हे दयानिधे ! मत छोड़ना मेरा हाथ और साथ

अब जब तू मेरे सारे सत्संकल्पों को जानने वाला मुझे मिल ही गया है-तो हे वरूण देव ! मेरा साथ और हाथ मत छोड़ देना। मेरी यही पुकार है आपसे। यह आहुति मैं इसी भाव से वरूण देव के लिए दे रहा हूँ , यह मेरे नहीं है। वेद की ऐसी सारी कामनाएं सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा देने वाली हैं। वेद सार्थकता में विश्वास करता है। आज का विश्व मनुष्य को सफल जीवन जीने की प्रेरणा देता है। क्योंकि सार्थकता में ही विश्व की सार्थकता है। यही कारण रहा है कि हमारे आचार्य लोग प्राचीन काल में हमारे विद्यार्थियों को सफल जीवन की प्रेरणा न देकर सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा ही दिया करते थे। वैसे सार्थकता में सफलता स्वयं ही अंतर्निहित है। पर जब जीवन में सार्थकता आ जाती है तो जीवन लोकमंगल के साथ एकाकार हो जाता है।

प्रसिद्घ कवि शिव मंगलसिंह ‘सुमन’ अपनी ‘थीसिस’ के लिए शांति निकेतन गये। वहां से प्रस्थान करने से पूर्व वह आचार्य क्षिति मोहन सेन से आशीर्वाद लेने हेतु उनके कक्ष में गये। आचार्यश्री के चरण स्पर्श करके कवि महोदय ऊपर उठे तो आचार्यश्री के मुंह से निकलने वाले आशीष वचनों को सुनकर वह हतप्रभ रह गया।

आचार्यश्री कह रहे थे-”सुमन! तुम जीवन में कभी सफल मत बनना। सुमन जी ने बड़ा साहस करके गुरूदेव से उनके शब्दों का अर्थ पूछ ही लिया।”

आचार्य कहने लगे-”भाई! सफल तो संसार में हजारों होते हैं। प्रत्येक वर्ष लाखों व्यक्तियों की सफलता के समाचार समाचार पत्रों में छपते हैं। लेकिन उनमें से सार्थक कोई बिरला ही हो पाता है। मैं चाहता हूं कि तुम जीवन में सफल न होकर सार्थक बनो।”

वेद भी हमें सार्थक जीवन जीने के लिए ही कहता है। यज्ञ हमारे जीवन को सार्थक बनाने का सर्वोत्तम माध्यम है। सारे नर-नारी यदि याज्ञिक भावना को हृदयंगम कर लें, तो सारे विश्व का कल्याण हो जाएगा।

जिस रास्ते पर या पगडंडी पर आप और हम चलते हैं उसी पर चोर उचक्के बदमाश लोग भी चलते हैं, और साधु महात्मा भी चलते हैं। परंतु चोर उचक्कों बदमाशों से पथ का नामकरण नहीं होता। कारण कि वह निरर्थक जीवन जीते हैं, सार्थकता उनके भीतर है ही नहीं, वह मार्ग के लिए हैं-मार्ग उनके लिए नहीं है। वह मार्ग का प्रयोग तो करते हैं परंतु अनर्थ के लिए करते हैं। उनकी चाल बेढंगी होती है। उनकी भावभंगिमा ऐसी होती है कि वे मार्ग का दुरूपयोग कर रहे हैं-उससे ऐसा प्रतिध्वनित होता है। यह दुरूपयोग की प्रवृत्ति उनके जीवन की निरर्थकता का बोध कराती है।

हम ‘अष्टाज्याहुति’ प्रकरण में आगे ईश्वर से कामना करते हुए कहते हैं :-

‘ओ३म् येते शतं वरूण ये सहसं्र यज्ञिया: पाशा वितता महान्त:। तेभिर्नो…..।’ (कात्यायन श्रेष्ठ 25/1/11)

यहां कहा गया है कि हे वरूण देव! ”आप इस चराचर जगत के रचयिता और सर्वव्यापक हैं। आप हमें तथा समस्त प्रशंसित विद्वानों को इस संसार के पापों एवं हजारों लाखों बंधनों से मुक्त करावें। आप सर्वोपरि हैं। यह सब कुछ जो मेरे पास है वरूण, विष्णु और मरूदगण के लिए है मेरा तो अपना कुछ भी नहीं।”

