प्रस्तुत है एक ताज़ा ग़ज़ल- कह रहे वो देख लो सब आज की उपलब्धियाँ। भूख के इंडेक्स की भी दिख रहीं गहराइयाँ। झूठ के सूरज के आगे गुम हुए किरदार सब, अब नज़र बस आज रही हैं घूरतीं परछाइयाँ। आमजन को पंथ की कुछ दी गई इतनी अफीम, टूटती उनकी नहीं हैं आजकल मदहोशियाँ। गुल […]
शीतकाल की बरसात आपको मुबारक हो!