खिसकती जा रही है ममता बनर्जी के हाथ से बंगाल की सत्ता?

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विष्णुगुप्त

क्रांति काल और शांति काल की राजनीति में अंतर होता है। क्रांति काल की राजनीति की सीमाएं अराजक भी होती हैं, उफान वाली भी होती हैं, हिंयक भी होती हैं, सारी मान्यताओं और परमपराओं को तोड़ने वाली होती है जबकि शांति काल की राजनीति न तो अराजक होती है और न ही मान्यताओं और परमपराओं को लांघने या फिर विध्वंस करने की उम्मीद बनती है, शांति काल की राजनीति को कानून और संविधान के दायरे में कसने की जरूरत होती है, जनकांक्षाओं की कसौटी पर उतरने की अपेक्षाएं होती हैं। भारतीय राजनीति में ये सीमाएं बार-बार देखी जाती है। ममता बनर्जी की राजनीति की भी दो सीमाएं रही हैं, एक क्रांति काल की सीमाएं और दूसरी शंातिकाल की सीमाएं। शांति काल का अर्थ जब वह सत्ता में विराजमान हुई तब की राजनीति की उनकी क्रियाएं।
ममता बनर्जी की राजनीति का प्रथम भाग यानी क्रांति काल बेहद ही उफान वाली, बवंडर वाली, जनाक्रोश वाली, सभी मान्यताओं और परमपराओं को तोड़ने वाली रही है, अपनी राजनीतिक बवंडर से ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की उस राजनीतिक सत्ता को न केवल वुनौती दी थी बल्कि उस राजनीतिक सत्ता को उखाड़ भी फेंकी थी जो राजनीतिक सत्ता 30 सालों तक अपराजेय थी और जिस सत्ता को इन्दिरा गांधी-राजीव गांधी भी विध्वंस करने की उपलब्धि दिखाने में असफल साबित हो गये थे। वामपंथी सरकार बेहद ही तानाशाही और गंुडई की प्रतीक थी, जिनकी सत्ता में राजनीतिक परिवर्तनवादियों को बलपूर्वक और साजिशन निपटा दिया जाता था, बडे आंदोलन खड़ा करने का सपना पूरा नहीं होता था। पर वामपंथियों का एकाएक पूंजी प्रेम आत्मघाती हुआ, टाटा और विदेशी कपंनियों को आमंत्रित करना उनके अस्तित्व के लिए काल बन गया। सिंदुर और नंदीग्राम आंदोलन की कोख से ममता बनर्जी की सत्ता का जन्म हुआ जो पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक घटना बन गयी। कहने का अर्थ यह है कि कंांतिकाल की राजनीति में ममता बनर्जी सौ प्रतिशत सफल राजनीतिज्ञ साबित हुई थी।
पर क्या शांति काल की राजनीति यानी सत्ता की राजनीति मे भी ममता बनर्जी सफल हुई हैं? क्या ममता बनर्जी क्रांति काल की तरह ही शांति काल में भी अपनी सरकार को जनांकाक्षी बनाने में सफल हुई हैं? क्या ममता बनर्जी अपनी सरकार में दूरदर्शिता कायम करने में सफल हुई? क्या ममता बनर्जी अपनी सरकार में पश्चिम बंगाल में विकास की योजनाओं का लागू करने में दक्ष साबित हुई है? क्या ममता बनर्जी अपनी सरकार में पश्चिम बंगाल में हत्याओं की राजनीति पर रोक लगाने में सफल हुई है? क्या ममता बनर्जी अपनी सरकार में केन्द्र की सरकार के साथ दुश्मनी पालने की दोषी हैं? क्या ममता बनर्जी अपनी सरकार में पश्चिम बंगाल में औद्योगिक क्रांति को सफल बनाने में कामयाब हुई हैं? क्या ममता बनर्जी अपनी सरकार में पश्चिम बंगाल में आम जनता के पलायन को रोकने और देशज रोजगार को सजृत करने में कामयाबी हासिल की है? क्या ममता बनर्जी बाग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को रोकने और आबादी आक्रमण के खिलाफ वीरता दिखाने के लिए राजधर्म का पालन किया? ये सभी प्रश्न अति महत्वपूर्ण हैं और इन्ही प्रश्नों की पडताल कर ममता बनर्जी की सत्ता का मूल्यांकन किया जा सकता है।
