तिब्ब्त : चीखते अक्षर , भाग – 7

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सांस्कृतिक क्रांति

जैसा कि बताया जा चुका है सांस्कृतिक क्रांति के पहले ही तिब्बती संस्कृति का अधिकांश ध्वस्त किया जा चुका था। यह दौर तिब्बतियों द्वारा झेले गये मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न की चरम गहराई को चिह्नांकित करता है। धर्म का पालन एकदम असम्भव बना दिया गया, व्यक्तिगत सम्बन्ध, केश-सजा, वेश भूषा, व्यक्तिगत आदतें और यहाँ तक कि सोने के तरीके भी कम्युनिस्टों की सावधान निगरानी में रहे (आज भी हैं।) आज भी ऐसे स्त्री पुरुष जो परस्पर विवाहित नहीं है, साथ सोते हुये ‘पकड़’ लिये जायँ तो अक्सर उन्हें सार्वजनिक रूप से जलील किया जाता है और दंडित किया जाता है। अनधिकृत निवासियों पर नियंत्रण रखने और जाँच करने के बहाने घरों में घुस कर नियमित तलाशियाँ ली जाती है। 1959 में ल्हासा के अधिकांश पुरुषों को ल्हासा से दूर श्रमिक शिविरों में भेज दिया गया और प्रतीत होता है कि उनमें से बहुत कम लौट पाये। ल्हासा ‘भयभीत भूखी स्त्रियों’ का शहर हो गया। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान दो जनों के बीच का संक्षिप्त वार्तालाप भी शक के घेरे में आ जाता था अगर उसमें पार्टी नारों का मुलम्मा न हो।


थामज़िंग (संघर्ष) सत्रों के दौरान अनगिनत लोग मर मरा गये। इसमें आश्चर्य नहीं कि भयानक ‘विचार पुलिस’ और ऑर्वेल के उपन्यास ‘1984’ सम प्रतीत होती परिस्थितियों के कारण बहुत से तिब्बती पागल हो गये। एक तिब्बती महिला ने लिखा है कि उसकी बहन को चटक रंगीन थियेटरनुमा कपड़ों जैसा कुछ पहने और स्वयं से बातें करते ल्हासा के चारो ओर आवारा घूमते देखा गया। वह अपनी बहन के बारे में चिंतित थी क्यों कि उसके पाँच बच्चे थे और उसका पति जेल में था। लेकिन वह आने जाने पर कड़े नियंत्रण के कारण उससे मिलने नहीं जा सकती थी।

एक दूसरे ने लिखा है कि उसने तिब्बती बच्चों से भरी हुई कई लॉरियों को ल्हासा से गुजरते देखा जिन्हें उनकी हत्या करने के लिये ले जाया जा रहा था। कद में वे इतने भी नहीं थे कि उन सवारियों के साइड से देख सकें लेकिन वे गोली मारे जाने लायक कद रखते थे। नौ और दस वर्षों की आयु वाले बच्चे समूह में चिड़ियों का शिकार करने और मक्खियों को मारने के लिये भेजे जाते थे और शाम को उन्हें चीनियों के सामने अपने ‘शिकार’ को जमा करना होता था। शिकार में सबसे कम सफल बच्चों को क्रूर दंड दिया जाता और उनके माँ बाप भी ‘प्रतिक्रियावादी संतान’ पैदा करने के लिये दंडित किये जाते थे। चीनियों का यह कहना था कि चिड़ियों को इसलिये मारना था कि वे फसलों को चट कर जाती थीं। हालाँकि, तिब्बती यह बताते हैं कि इस व्यवहार को लागू करने के पीछे इस मंशा की सम्भावना अधिक थी कि पुरानी संस्कृति के मनोबल को तोड़ दिया जाय जो बौद्ध धर्म के गहन प्रभाव के कारण जीवन के हर रूप को बहुत आदर देती थी।

कुंसांग पल्जोर, जिसके माता पिता की चीनियों ने हत्या कर दी थी और जिसे हजारों और युवाओं के साथ कम्युनिस्ट सिद्धांत सीखने के लिये चीन भेज दिया गया था; ने हत्या, बलात्कार, यातना, भूख, पूर्ण दमन और सामाजिक अव्यवस्था के बारे में लिखा है। बहुत से विश्वासी तिब्बती कैडरों की तरह उसने भी जो देखा उससे विरुचित हो गया और भारत भाग गया।

संघर्ष सत्र (थामज़िंग, Thamzing):
कम्युनिस्टों द्वारा जनता को बरगलाने के लिये गढ़े गये तमाम शब्दों में से यह एक शब्द माओ की देन है। कम्युनिस्ट समाज को ‘सर्वहारा’ और ‘बुर्जुआ’ दो प्रमुख वर्गों में बाँट कर रखते हैं। क्रांति के लिये वर्ग संघर्ष अनिवार्य है और सर्वहारा विरोधियों को वर्गशत्रु कहा जाता है।

प्रकट रूप में थामज़िंग ‘लक्ष्य(वर्गशत्रु)’ के हित के लिये आयोजित किया जाता है ताकि उसके मस्तिष्क में प्रतिक्रियावादी और प्रति-क्रांतिकारी (कुछ और शब्द जो हर उस सोच के लिये प्रयुक्त होते हैं जो कम्युनिस्ट सोच और विधि विधान का समर्थन नहीं करती) चिंतन का लेशमात्र भी न रहे।

इसके तहत ‘लक्ष्य’ को हजारो आँखों के सामने भीड़ द्वारा उत्पीड़ित और पीटा जाता है। भाँति भाँति की शारीरिक और मानसिक यातनायें दी जाती हैं जिसके दौरान ‘लक्ष्य’ को भीड़ से मुखातिब रहना होता है।

व्यवहारत: यह जनता के भीतर विभेद उत्पन्न करने की एक विधि है। बच्चों को अपने माँ बाप का त्याग सार्वजनिक रूप से करने को कहा जाता है, सेवकों को स्वामियों का, भिक्षुओं को अपने लामाओं का आदि। बीस, पचास और कभी कभी सैकड़ों की संख्या में लोग ‘लक्ष्य’ को पीड़ित और प्रताड़ित करते हैं जिनमें न मानने पर भावी अत्याचार की आशंका से त्रस्त उनके अपने परिवार वाले भी सम्मिलित रहते हैं।

इन सत्रों में ‘लक्ष्य’ को अपराध स्वीकृति के लिये बाध्य भी किया जाता है ताकि बाद में उसे मृत्युदंड दिया जा सके। अपराध स्वीकृति माओवादी तंत्र में बहुत महत्त्वपूर्ण है क्यों कि उन्हें एक और स्वयंस्वीकृत प्रतिक्रियावादी या प्रतिक्रांतिकारी कम करने का ठोस और दिखाऊ तर्क मिल जाता है।

इन सत्रों के मनोदशा पर कुप्रभाव इस तथ्य से समझे जा सकते हैं कि पंचेन लामा लम्बे उत्पीड़नहीन सार्वजनिक संघर्ष सत्रों और बन्दी रहने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के पुन: सदस्य बन गये। इसके पहले उन्हें दलाई लामा को बलैकमेल करने और दलाई लामा के विरुद्ध सरकार समर्थित समांतर तिब्बती परम्परा की स्थापना के लिये चीनी मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया था। कालांतर में उन्हों ने अपना वह प्रसिद्ध चीन विरोधी भाषण दिया जिसके एक सप्ताह के भीतर ही उनकी रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो गई।
(अगले भाग में जनसंख्या विस्थापन और असंतुलन)

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