैं। इसलिए वास्तविकता को न समझने के कारण वे स्वयं नास्तिक हो कर दूसरों को भी नास्तिक बनाते हैं। यह उनका भारी अपराध है।" इसलिए ठीक प्रकार से सोचना सीखें। "स्वयं नास्तिक न बनें, और नास्तिकता का प्रचार न करें।अन्यथा ईश्वर आपको इस भारी अपराध का भयंकर दंड देगा।"
      ऐसे लोग उन वस्तुओं के संबंध में तो शिकायत करते हैं, जो उन्होंने मांगी थी और उन्हें नहीं मिल पाई। "परंतु उन अमूल्य वस्तुओं पर विचार नहीं करते, जो बिना मांगे और बिना कोई फीस लिए, बिना कोई अपना स्वार्थ सिद्ध किए, ईश्वर ने उन्हें जन्म से ही दे दी।" "जैसे ईश्वर ने उन्हें शरीर दिया। मन बुद्धि इंद्रियां दीं। पंचमहाभूत और यह विशाल सृष्टि बना कर दी। भिन्न भिन्न प्रकार के फल फूल शाक सब्जी जड़ी बूटियां आदि पदार्थ दिए। अच्छे-अच्छे माता पिता भाई बहन और रिश्तेदार दिए। जन्म से ही बहुत सारी सुविधाएं खाना पीना मकान आदि दिए।" ईश्वर की दी हुई इन वस्तुओं पर वे कभी विचार नहीं करते? ये सब वस्तुएं भी तो ईश्वर ने आपको दी हैं। "जितना आप को ईश्वर ने दिया है, इसके बदले में ईश्वर ने आपसे अपना कौन सा स्वार्थ सिद्ध किया? अपने पुरुषार्थ के बदले में ईश्वर ने आपसे कितनी फीस ली? कुछ भी नहीं।" 
  आपको तो ईश्वर का अत्यंत उपकार मानना चाहिए, कि "उसने बिना कोई अपना स्वार्थ सिद्ध किए, आपसे बिना कोई फीस लिए, इतनी सारी वस्तुएं और सुविधाएं आपको दी हैं।" "इस प्रकार से ईश्वर का उपकार मानते हुए आपको अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए आगे और पुरुषार्थ करना चाहिए। जितना आप पुरुषार्थ करेंगे, उतना ही ईश्वर आपको न्यायपूर्वक फल अवश्य देगा।"   
   "अतः इस वास्तविकता को समझें। बुद्धिमत्ता से काम लें। स्वयं आस्तिक बनें, और दूसरों को भी आस्तिक बनाएं। इसी में सुख और जीवन की सफलता है।"

—- “स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक – दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात.”

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