वीर सावरकर के बारे में 25 ऐसी बातें जिनसे आप का सीना भी गर्व से फूल जाएगा

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वीर सावरकर कौन थे जिन्हें आज सभी हिंदू विरोधी और देशनिरपेक्ष कोस रहे हैं और क्यों?
ये २५ बातें पढ़कर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो उठेगा। इसको पढ़े बिना आज़ादी का ज्ञान अधूरा है!
आइए जानते हैं एक ऐसे महान क्रांतिकारी के बारे में जिनका नाम इतिहास के पन्नों से मिटा दिया गया। जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के द्वारा इतनी यातनाएं झेलीं कि उसके बारे में कल्पना करके ही इस देश के करोड़ों भारत माँ के कायर पुत्रों में सिहरन पैदा हो जायेगी।

जिनका नाम लेने मात्र से आज भी हमारे देश के राजनेता भयभीत होते हैं क्योंकि उन्होंने माँ भारती की निस्वार्थ सेवा की थी।वो थे हमारे परमवीर सावरकर।
१. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी देशभक्त थे जिन्होंने १९०१ में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में शोक सभा का विरोध किया और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें?
क्या किसी भारतीय महापुरुष के निधन पर ब्रिटेन में शोक सभा हुई है.?
२. वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि गुलामी का उत्सव मत मनाओ..!
3. विदेशी वस्त्रों की पहली होली पूना में ७अक्तूबर,१९०५ को वीर सावरकर ने जलाई थी…!
४. वीर सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने विदेशी वस्त्रों का दहन किया, तब बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र केसरी में उनको शिवाजी के समान बताकर उनकी प्रशंसा की थी जबकि इस घटना की दक्षिण अफ्रीका के अपने पत्र ‘इन्डियन ओपीनियन’ में गाँधी ने निंदा की थी…!
५. सावरकर द्वारा विदेशी वस्त्र दहन की इस प्रथम घटना के १६ वर्ष बाद गाँधी उनके मार्ग पर चले और ११ जुलाई,१९२१ को मुंबई के परेल में विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया…!
६. सावरकर पहले भारतीय थे जिनको १९०५ में विदेशी वस्त्र दहन के कारण पुणे के फर्म्युसन कॉलेज से निकाल दिया गया और दस रूपये जुरमाना किया,इसके विरोध में हड़ताल हुई,स्वयं तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर के पक्ष में सम्पादकीय लिखा।
७. वीर सावरकर ऐसे पहले बैरिस्टर थे जिन्होंने १९०९ में ब्रिटेन में ग्रेज-इन परीक्षा पास करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफ़ादार होने की शपथ नहीं ली, इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं दिया गया।
८. वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा ग़दर कहे जाने वाले संघर्ष को ‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’ नामक ग्रन्थ लिखकर सिद्ध कर दिया।
९. सावरकर पहले ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे जिनके लिखे ‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक पर ब्रिटिश संसद ने प्रकाशित होने से पहले प्रतिबन्ध लगाया था।

 

 

 

 

 

 

( इन तीनों कक्षों को आप देखें ।बाएं से पहला कक्ष सावरकर जी की कालकोठरी है, जिसमें उन्होंने अपना कारावास काटा था ,  देखने से ही पता चल रहा है कि उन्हें सुविधा के नाम पर जेल में एक चीज भी उपलब्ध नहीं थी। जबकि दूसरी ओर ऊपर की तस्वीर नेहरू की जेल की है तो नीचे वाली गांधीजी की है इन दोनों को कितनी सुविधाएं जेल में भी मिलती थीं? यह देखने वाली बात है। यह फोटो हमें श्याम सुंदर पोद्दार जी द्वारा उपलब्ध कराया गया है)

 

 