यज्ञाहुति के साथ हम कितनी ऊंची और पवित्र कामना ईश्वर से कर बैठे हैं कि आप हमें तथा समस्त प्रशंसित विद्वानों को इस संसार के समस्त पापों एवं हजारों लाखों बंधनों से मुक्त करावें। यज्ञ हमारे जीवन का आधार इसलिए है कि यह हमें अपने-अपने जीवन के अंतिम ध्येय अर्थात मुक्ति की प्राप्ति में सहायक होता है। यज्ञ की यह आहुति संसार के पापों और हजारों लाखों बंधनों से मुक्ति की कामना कर रही है। जिसका अभिप्राय है कि यह यज्ञाहुति हमें जीवन मुक्त करना चाहती है।

ऋग्वेद (1/24/15) में कहा गया है :-

ओ३म् उदुत्तमं वरूण पाशमस्मदवाधमं विमध्यमम् श्रथाय। अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम।।…..।”

इस मंत्र में याज्ञिक कह रहा है कि-‘हे मेरे वरणीय वरूण देव, सर्वाधार, जगदाधार, सर्वव्यापक, परमपिता परमेश्वर! आप कृपा करके मेरे सभी बंधनों को शिथिल कर दें।’ इसका अभिप्राय है कि मेरी मेधा बुद्घि को इतनी कोमल और पवित्र बना दो कि मुझ पर कोई कर्म अपना बंधन स्थापित न कर सके। मेरा कर्म यथायोग्य धर्मानुसार किया गया होना चाहिए। जब कर्म इस विधि की सीमा के अंतर्गत रहेगा तो वह हम पर अपने बंधन को शिथिल कर देगा। वेदमंत्र में आगे कहा गया है कि हम आपके अनुशासन और नियमों में रहते हुए सदा निष्पाप और बंधनमुक्त हो सकें। ईश्वरीय अनुशासन में रहने का अर्थ है उसके विधि-विधान और प्राकृतिक नियमों को समझना और उन्हीं के अनुसार अपना जीवनयापन करना। जो लोग ईश्वरीय व्यवस्था को तोडक़र अथवा ईश्वरीय अनुशासन को तोडक़र इधर-उधर भागते हैं, वे कष्ट उठाते हैं। अब ईश्वरीय व्यवस्था क्या है ? इस पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ इत्यादि मानवीय दुर्बलता हैं। पर ये सभी एक सीमा तक हमारे भीतर रहनी भी चाहिएं। काम जब तक सीमाओं में है-तब तक वह वंशवृद्घि के लिए आवश्यक माना गया है, पर जब वह भडक़ जाए तो उस समय बिगड़े हुए हाथी की भांति अपने ही महावत को सर्वप्रथम पटक-पटक कर मार डालता है। इसलिए वंश वृद्घि के लिए काम का प्रयोग करना ईश्वरीय व्यवस्था का अनुपालन करना है, पर व्यभिचार करना अनुशासनहीनता है। जिनकी वेद अनुमति नहीं देता इसलिए व्यभिचार के लिए मानव जीवन में कही कोई स्थान है ही नहीं। परंतु फिर भी संसार व्यभिचार को अपना रहा है तो इसका कुपरिणाम भी संसार ही भोग रहा है। सर्वत्र मर्यादाएं टूट रही हैं। ईश्वरीय व्यवस्था को तार-तार किया जा रहा है। जिससे संसार में अनाचार और अनैतिकता को प्रोत्साहन मिल रहा है।

क्रोध, मद, मोह, लोभ इत्यादि के विषय में भी ऐसा ही मानना चाहिए। अर्थात एक सीमा तक क्रोध (मन्यु) ईश्वरीय व्यवस्था के अंतर्गत उचित है, परंतु सीमोल्लंघन होते ही क्रोध भी ईश्वरीय व्यवस्था में बाधक हो जाता है। यदि पापी, दुष्ट, अत्याचारी, अनाचारी और किसी भी असामाजिक व्यक्ति के विरूद्घ आपको क्रोध आ रहा है और आप उसका विनाश कर रहे हैं तो आपका ऐसा क्रोध होकर भी क्रोध नहीं है। वह मन्यु है। आपके उस क्रोध से, उस मन्यु से लोक भला हो रहा है – इसलिए ऐसा क्रोध आपको आना आवश्यक है। यदि ऐसे क्रोध की कमी आपके पास पड़ गयी तो समाज में असामाजिक तत्व हावी हो जाएंगे और सर्वत्र अराजकता फैल जाएगी। एक दुर्बल राजा जब अपने राजधर्म को भूलकर दुष्टों और अनाचारी लोगों के विरूद्घ सहनशीलता का भाव दिखाने लगता है, तब सर्वत्र अशांति और अराजकता व्याप्त हो जाती है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक उगता भारत

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