“वृक्षों में जीवन”, सिद्धांत के प्रतिपादक भीष्म थे

vriksho me jeevan

लेखक – आर्य सागर

सुखदु:खयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात्|
जीवं पश्यामि वृक्छाणामचैतन्यं न विघते|| महाभारत शांति पर्व||

10 मई 1901 को पूरी दुनिया के वनस्पति शास्त्री जीव वैज्ञानिक दांतो तले उंगलियां दबा लेते हैं जब प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु अपने द्वारा अविष्कार किए गए यंत्र क्रिस्कोग्राफ से वृक्षों में जीवन सिद्ध कर देते हैं | जगदीश चंद्र बोस के अनुसार वृक्षों में भी अच्छे व बुरे स्पर्श का प्रभाव पड़ता है वृक्ष भी मृतक जीवित होते हैं… उन्होंने ब्रोमाइड नामक रसायन में एक वृक्ष की जड़ों में डाल दिया… प्रतिक्रिया स्वरूप वृक्षों के स्पंदन को सभी को दिखाया, जब तक वृक्ष मृत नहीं हो गया |

जगदीश चंद्र बोस भारतीय वैज्ञानिक थे यह गर्व का विषय है गर्व इस तथ्य के साथ और अधिक गौरव अर्जित कर लेता है.. जो प्रायोगिक तौर पर जगदीश चंद्र बसु ने दिखाया… वृक्षों में भी जीवन है सिद्धांत को इसका सैद्धांतिक आधार तो 5000 वर्ष पूर्व महा तेजस्वी गंगापुत्र भीष्म तैयार कर चुके थे |

ऐतिहासिक ग्रंथ महाभारत के अनुसार अतीत में 5000 वर्ष पीछे चलते हैं महा तेजस्वी गंगा पुत्र भीष्म बाणों की शैया पर विराजमान है ,धर्मराज युधिष्ठिर विनीत जिज्ञासु भाव से अपनी प्रत्येक शंका का समाधान गंगा नंदन भीष्म के उपदेशों से पा रहे हैं |

धर्मराज युधिष्ठिर पूछते हैं पितामह यह बताइए वृक्षों में जीवात्मा का निवास है या नहीं है?

वृक्षों की गणना हम किस श्रेणी में करें ?

भीष्म इन प्रश्नों का समाधान देते हैं जो शांति पर्व में 7 श्लोकों में वर्णित है उसमें से अंतिम श्लोक को हमने इस लेख के आरंभ मैं अंकित किया है |

भीष्म कहते हैं भृगु ऋषि का यह मत है

(यहां भीष्म महर्षि भृगु (वृक्ष आयुर्वेद वनस्पति विज्ञान) के ज्ञाता को कोट कर रहे हैं…)

(1)यद्यपि वृक्ष ठोस जान पड़ते हैं, फिर भी उनमें आकाश (spase) है, इसमें संदेह नहीं है| आकाश होने से ही उनमें नित्य प्रति फूल फल आदि की उत्पत्ति संभव हो सकती है |

( 2)वृक्षों के भीतर जो ऊष्मा गर्मी होती है उससे उनके पत्ते छाल फूल फल मुरझा जाते हैं झड़ जाते हैं ,अतः उनमें स्पर्श का होना भी सिद्ध होता है |

(3)वायु अग्नि और विद्युत की कड़क आदि भीषण शब्द होने पर वृक्षों के फूल फल झड़ जाते हैं| शब्द का ग्रहण कान से ही होता है अतः यह सिद्ध होता है कि वृक्ष सुनते भी हैं|

(4)लता वृक्ष को चारों ओर से लपेट लेती है तथा उसके ऊपरी भाग तक चढ जाती है |बिना देखे किसी को अपने जाने का मार्ग नहीं मिल सकता, इससे सिद्ध होता है कि वृक्ष देखते भी हैं |

(यह हम सभी ने प्रत्यक्ष देखा है गिलोय व आकाश बेल पेड़ों पर ऐसे ही चढ़ जाती है अपना स्थान बना लेती है)

(5)पवित्र तथा अपवित्र गंध से तथा नाना प्रकार की धूपों की सुगंध से वृक्ष निरोग होकर फूलने फलने लग जाते हैं| अतः वृक्षों में सूंघने की शक्ति भी सिद्ध है |

(यहां हम स्पष्ट करना चाहेंगे कि वृक्षों की जड़ों में तेल आदि नहीं चढ़ाना चाहिए यह नुकसानदायक है | पहले सुगंधित जड़ी बूटियों से वृक्षों को धूप दी जाती थी वृक्ष चिकित्सा का ही एक अंग था, गंगापुत्र भीष्म भी सुगंधित धूप की ही बात कर रहे हैं ना कि वृक्षों में तेल डालकर उन्हें नष्ट करने की)

( 6)वृक्ष अपनी जड़ से जल पीते हैं तथा कोई रोग हो जाने पर उनकी जड़ में औषधि डालकर उनकी चिकित्सा भी की जाती है इससे प्रमाणित होता है कि वृक्ष में रस इंद्री भी है |

अंतिम और सातवां सिद्धांत भीष्म जी ने जो दिया वह इस प्रकार है |

(7)वृक्ष के कट जाने पर उनमें नया अंकुर फूट जाता है तथा वह सुख दुख को ग्रहण करते हैं इससे मैं समझता हूं कि वृक्षों में जीव है वह जड़ नहीं है |

भारत में वृक्षों पर अध्ययन करने की प्राचीन काल से ही स्वस्थ विकसित परंपरा रही है अनेक काल खंडों में अनेक ऋषि हुए हैं जिन्होंने इस पर काम किया है | भीष्म जैसे महारथी महा बलवान ने भी यह ज्ञान ऋषि परंपरा से अर्जित किया |

आपको आश्चर्य होगा पश्चिमी देशों यूरोप अमेरिका सहित मध्य एशियाई देशों में वृक्षों की तो बात छोड़िए स्त्रियों में भी आत्मा नहीं मानी जाती थी | कहीं स्त्रियों को कानूनी मामलों में गवाही देने का अधिकार नहीं था तो कहीं स्त्री की गवाही आधी मानी जाती थी |

दुर्भाग्य तो देखिए आज इस देश में वृक्षों को शुभ अशुभ श्रेणी में लोग बांटते हैं लोग पिलखन पीपल जैसे उपयोगी वृक्षों पर भूत प्रेत का निवास मानते हैं…|

कुछ लोग विदेशी वृक्षों को घर में लगाकर धन ऐश्वर्य चाहते हैं पाखंड ढोंग आडंबर का शिकार होकर |

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचना “भारत भारती” में इस पीड़ा को कुछ ऐसे व्यक्त किया है।

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी
भू- लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है

यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े।
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े

आगे आप अभीष्ट विचार करें |

– आर्य सागर

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