१०. ‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’ विदेशों में छापा गया और भारत में भगत सिंह ने इसे छपवाया था जिसकी एक एक प्रति तीन-तीन सौ रूपये में बिकी थी, भारतीय क्रांतिकारियों के लिए यह पवित्र गीता थी, पुलिस छापों में देशभक्तों के घरों में यही पुस्तक मिलती थी।
११. वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय ०८जुलाई, १९१० को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे।
१२. सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला मगर ब्रिटेन और फ्रांस की मिलीभगत के कारण उनको न्याय नहीं मिला और बंदी बनाकर भारत लाया गया।
१३. वीर सावरकर विश्व के पहले क्रांतिकारी और भारत के पहले राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सरकार ने दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई थी।
१४. सावरकर पहले ऐसे देशभक्त थे जो दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले – “चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया। ”
१५. वीर सावरकर पहले राजनैतिक बंदी थे जिन्होंने काला पानी की सज़ा के समय १० साल से भी अधिक समय तक आज़ादी के लिए कोल्हू चलाकर ३० पोंड तेल प्रतिदिन निकाला ।
१६. वीर सावरकर काला पानी में पहले ऐसे कैदी थे जिन्होंने काल कोठरी की दीवारों पर कंकर कोयले से कवितायें लिखीं और ६००० पंक्तियाँ याद रखी।
१७. वीर सावरकर पहले देशभक्त लेखक थे जिनकी लिखी हुई पुस्तकों पर आज़ादी के बाद कई वर्षों तक प्रतिबन्ध लगा रहा…!
१८. वीर सावरकर पहले विद्वान लेखक थे जिन्होंने हिन्दू को परिभाषित करते हुए लिखा कि :
‘आसिन्धु सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारत भूमिका,
पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरितीस्मृतः।
अर्थात् समुद्र से हिमालय तक भारत भूमि जिसकी पितृभूमि है, जिसके पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं व यही पुण्य भूमि है, जिसके तीर्थ भारत भूमि में ही हैं, वही हिन्दू है।
*१९.वीर सावरकर प्रथम राष्ट्रभक्त थे जिन्हें अंग्रेजी सत्ता ने ३० वर्षों तक जेलों में रखा तथा आजादी के बाद १९४८ में नेहरु सरकार ने गाँधी हत्या की आड़ में लाल किले में बंद रखा पर न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद ससम्मान रिहा कर दिया,देशी -विदेशी दोनों सरकारों को उनके राष्ट्रवादी विचारों से डर लगता था।

२०. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जब उनका २६फरवरी,१९६६ को उनका स्वर्गारोहण हुआ तब भारतीय संसद में कुछ सांसदों ने शोक प्रस्ताव रखा तो यह कहकर रोक दिया गया कि वे संसद सदस्य नही थे जबकि चर्चिल की मौत पर शोक मनाया गया था।

२१. वीर सावरकर पहले क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त स्वातंत्र्य वीर थे जिनके मरणोपरांत २६फरवरी,२००३ को उसी संसद में मूर्ति लगी जिसमे कभी उनके निधन पर शोक प्रस्ताव भी रोका गया था।
२२. वीर सावरकर ऐसे पहले राष्ट्रवादी विचारक थे जिनके चित्र को संसद भवन में लगाने से रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा लेकिन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने सुझाव पत्र नकार दिया और वीर सावरकर के चित्र अनावरण राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से किया।

२३. वीर सावरकर पहले ऐसे राष्ट्रभक्त हुए जिनके शिलालेख को अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल के कीर्ति स्तम्भ से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर ने हटवा दिया था और उसकी जगह गांधी का शिलालेख लगवा दिया।

२४. वीर सावरकर ने दस साल आजादी के लिए काला पानी में कोल्हू चलाया था जबकि गाँधी ने काला पानी की उस जेल में कभी दस मिनट चरखा नही चलाया ।

२५. वीर सावरकर माँ भारती के पहले सपूत थे जिन्हें जीते जी और मरने के बाद भी आगे बढ़ने से रोका गया पर आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी विरोधियों के घोर अँधेरे को चीरकर आज वीर सावरकर सभी में लोकप्रिय और हिंदू युवाओं के आदर्श बन रहे है।

वीर सावरकर जी की जयंती(२८ मई,१८८५) पर कोटिशः नमन,वंदन और अभिनंदन।

ओ३म्, वन्दे मातरम् ,भारत जयतु !
जयकारा वीर बजरंगी,हर हर महादेव,
जय सावरकर, जय सुभाष !

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