बडी शख्सियत, बडे योजनाकार, बडे राजनीतिज्ञ कभी भी लिक के फकीर नहीं होते हैं, इतिहास वही गढते हैं, प्रेरणा वही बनते हैं, आईकॉल वही बने हैं जो कभी भी लिक के फकीर नहीं बनते हैं, जो किसी की फोटो कॉपी बनने से इनकार कर देते हैं और नया लकीर खींच देते हैं, नया करने की उपलब्धि सुनिश्चित करते हैं। इस कसौटी पर ममता बनर्जी का जब मूल्यांकन होता है तब बहुत ही निराशा होती है, हताशा होती है कि एक क्रांति काल का सफल और प्रेरणा दायी राजनीतिज्ञ कैसे और क्यों लिक का फकीर बन गया, असफल साबित हो गया, पिछली वामपंथी सत्ता की फोटो स्टेट कॉपी बन गयी। निश्चित तौर पर ममता बनर्जी अपनी प्रतिद्वंद्वी वामपंथी पार्टियों की शासन व्यवस्था, वामपंथी पार्टियों की राजनीतिक शैली, वामपंथी पार्टियों की तानाशाही प्रेम के समुद्र में डूब गयी। वामपंथी सरकार की शैली और एजेंडा गुंडागर्दी की थी, हत्या की राजनीति की थी, औद्योगिक विध्वंस की थी, आधुनिक रोजगार की व्यवस्था के विरोधी की थी, राज्य में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को संरक्षण देकर अपना वोट बैंक तैयार रखने और अपनी सत्ता को जीवंत रखने की थी। यही कारण था कि पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार के खिलाफ कोई एक नहीं बल्कि तीस सालों तक कोई विकल्प तैयार नहीं हुआ था। आम जनता भी विकल्प के अभाव में वामपंथी सरकार को बार बार जीवन दान देती रही थी।
वामपंथियों के हथकंडे ममता बनर्जी क्यों अपनायी? वामपंथी तो जन्मजात हिंसक, हत्यारा, अमानवीय, तानाशाही और लोकतंत्र खोर होते हैं, ये सब उनकी पार्टी का अपरिवर्तनशील सिद्धांत है जिसका स्पष्ट उदाहरण चीन से लेकर सोवियत संघ के अलावा भी जहां-जहां कम्युनिस्टों की सरकार रही है वहां वहां देखने को मिलता है। जब ममता बनर्जी आंदोलन रत थी तब पश्चिम बंगाल में उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं की बडी संख्या में हत्या होती थी, ममता बनर्जी खुद कई बार कम्युनिस्टों के हमले में घायल हो चुकी थी, घायल अवस्था में चैयर पर बैठ कर ममता बनर्जी राज्यपाल और संसद तक प्रदर्शन की थी। उस समय कम्युनिस्टों की इस हिंसा से देश भर में चिंता व्याप्त हुई थी। अब यही हथकंडा ममता बनर्जी ने अपना लिया है। ममता बनर्जी के शासनकाल में पश्चिम बंगाल में हजारों ऐसी हत्याएं हुई हैं जो राजनीतिक प्रतिशोध का दुष्परिणाम रही है। त्रीनमूल कांग्रेस पर यह आरोप लगाया जा रहा है उनकी गुंडागर्दी की राजनीति तो कम्युनिस्टो की सत्ता के समय की गुंडागर्दी की राजनीति को मात दे दिया है। यह सिर्फ आरोप नहीं है बल्कि इसमें सच्चाई है। पश्चिम बंगाल में हिंसा की राजनीति सच है। हिंसा की राजनीति का अस्तित्व शहर से लेकर गांव-गांव तक उपस्थित है। वामपंथी पार्टियां भी कहती हैं कि ममता बनर्जी के राज में उनके सैकड़ों कार्यकर्ताओं को मौत का घाट उतार दिया गया। पुलिस और प्रशासन राजनीतिक हत्याओं के खिलाफ कोई कारवाई करती नहीं है खासकर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता निशाने पर ज्यादा है। भाजपा की राज्य इंकाई बार-बार ऐसे अपने कार्यकताओं की सूची जारी की है जिनकी हत्याएं टीएमसी कार्यकर्ताओं और गुंडो द्वारा हुई है। टीएमसी गुंडों में रोहिंग्या और बंग्लादेशी घुसपैठियों का भरमार है। रोंिहग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिये भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या इसलिए करते हैं कि वे अवैध घुसपैठ कर विरोध करते हैं।
अवैध घुसपैठ से अराजकता बढती है, हिंसा बढती है, भूमि की कसौटी पर टकराव बढता है, बेरोजगारी बढती है, कानून – व्यवस्था की समस्या खडी होती है। इस सिद्धांत की अवहेलना वामपंथियों ने की थी और अब इस सिद्धांत की अवहेलना ममता बनर्जी ने भी की है। इसलिए आज पूरा पश्चिम बंगाल अवैध घुसपैठियों के कब्जे में कैद हो गया है। संरक्षण के कारण अवैध घुसपैठिये टीएमसी के कार्यकर्ता बन गये है। टीमएसी में शामिल होकर अवैध घुसपैठिये राजनीतिज्ञ भी बन गये है।
जब हिंसा चरम पर होगी, राजनीति पूरी तरह से हिंसक होगी, अवैध घुसपैठियों की पौबारह होगी तब औद्योगिक घंधों के विकास और रोजगार के सृजन की उम्मीद दफन हो जाती है। आज कौन सा बड़ा उद्योग पश्चिम बंगाल में है? निवेश की कसौटी पर पश्चिम बंगाल की स्थिति बहुत ही दयनीय है। जब औद्योगिक घंघे नहीं होगे तब रोजगार के साधन भी विकसित नहीं होंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर न केवल बैरोजगारी बढती है बल्कि अराजकता और भूखमरी भी पसरती है।
टीएमसी में मची भगदड के संकेत को ममता बनर्जी क्यों नहीं समझ रही है? कई मंत्री और कई विधायक ममता बनर्जी की तानाशाही रवैये से अलग हो चुके हैं। लगता है कि ममता बनर्जी का सारा ध्यान तथाकथित सांप्रदायिकता के नारे से फिर से चुनाव जीतना है। सांप्रदायिकता का उनका नारा एंककी है। हिन्दू सांप्रदायिकता पर ममता बनर्जी अति मुखर हैं पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के प्रश्न पर उनकी निष्पक्ष नीति का घोर अभाव है। भाजपा पिछले लोकसभा चुनावों में डेढ दर्जन सीटों पर जीत कर ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी बनी थी। भाजपा को विध्वंस करने की अपनी नीति में ममता बनर्जी लगातार विफल साबित हो रही है। भाजपा का जितना अतिवाद के साथ विरोध करती है उतना ही भाजपा आगे निकल रही है। पूरा हिन्दू वोट आज भाजपा के साथ खडा है।
भाजपा विरोध में ममता बनर्जी की कम्युनिस्ट पार्टियां पिछलग्गू बन जायेंगी? अभी ऐसा लग नहीं रहा है। कांग्रेस भी ममता बनर्जी के साथ आयेगी, ऐसा भी कोई संकेत नहीं है। खास कर पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टियों का आज भी कैडर आधार है। यह सही है कि कांग्रेस, कम्युंनिस्ट पार्टियों और टीएमसी का एक ही एजेंडा है, वह एजेंडा भाजपा विरोध का है। ओवैशी भी एक खतरा है। बिहार की तरह अगर पश्चिम बंगाल में भी ओवैशी सफल हो गया तो फिर ममता बनर्जी की राजनीति नैया कैसे नहीं डूबेगी। कम्यंुनिस्टों के विकल्प के अभाव में ममता बनर्जी को सत्ता मिलती रही है। पर इस बार उनकी सत्ता की वापसी की पूरी उम्मीद भी बनती नहीं है। भाजपा विकल्प के तौर पर उपस्थित है। इसलिए ममता बनर्जी को उफान, बंवडर और एंकाकी सांप्रदायिकता की राजनीति आत्मघाती होगी और भारी पडेगी। अति हिन्दू विरोध की उनकी राजनीति से भाजपा को अवसर भी मिल सकता है।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं पत्रकार है)

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